ॐ -

पाक्षिक खेजड़ा एक्सप्रेस
(बीकानेर से प्रकाशित व प्रसारित)
वर्ष 23अंक 24दि0 -9-8-11

ॐ - हमारा ध्येय ब्रह्माण्डिय पर्यावरण सुरक्षा व विश्व शान्ति एवं प्राणियों की स्वास्थ्य रक्षा करनी ही है। आप स्वस्थ रहेंगे तो धर्म-कर्म विद्यापार्जन, धनोपार्जन करेंगे। घर में तुलसी पौध लगाने से सुख-शान्ति मिलती है। प्रकृति शक्ति पीठ, खेजड़ा एक्सप्रेस से तुलसी, पीपल पौध निःशुल्क ले जावें। ------------------------------------------------------------------------------------------------------ पर्यावरण, आध्यात्मिक एवं समसामयिक विचारों एवं स्वास्थ्य रक्षा विषयक धरती से जुड़ा विश्व का अग्रणी ऊँ पाक्षिक खेजड़ा एक्सप्रेस (बीकानेर से प्रकाशित व प्रसारित) ---जगद्गुरु शंकराचार्य भगवान प्रजापति ब्रह्माण्डीय -प्रकृति शक्ति पीठ -बीकानेरjagadguru shankaracharya bhagwan prajapati  ----

ऊँ
पाक्षिक खेजड़ा एक्सप्रेस
(बीकानेर से प्रकाशित व प्रसारित)
वर्ष 23अंक 24दि0 -9-8-11

सनातन धर्म ही मानव धर्म है।
माता-पिता-गुरु की छत्रछाया में बौद्धिक व शारीरिक विकास सम्भव है।
सनातन धर्म हमें सिखाता है माता-पिता-गुरु के प्रति श्रद्धा रखे, सेवा करें। सनातन धर्म रूपी वृक्ष अपने आप में महाशास्त्र है। महावृक्ष है। तथा माता-पिता-गुरु है, अतः इसकी छत्रछाया में ही हमारा कल्याण है।
ऊँ ब्रह्माण्ड-ओंम शान्ति
(ब्रह्माण्डीय पर्यावरण सुरक्षा एवं प्राकृत, योग, अध्यात्म शोध पीठ)
प्रकृति शक्ति पीठ (खेजड़ा)
विश्वकर्मा गेट के बाहर, बीकानेर-04 (राज.)
मो. 7737957772, सनातन धर्म ही मानव धर्म है।
माता-पिता-गुरु की छत्रछाया में बौद्धिक व शारीरिक विकास सम्भव है।
सनातन धर्म हमें सिखाता है माता-पिता-गुरु के प्रति श्रद्धा रखे, सेवा करें। सनातन धर्म रूपी वृक्ष अपने आप में महाशास्त्र है। महावृक्ष है। तथा माता-पिता-गुरु है, अतः इसकी छत्रछाया में ही हमारा कल्याण है।
ऊँ ब्रह्माण्ड-ओंम शान्ति
(ब्रह्माण्डीय पर्यावरण सुरक्षा एवं प्राकृत, योग, अध्यात्म शोध पीठ)
प्रकृति शक्ति पीठ (खेजड़ा)
विश्वकर्मा गेट के बाहर, बीकानेर-04 (राज.)
मो. 7737957772, e-mail : [email protected]
(संयोजक - सुश्री दया प्रजापति )LL.M., NET (राष्ट्रपति अवार्ड से विभूषित)
सनातन धर्म की रक्षा व प्रसार-प्रचार का दायित्व संतों, धर्मगुरुओं, ब्राह्मणों का था और है भी। इन्होंने अपने दायित्व का निर्वाह क्यों नहीं किया?
आज हिन्दू धर्म (डाकू, चोर आदि) धर्म भारतीय कागजों में घुस गया। सनातन धर्म को खदेड़ कर जन-जन में प्रवेश कर रहा है। क्यों ? क्यों?? आखिर क्यों??? जबकि सनातन धर्म एक विशाल महाशास्त्र, महावृक्ष है, समस्त प्राणियों की रक्षा का धर्म है सनातन धर्म का प्रवर्तक , ओंम है। हिन्दू धर्म का कोई प्रवर्तक नहीं है। सरकारी तन्त्र एवं बौद्धिक तन्त्र, साहित्यकारों, देश के कर्णधारों, नेताओं ने स्वतन्त्रता के 64 वर्ष बाद भी गुलामी के शब्दों को क्यों फलीभूत होने दिया इसका जिम्मेदार कौन है? कौन है?? कौन है??? जबकि शब्द से संस्कार बनते हैं। इतने बड़े षड़यन्त्र का रहस्य क्या है? सर्वोच्च सत्ता, न्याय शक्ति इसकी जांच करें। यह सर्वविदित है कि सभी धर्मो का कोई न कोई प्रवर्तक है फिर भी पिता हीन, प्रवर्तक हीन, हिन्दू धर्म को भारतीय पन्नों में क्यों घुसने दिया, इसके जिम्मेदार कौन है? कौन है?? कौन है??? जनता (आर्यन) जवाब मांग रही है। अतः हिन्द, हिन्दी, हिन्दू, हिन्दुस्तान, हिन्दू धर्म को भारतीय पन्नों से तुरन्त प्रभाव से हटाया जाए। ऐसा करने से सही रूप में स्वतन्त्रता का आभास होगा और असीम शान्ति मिलेगी। करके देखो !
ब्रह्माण्डीय पर्यावरण सन्तुलन तो नितांत आवश्यक है सामाजिक सन्तुलन भी आवश्यक है।
‘‘व्यवस्था सोच-परिवर्तन चेतना महायज्ञ’’ का ‘‘जनजागृति अभियान’’
स्वतन्त्रता के 64 वर्ष बाद भी! गुलामी के शब्द! क्यों? क्यों?? क्यों??? जबकि शब्द से संस्कार बनते हैं!
सेवामें, ........................................हे मनीषी, महामानव आज सनातन धर्म खतरे में है। सनातन धर्म को विलुप्त करने का बहुत बड़ा षड़यन्त्र चल रहा है। हमें सनातन धर्म की रक्षा करनी है। अतः कृपया आप अपने पद की गरीमा को ध्यान में रखते हुए मौन का परित्याग कर हमारी रणनीति में सहयोग करने की कृपा करें ताकि सनातन धर्म को विलुप्त करने के षड़यंत्र को विफल कर सके। सनातन धर्म की पूजा एक साथ करने का समय भी निश्चित कर सकें।
हिन्द-हिन्दी-हिन्दू-हिन्दुस्थान - ये सब फारसी नाम !!!
‘हिन्दू’ शब्द को विदेशी मुसलमान, लूटेरांे, आक्रमणकारियों ने भारत के आर्यों पर सदियांे की गुलामी के समय जबरदस्ती थोपा था। हिन्दू का फारसी भाषा में अर्थ है- चोर, डाकू, लुटेरा, गुलाम, राहजन आदि यह ऐतिहासिक सत्य है।
‘हिन्द’- यानि गुलाम - जयहिन्द, ये गुलामी के पूर्व तक तो ‘जय गुलाम’ सही था। अब कैसा जय गुलाम। अब जय भारत बोलें। हिन्द ‘हिन्द भूमि’ यानि ‘गुलाम भूमि’ गुलामी तक तो सही थी अब ‘भारत भूमि’ आर्य भूमि आदि ही बोलें !
‘हिन्दी’- यानि संस्कृत की एक सरल भाषा परन्तु इसका नाम ‘हिन्दी’ फारसी शब्द है अतः इसका नाम होना चाहिए ‘आर्ष भाषा’ या देवनागरी भाषा !!
‘हिन्दू’- यानि चोर, डाकू, लूटेरे, राहजन, काला, गुलाम आदि आदि जो कि सदियो की गुलामी में तो ठीक था अब हमें अपने मूल रूप ‘आर्य’ में आना चाहिए। आओ हम आर्य बनें, एक बनें , श्रेष्ठ बनें !!!
‘हिन्दुस्थान’- यानि ‘गुलामस्थान’ को बदलकर आर्य स्थान बोलें । विश्व हिन्दू परिषद् की जगह विश्व आर्य परिषद् या विश्व सनातन परिषद् या विश्व भारत परिषद् आदि नवीन नामकरण संस्कार से असीम शांति मिलेगी। करके देखो !!!
इस प्रकार उपरोक्त सभी नामों को जिस प्रकार बम्बई से मुम्बई, मद्रास से चैन्नई, कलकत्ता से कोलकाता आदि कई जगहों के नाम को बदलकर मूल रूप में रखने से शांति मिली है वैसे ही इन हिन्द, हिन्दू आदि नामों को आर्य रूप में संसोधन से भी असीम शांति मिलेगी, करके देखो।
‘हिन्दू’ शब्द का फारसी भाषा में मूल अर्थ है- चोर, डाकू, लुटेरे, राहजन, काला, गुलाम आदि। यह ऐतिहासिक सत्य है।
प्रश्न: हिन्दू शब्द का अर्थ क्या है?
उत्तर: हिन्दू का अर्थ है-लाला लाजपत राय ने अपने परिचय में - महर्षि दयानन्द के लाहौर 1898 के परिचय के बारे में कहा: लेखक के अनुसार कुछ लोग कहते है कि हिन्दू है जो कि सिन्धु का बिगड़ा हुआ नाम है लेकिन यह गलत है। परन्तु सिन्धु एक नदी का नाम है। किसी समुदाय का नाम नहीं है । यह सही है कि यह नाम असली आर्यन जाति को दिया गया है जो कि इस क्षेत्र में मुस्लिम आक्रान्ताओं द्वारा अपमानित करने के लिए इस नाम से पुकारी जाती थी। फारस में लेखक हमारे लेखक कहते है इस शब्द का तात्पर्य ‘दास’ है और इस्लाम के अनुसार वो सारे लोग जिन्होंने इस्लाम को नहीं अपनाया था उनको दास बना दिया गया।
आगे ‘काला’ और ‘दास’ संकलन में फारसी और उर्दू भाषा के शब्द कोष यह वर्णन करते है कि यह अर्थहीन और घ्रणित ‘हिन्दू’ शब्द का अर्थ है- फारसी भाषा का शब्दकोष - ल्युजत-ए-किशवारी, लखनऊ 1964, चोर, डाकू, राहजन, गुलाम, दास। उर्दू फिरोजउल लजत-प्रथम भाग पृ. 615, तुर्की चोर, राहजन, लूटेरा: फारसी गुलाम, दास, बारदा (आज्ञाकारी नौकर), शियाकाम (काला) पेज 376 भार्गव शब्द कोष बारवां संकलन 1965 भी देखे)
परसियन - पंजाबी (डिक्सनरी) शब्द कोश (पंजाबी यूनिवर्सिटी, पटियाला) भारतीय उपमहाद्वीप के निवासी, डाकू, राहजन, चोर, दास, काला, आलसी।
(हिन्दुकुश - यानि भ्पदकन ज्ञपससमतए ैसंनहीजंतद्ध यहाँ असंख्य मौतें, मार-काट, हत्याएं हुई।
अब हमें चोर, डाकू, लूटेरे, गुलाम, राहजन नहीं रहना है। हमें श्रेष्ठ बनना है। हमें आर्य बनना है। आओ हम आर्य बनें।
राम और कृष्ण आर्य थे। गुरुनानक देव राम के वंशज है।
हस्तिनापुर के वंशज अन्तिम सम्राट श्री पृथ्वीराज चैहान तक हमारी पहचान आर्य थी। बाद में विदेशियों के अधीन हो गये। आर्यन पहचान ही खत्म हो गई। अब आर्य समाज की संस्थाएं है।
सिकन्दर ने भी हिन्दू शब्द को बोला था परन्तु प्रचलित 1000 ई. के बाद ही हुआ है। महमूद गजनवी ने 997 ई. से भारत में 27 डाके डाले। मोहम्मद गौरी ने पृथ्वीराज चैहान से कई लड़ाईयां लड़ी दोनों का अन्त हो गया। बाबर आक्रमणकारी था। फिर यहीं रहने का मन बनाया था आदि-आदि आक्रान्ताओं के साथ ही ‘हिन्दू’ शब्द आया।
विदेशी, लूटेरों, आक्रमणकारियों के अत्याचार से आर्य हिन्दू-मुस्लिम में बंट गये।
आओ हम आर्य बने, श्रेष्ठ बने, एक बने - हे श्रेष्ठ जनों, हे आर्यों, विदेशी इस्लामिक लूटेरों, आक्रमणकारियों ने भारतवर्ष में शान्तिमय जीवन यापन करने वाले त्यागी, तपस्वी, हमारे पूर्वजों को घोर यातनाएं देकर हिन्दू और मुस्लमान बना दिये।
अब आप स्वतन्त्र हो, आईये हम श्रेष्ठ बने! आर्य बने!! एक बने!!!
‘हिन्दू’ धर्म का कोई प्रवर्तक नहीं है यानि ‘हिन्दू धर्म’ नहीं है। यह झूठ प्रपंच का मनगढन्त नाम है।
आप मनीषी भी यह पढ़कर स्वयं ही प्रश्न पैदा करे या स्वयं ही उत्तर खोजे या देश में धर्म और सत्य सनातन के नाम के भ्रम का नाश कर अपने स्व कर्तव्य का पालन कर राष्ट्रभक्ति जागृत करें।
- हिन्दू धर्म के दस प्रश्न -
1. हिन्दू धर्म के प्रवर्तक कौन है? 2. हिन्दूधर्म के धर्म ग्रंथ कौन-से है? 3. हिन्दू धर्म का ईश्वर कौन है? 4. हिन्दू धर्म के उपास्य देव कौन-कौन से हैं? 5. हिन्दू धर्म किस समय से चला है समयावधि बताये? 6. हिन्दू धर्मानुसार सृष्टि कब वा कैसे बनी? 7. हिन्दू धर्मानुसार यह सृष्टि एकत्ववाद, द्वैतवाद या त्रैतवाद है?
8. हिन्दू धर्म की पूजा पद्धति क्या है? 9. हिन्दू धर्मानुयायी की जीवन व सामाजिक पद्धति क्या है? 10. हिन्दू शब्द किस भाषा की देन है?
सनातन धर्म के दस उत्तर
1. सनातन धर्म के प्रवर्तक परमपिता परमेश्वर है। जिसका मुख्य नाम ओ3म् है।
2. सनातन धर्म के धर्मग्रंथ चार वेद (ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद व अथर्ववेद) है तथा वेद प्रणीत चार उपवेद छः दर्शन शास्त्र, 11 उपनिषद व चार ब्राह्मण ग्रंथ व मनुस्मृति आदि भी मान्य ग्रंथ है।
3. सनातन धर्म के ईश्वर एक ओ3म् ही है जो सच्चिदानंद स्वरूप, निराकार, सर्वशक्तिमान, न्यायकारी, दयालु, अजन्मा, अनंत, निर्विकार, अनादि, अनुपम, सर्वाधार, सर्वेश्वर, सर्वअन्तरयामी, अजर, अमर, अभय, नित्य पवित्र और सृष्टिकर्मा है।
4. सनातन धर्म के 33 कोटि जड़ देवता 5 चेतन देव या इन सब देवों का महादेव परमपिता परमेश्वर है। जड़ में 8 वसु अग्नि, जल, वायु, पृथ्वी, आकाश, सूर्य, चन्द्रमा एवं नक्षत्र 11 रुद्र पांच प्राण पांच उपप्राण दस वा ग्यारहवीं आत्मा 12 आदित्य वर्ष के बारह महीने जो हमारी आयु को लेता है। एक इन्द्र (ऐश्वर्यदाता) प्रजापति (यज्ञ), चेतनदेव माता, पिता, आचार्य, गुरु एवं पति के पत्नी और पत्नी के लिए पति देवता है।
5.सनातन धर्म सृष्टि के प्रारम्भ काल से ही चल रहा है जिसको 1960853112 वर्षों से चल रहा है। यह वर्तमान प्रचलन ब्रह्माण्ड गणित के आधार पर है।
6.सनातन धर्मानुसार परमपिता परमेश्वर अपने स्व शक्तिमान होने से प्रलय रूपी रात्री का फिर पल मास वर्ष आदि रचकर पूर्व कल्पनुसार सूर्य चन्द्रमा नक्षत्र आदि कि छः चतुर्युगी अमैथुनी सृष्टि और 994 चतुर्युगी मैथुनी सृष्टि चलती है कुल 1000 चतुर्युगी यानी 4,32,00,00,000 वर्षों तक रहती है व इतने समय ही सृष्टि प्रलय (सूक्ष्म रूप) में रहती है।
7. सनातन धर्मानुसार यह सृष्टि त्रेतवाद है (ईश्वर, जीव, प्रकृति)
(1) ईश्वर पूरे ब्रह्माण्ड का एक ही हैं। सच्चिदानन्दस्वरूप, कर्मफल प्रदाता सृष्टि का रचयिता पालनकर्ता एवं प्रलयकर्ता है।
(2) जीव- जो अनंत व सतचित्त हैं, अल्पज्ञ कर्मफलानुसार जन्म मरण के चक्र में पड़ते हुए श्रेष्ठ योनी मानव द्वारा मोक्ष की भी प्राप्त कर सकते हैं।
(3) प्रकृति - जो सत् है तीन गुणों (सत्व, रज, तम) से युक्त पंच तत्व स्वरूप में है।
8. सनातन धर्म, मानव धर्म, प्राणी धर्म के पंच महायज्ञ द्वारा चैतन्य एवं जड़ देवों की पूजा (यथायोग्य सत्कार एवं उपयोग) की जाती है।
(1) ब्रह्मयज्ञ - ईश्वर का ध्यान व वैदिक सत्य शास्त्रों का स्वाध्याय।
(2) देवयज्ञ - जड़ देवों का मुख अग्नि है सो गौ घृत एवं सुगन्धित, मिष्ठीकारक पुष्टिकारक वनस्पतियों द्वारा हवन करना। वायु को शुद्ध कर स्वास्थ्यवर्धक बनाना।
(3) पितृयज्ञ - जीवत माता, पिता, दादा, दादी, सास, ससुर आदि बड़ों को प्रातः स्नानकर नमस्ते कर उनकी इच्छानुसार भोजन आदि व्यवस्था करना उनकी आज्ञा का पालन करना एवं संतान को सुसंस्कारी बनाना।
(4) बलीवैश्व देव यज्ञ - गाय, कुत्ता, चींटी, पक्षी, विकलांग, विधवा आदि गृह पर आश्रितों की यथा शक्ति सेवा करना।
(5) अतिथियज्ञ - कोई वेदों के विद्वान् संन्यासी घर आये तो उनका हृदय से अभिवादन कर उनसे अपनी शंका का समाधान करना एवं उनकी आवश्यकतानुसार भोजन आदि देकर सेवा करना।
9. सनातन धर्मानुसार व्यक्ति चार वर्ण का चार आश्रमों का पालन करते हुए सोलह संस्कारों द्वारा आत्मोन्नत कर अष्टांग योग द्वारा धर्म अर्थ, काम व मोक्ष को प्राप्त करना।
छुआछूत रहित कर्मानुसार वर्णव्यवस्था, मृत्यु भोज, बाल विवाह, बहुविवाह आदि। वर्तमान सामाजिक कुरीतियों से रहित आदर्श, जीने दो और जीओ के आधार पर सामाजिक संरचना करना ‘‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’’ की कामना करना।
10. सनातन धर्मानुसार हम आर्यावर्त के निवासी होने के कारण आदिकाल से आर्य थे परन्तु 997 ईश्वी से विदेशी लूटेरों, आक्रमणकारियों ने हिन्दू शब्द जो फारसी भाषा में मुसलमानों द्वारा दिया गया हमारा अपमान जनित नाम है। जिसका अर्थ काला, चोर, डाकू, लूटेरा, गुलाम आदि बताया है। महाभारत काल तक हमारे महाराजे आर्य पुत्र, ऋषि, महर्षि संतान कहलाती थी परन्तु महाभारत के बाद भी किसी भी धर्मशास्त्र पुराणों में भी किसी महापुरुष या संत आदि को हिन्दू पुत्र नाम से सम्बोधन नहीं आया है तो हम इस अपनी संस्कृति आर्यावर्त देश की परम्परा के श्रेष्ठ नाम आर्य को छोड़ हिन्दू क्यों बोलने लगे या बोल रहे है, गाली ले रहे है। शब्द ब्रह्माण्ड का सार है। शब्द से संस्कार बनते है और इसी हिन्दू शब्द के गूढ़ अर्थ यानि चोर, डाकू, लुटेरा, राहजन आदि को न समझने के कारण त्याग, तपस्वी भारत भूमि के त्यागी तपस्वी संतगणों, विद्वानों ने भी हिन्दू पथ पर चलना शुरू कर दिया है। यहाँ तक कि किसान व मजदूर वर्ग भी संतों, विद्वानों व राज में उच्च पदासीनों को हिन्दू यानि चोर, डाकू, राहजन की ओर अग्रसर होते देख क्षुब्ध है और वे भी मौके की तलाश में है। यहाँ तक अध्यापकगण यानि गुरुजन भी ऐसी भयावनी स्थिति में है का गम्भीरता से चिंतन-मनन करें ।
इसका विचार कर ‘हिन्द’, ‘हिन्दी’, ‘हिन्दू’ और ‘हिन्दुस्तान’ शब्दों का परित्याग करें और इसकी जगह ‘हिन्द’ यानि भारत, ‘हिन्दी’ यानि आर्ष भाषा, देवनागरी, ‘हिन्दू’ यानि आर्य, ‘हिन्दुस्तान’ यानि आर्यस्थान बोलने का प्रचलन शुरू करें । सत्य को ग्रहण करे यही ईश्वर की कामना है।
इनके अलावा हमारी शोध के आधार पर निम्नलिखित 11 प्रश्न और है जो हमने अन्यों से पत्र-प्रेषित करके पूछे थे जिनका उत्तर आज तक नहीं आया। इन सभी का हम ही उत्तर दे सकते है फिर भी आप मनीषी भी इस पर चिंतन-मनन अवश्य करें। उत्तर देने का कष्ट करें।
1. सनातन धर्म प्राचीन होते हुवे भी सिमट कर रह गया क्यों? जबकि दूसरे धर्मों का विश्व में राज चलता है। 2. सभी धर्मों में शान्ति का उल्लेख है फिर आतंकवाद क्यों बढ़ रहा है? 3. आतंकवाद रूपी राक्षस की उत्पत्ति कैसे हुई? 4. सन्तों के प्रवचनों का असर क्यों नहीं पड़ रहा है जबकि करोड़ो रुपये सन्तों के प्रवचनों में खर्च होते है। देखने में ओर सुनने में आया है कि जो सन्तों के पास ज्यादा रहते है उनमें से अधिकांश घोटाला-घपलों में क्यों लिप्त है? 5. आज मनुष्य की गरिमा उसके चरित्र से न आंककर धन से आंककर धन के महत्त्व को बढ़ावा क्यों दिया जा रहा है? 6. अधिकांश की येन-केन प्रकरेण अनीति से धन संचय करने की प्रवृति क्यों बढ़ रही है? 7. वर्तमान में वाहन दुर्घटनाएं क्यों बढ़ रही है? (वाशिंगटन, कैलिफोर्निया, यूनिवर्सिटी के मनोवैज्ञानिकों ने कहा कि ध्वनि प्रदूषण, संगीत से वाहन दुर्घटनाएं आदि होते हैं। (28 जून-2011 के दैनिक अखबार में प्रकाशित) जबकि खेजड़ा एक्सप्रेस के प्रजापति ने शोध करके पाँच वर्ष पहले पता कर लिया था कि ध्वनि प्रदूषण, गीतों से वाहन दुर्घटनाएं, बहरापन आदि होती है जो कि 24 अप्रैल 2008 के अंक में प्रकाशित, 20 अप्रैल को प्रकृति शक्तिपीठ खेजड़ा के कार्यालय में प्रजापति ने शोध पत्र पढ़ा था जिसमें ध्वनि प्रदूषण से वाहन दुर्घटनाएं व अर्द्ध विक्षुप्ता, बहरापन आदि विस्तार से बताया है तथा दुर्घटनाओं के बारे में ओर भी गूढ़ जानकारी की है। सरकार को भी पत्र लिखें। न ही सरकार ने ध्यान दिया और न ही मीडिया ने, जबकि अब अमेरिका केे मनोवैज्ञानिकों की शोध को प्रचारित-प्रसारित कर रहे है।) 8. बच्चों व युवाओं में भी नशे की प्रवृति क्यों बढ़ रही है?
9. अनेक सन्त दुष्आचरण में लिप्त क्यों होते जा रहे हैं? 10. अकाल क्यों पड़ते हैं? एवं 11. कमजोर मानसून में अच्छी वर्षा कैसे ली जा सकती है? आदि आदि अनेकानेक शोध जिसमें विशेष तुलसी, यज्ञ, योग, वनौषधियों से रोगों का उपचार आदि। अकाल पर शोध में लगभग 30 वर्ष लगे है।
हमारा धर्म ‘सनातन धर्म’ है जिसका प्रवर्तक ?, ओ3म्, ओं है। आईये इस ‘व्यवस्था सोच परिवर्तन चेतना महायज्ञ’ के जनजागृति अभियान में शामिल होईये और अनेकानेक गूढ जानकारियों के साथ भारत को विश्व की अग्रणी शक्ति बनाने में अपना योगदान दीजिये।
ओं-शान्ति-शान्ति-शान्ति।
अतः जो भारतीय हैं, आर्य है और ‘व्यवस्था सोच परिवर्तन चेतना महायज्ञ’ में विश्वास रखने वाले है सभी मुख्य कार्यालय ‘पाक्षिक खेजड़ा एक्सप्रेस, प्रकृति शक्ति पीठ, बीकानेर -4 से सम्पर्क करें और अधिक जानकारी के लिए खेजड़ा एक्सप्रेस पढ़े।

नोट: विदेशी महमूद गजनवी ने भारत को 27 डाकों से लूटा, लूट के माल से गजनी को सजाया। गौरी आक्रमण कारियों ने गजनी को जलाकर राख कर दिया। आज भारत को अपने ही लूट कर विदेशों में धन जमा कर रहे है। जब ये लूटेरे मरेंगे तो इनका विदेशों में धन भी जलकर राख हो जायेगा।

यह पत्र आपके उज्ज्वल भविष्य की ईश्वर से प्रार्थना करता है। प्राणियों का कल्याण हो। एक बात ओर- हे महामानव आप आर्य है, आप श्रेष्ठ है। आप हमें पत्र लिखें, फोन करें, सम्पर्क करें। विचार भेंजे। (मिलने का समय सुबह 10 बजे शाम 6 बजे)
जय सनातन-जय भारत-जय आर्यन
आज्ञा से - अधिष्ठाता, प्रकृति शक्तिपीठ
सनातन धर्म खण्ड-खण्ड क्यों हुवा?:- सभी अपने-अपने धर्म की छत्र-छाया में फलीभूत होते हैं सनातन धर्म को अनादि काल में ईश्वर ने रचना की है। सनातन धर्म रूपी विशाल शास्त्र के पन्ने, वेद-पुराण, उपनिषद् आदि धर्म ग्रन्थ है। इन शास्त्रों के किसी मंत्र या श्लोक के गूढ़ रहस्य को हमारे मनीषों ने तप करके योग द्वारा जान लिया और उसी का उन्होंने प्रचार-प्रसार किया और इस प्रकार ऐसे मनीषी महामानवों के नाम से धर्म - सम्प्रदाय बन गये और सनातन धर्म खण्ड-खण्ड में बंटता गया। सनातन धर्म हमारा माता-पिता-गुरु है। माता-पिता-गुरु की छत्र-छाया में हमारा विकास होता है। जो अपने माता-पिता गुरु में श्रद्धा नहीं रखते, उनकी सेवा नहीं करते वो घोर कष्ट के भागीदार बनते हैं। अतः हमें सनातन धर्म रूपी महाशास्त्र, महावृक्ष, माता-पिता-गुरु की छत्र-छाया में रहना है तभी हमारा कल्याण होगा। सनातन धर्म को विलुप्त करने का बहुत बड़ा गूढ़ षड़यन्त्र भी चल रहा है। आज सनातन धर्म को हिन्दू धर्म के नाम से विस्थापित करने का घोर षड़यन्त्र चल रहा है। ऐसे में सभी सच्चे सनातनी, सच्चे आर्यों का कर्तव्य है कि वे सनातन धर्म को बचाने की हमारी रणनीति में हमारा सहयोग करें। जबकि शब्द से संस्कार बनते हैं और हिन्दू का अर्थ ही चोर, डाकू, लूटेरा आदि है तो यह धर्म चोर,डाकू, लूटेरा धर्म बनेगा? यानि देवों पर राक्षसों की विजय। यानी सत्य पर असत्य की विजय। जरा सोचो!!!

--------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------- ब्रह्माण्डगुरु- भगवान प्रजापति -अधिष्ठाता - - प्रकृति शक्ति पीठ.
brahmand guru bhagawan prjapati -adhishthata -prikriti shakti pith-
ने कहा कि ॐ शांति !- शब्द ही ब्रह्म है। शब्द से संस्कार बनते हैं। ये ही सनातन सत्य है !
ॐ तत्सत !जय भारत -!! आर्य संस्कृति सनातन धर्मेव जयते !

 

bhagwan prajapati-om shanti
हमारा ध्येय ब्रह्माण्डिय पर्यावरण सुरक्षा व विश्व शान्ति एवं प्राणियों की स्वास्थ्य रक्षा करनी ही है। आप स्वस्थ रहेंगे तो धर्म-कर्म विद्यापार्जन, धनोपार्जन करेंगे। घर में तुलसी पौध लगाने से सुख-शान्ति मिलती है। प्रकृति शक्ति पीठ, खेजड़ा एक्सप्रेस से तुलसी, पीपल पौध निःशुल्क ले जावें। ------------------------------------------------------------------------------------------------------ पर्यावरण, आध्यात्मिक एवं समसामयिक विचारों एवं स्वास्थ्य रक्षा विषयक धरती से जुड़ा विश्व का अग्रणी ऊँ पाक्षिक खेजड़ा एक्सप्रेस (बीकानेर से प्रकाशित व प्रसारित) ---जगद्गुरु शंकराचार्य भगवान प्रजापति ब्रह्माण्डीय -प्रकृति शक्ति पीठ -बीकानेरjagadguru shankaracharya bhagwan prajapati 
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पाक्षिक खेजड़ा एक्सप्रेस
(बीकानेर से प्रकाशित व प्रसारित)
वर्ष 23अंक 18 दि0 -9-5-11
‘‘हिन्दू’’ शब्द पर 21 मई को गोष्ठी !!!
‘‘हिन्दू’’ शब्द विदेशी लूटेरों का दिया हुवा नाम है। जिसे कुछ लोगों ने अज्ञानता से सस्ती लोकप्रियता के लिए राजनैतिक संरक्षण देकर ‘हिन्दू धर्म’ के नाम से जबरदस्ती थोपने की कोशीश की है और कर रहे हैं। जबकि ‘हिन्दू शब्द’ ही वैदिक नहीं है तो फिर ‘हिन्दू धर्म’ कैसा?
यह कार्य कोई बहुत बड़ा षड़यन्त्र तो नहीं? क्योंकि इसमें गीता प्रेस की भूमिका भी विचित्र है। इन सब पर विस्तृत चर्चा के लिये 21-5-2011 को सुबह पाक्षिक खेजड़ा एक्सप्रेस के कर्मस्थल, कार्यालय प्रकृति शक्ति पीठ विश्वकर्मा गेट, बीकानेर में 11 बजे गोष्ठी होगी तथा इसी दिन ‘हिन्दूधर्म’ के नाम से प्रचार-प्रसार करने वालों से खुला शास्त्रार्थ करने का आह्वान का दिन व समय की घोषणा करेंगे, प्रकृति शक्ति पीठ के अधिष्ठाता! 
अतः आप सभी से प्रार्थना है कि आप समय पर पहुंच कर अपने कीमती समय में अपने उच्च कोटि के शुद्ध विचार गोष्ठी में देने का कष्ट करें।
नोटः कृपया इसी खबर के अधिकृत सूचना समझे ओर आगे प्रचारित करे व सम्पर्क करे। सुझाव भेजे। -भगवान प्रजापति

ॐ - हमारा ध्येय ब्रह्माण्डिय पर्यावरण सुरक्षा व विश्व शान्ति एवं प्राणियों की स्वास्थ्य रक्षा करनी ही है। आप स्वस्थ रहेंगे तो धर्म-कर्म विद्यापार्जन, धनोपार्जन करेंगे। घर में तुलसी पौध लगाने से सुख-शान्ति मिलती है। प्रकृति शक्ति पीठ, खेजड़ा एक्सप्रेस से तुलसी, पीपल पौध निःशुल्क ले जावें। ------------------------------------------------------------------------------------------------------ पर्यावरण, आध्यात्मिक एवं समसामयिक विचारों एवं स्वास्थ्य रक्षा विषयक धरती से जुड़ा विश्व का अग्रणी ऊँ पाक्षिक खेजड़ा एक्सप्रेस (बीकानेर से प्रकाशित व प्रसारित) ---जगद्गुरु शंकराचार्य भगवान प्रजापति ब्रह्माण्डीय -प्रकृति शक्ति पीठ -बीकानेरjagadguru shankaracharya bhagwan prajapati 

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(बीकानेर से प्रकाशित व प्रसारित)
वर्ष 23अंक 19 दि0 -9-5-11
‘‘हिन्दू’’ शब्द पर 21 मई को गोष्ठी !!!
‘‘हिन्दू’’ शब्द विदेशी लूटेरों का दिया हुवा नाम है। जिसे कुछ लोगों ने अज्ञानता से सस्ती लोकप्रियता के लिए राजनैतिक संरक्षण देकर ‘हिन्दू धर्म’ के नाम से जबरदस्ती थोपने की कोशीश की है और कर रहे हैं। जबकि ‘हिन्दू शब्द’ ही वैदिक नहीं है तो फिर ‘हिन्दू धर्म’ कैसा?
यह कार्य कोई बहुत बड़ा षड़यन्त्र तो नहीं? क्योंकि इसमें गीता प्रेस की भूमिका भी विचित्र है। इन सब पर विस्तृत चर्चा के लिये 21-5-2011 को सुबह पाक्षिक खेजड़ा एक्सप्रेस के कर्मस्थल, कार्यालय प्रकृति शक्ति पीठ विश्वकर्मा गेट, बीकानेर में 11 बजे गोष्ठी होगी तथा इसी दिन ‘हिन्दूधर्म’ के नाम से प्रचार-प्रसार करने वालों से खुला शास्त्रार्थ करने का आह्वान का दिन व समय की घोषणा करेंगे, प्रकृति शक्ति पीठ के अधिष्ठाता!
अतः आप सभी से प्रार्थना है कि आप समय पर पहुंच कर अपने कीमती समय में अपने उच्च कोटि के शुद्ध विचार गोष्ठी में देने का कष्ट करें।
नोटः कृपया इसी खबर के अधिकृत सूचना समझे ओर आगे प्रचारित करे व सम्पर्क करे। सुझाव भेजे। -भगवान प्रजापति

ॐ - हमारा ध्येय ब्रह्माण्डिय पर्यावरण सुरक्षा व विश्व शान्ति एवं प्राणियों की स्वास्थ्य रक्षा करनी ही है। आप स्वस्थ रहेंगे तो धर्म-कर्म विद्यापार्जन, धनोपार्जन करेंगे। घर में तुलसी पौध लगाने से सुख-शान्ति मिलती है। प्रकृति शक्ति पीठ, खेजड़ा एक्सप्रेस से तुलसी, पीपल पौध निःशुल्क ले जावें। ------------------------------------------------------------------------------------------------------ पर्यावरण, आध्यात्मिक एवं समसामयिक विचारों एवं स्वास्थ्य रक्षा विषयक धरती से जुड़ा विश्व का अग्रणी ऊँ पाक्षिक खेजड़ा एक्सप्रेस (बीकानेर से प्रकाशित व प्रसारित) ---जगद्गुरु शंकराचार्य भगवान प्रजापति ब्रह्माण्डीय -प्रकृति शक्ति पीठ -बीकानेरjagadguru shankaracharya bhagwan prajapati 

 ऊँ
पाक्षिक खेजड़ा एक्सप्रेस
(बीकानेर से प्रकाशित व प्रसारित)
वर्ष 23अंक 20 दि0 -9-6-11
page 12

‘विदेशी आक्रमणकारियों , लुटेरों ने हमें गाली के रूप में फारसी भाषा में कहा - तुम चोर, डाकू, लूटेरे, गुलाम ‘हिन्दू’ हो और सैकड़ों वर्ष की गुलामी में हम (आर्य) भूल गये कि हमारी पहचान क्या थी।
Q. What is meaning of Hindu.
Ans.: Lala Lajpat Rai Ed in his introduction of Maharishi Shri Dayanand Sarswati Aur Unka Kam Lahore 1898 said :-
Some people according to the author say that this word Hindu is a corrupt from Shindhu but this is wrong because Shindu was the name of the river and not the name of the community moreover, it is correct that this name has been given to the original Aryan race of the region by muslim invaders to humilitate them. In persian, say our author, the word means slave and according to islam, all those who did not embrace islam were termed as slaves.
Further in addition to "black" and "slave" persian and urdu dictionaries describe othe demeaning or contemptuous meaning of "Hindu"
Persian dictionary - lughet - e- kishwari lucknow 1964. chore (thief) dakoo (dacoit) raahzan (waylayer) and gulam (slave)
Urdu-feroze-ul-laghat part-I P. 615 Turkish; Chore, rahzaan and lutera : persian : gulam (salve) barda (obedient servent) Sia faam (black) colour) kalla and black). Page 376 Bhargaw; Dictionery 12th Edition 1965 में हिन्द-हिन्दू-हिन्दूस्तान = गुलाम, पिछले, दास आदि।
हस्तिनापुर के वंशज अन्तिम सम्राट श्री पृथ्वीराज चैहान तक हमारी पहचान आर्य थी। बाद में विदेशियों के आधीन हो गये। हमारी पहचान ही खत्म हो गई। वर्तमान में आर्य समाज की संस्थाएं व सदस्य जरूर है।
महमूद गजनवी ने 997 ई. से भारत में 27 डाके डाले। मोहम्मद गौरी ने पृथ्वीराज चैहान से कई लड़ाईयां लड़ी दोनों का अन्त हो गया। बाबर आक्रमणकारी था। फिर यहीं रहने का मन बनाया था आदि-आदि के साथ ही ‘हिन्दू’ शब्द आया।
‘हिन्दू’ धर्म का कोई प्रवर्तक नहीं है यानि ‘हिन्दू धर्म’ नहीं है। यह झूठ प्रपंच का मनगढन्त नाम है।
हमारा धर्म ‘सनातन धर्म’ है जिसका प्रवर्तक ऊँ, ओउम्, ओं है। आइये इस ‘व्यवस्था सोच परिवर्तन चेतना महायज्ञ’ के जनजागृति अभियान में शामिल हाइये और अनेकानेक गूढ जानकारियों के साथ भारत को विश्व की अग्रणी शक्ति बनाने में अपना योगदान दीजिये।
ओं-शान्ति-शान्ति-शान्ति।
अतः जो भारतीय है, आर्य है, सनातन धर्म को मानने वाले है सनातनी है और ‘व्यवस्था सोच परिवर्तन चेतना महायज्ञ’ में विश्वास रखने वाले है सभी मुख्य कार्यालय पाक्षिक खेजड़ा एक्सप्रेस प्रकृति शक्ति पीठ, बीकानेर -4 से सम्पर्क करें।

----------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------- ॐ - हमारा ध्येय ब्रह्माण्डिय पर्यावरण सुरक्षा व विश्व शान्ति एवं प्राणियों की स्वास्थ्य रक्षा करनी ही है। आप स्वस्थ रहेंगे तो धर्म-कर्म विद्यापार्जन, धनोपार्जन करेंगे। घर में तुलसी पौध लगाने से सुख-शान्ति मिलती है। प्रकृति शक्ति पीठ, खेजड़ा एक्सप्रेस से तुलसी, पीपल पौध निःशुल्क ले जावें। ------------------------------------------------------------------------------------------------------ पर्यावरण, आध्यात्मिक एवं समसामयिक विचारों एवं स्वास्थ्य रक्षा विषयक धरती से जुड़ा विश्व का अग्रणी ऊँ पाक्षिक खेजड़ा एक्सप्रेस (बीकानेर से प्रकाशित व प्रसारित) ---जगद्गुरु शंकराचार्य भगवान प्रजापति ब्रह्माण्डीय -प्रकृति शक्ति पीठ -बीकानेरjagadguru shankaracharya bhagwan prajapati 

- ऊँ
पाक्षिक खेजड़ा एक्सप्रेस
(बीकानेर से प्रकाशित व प्रसारित)
वर्ष 23अंक 21 दि0 -24-6-11

महान् संत निगमानन्द उच्च कोटि के पर्यावरण प्रेमी गंगा प्रेम ने गंगा बचाने के लिए अपनी देह का त्याग कर दिया, ऐसे उच्च कोटि के संत को प्रकृति शक्तिपीठ, खेजड़ा एक्सप्रेस, ब्रह्माण्ड शान्ति के सभी सदस्य कोटि-कोटि नमन करते हुवे श्रद्धांजलि समर्पित करते हैं और आशा करते हैं कि अन्य सन्त भी निगमानन्द सन्त के देह बलिदान से प्रेरणा लेकर गंगा बचाओ, पर्यावरण बचाओ
Q. What is meaning of Hindu.
Ans.: Lala Lajpat Rai Ed in his introduction of Maharishi Shri Dayanand Sarswati Aur Unka Kam Lahore 1898 said :- Some people according to the author say that this word Hindu is a corrupt from Shindhu but this is wrong because Shindu was the name of the river and not the name of the community moreover, it is correct that this name has been given to the original Aryan race of the region by muslim invaders to humilitate them. In persian, say our author, the word means slave and according to islam, all those who did not embrace islam were termed as slaves.
Further in addition to "black" and "slave" persian and urdu dictionaries describe othe demeaning or contemptuous meaning of "Hindu"
Persian dictionary - lughet - e- kishwari lucknow 1964. chore (thief) dakoo (dacoit) raahzan (waylayer) and gulam (slave)
Urdu-feroze-ul-laghat part-I P. 615 Turkish; Chore, rahzaan and lutera : persian : gulam (salve) barda (obedient servent) Sia faam (black) colour) kalla and black). Page 376 Bhargaw; Dictionery 12th Edition 1965
, विदेशी आक्रमणकारियों , लुटेरों ने हमें गाली के रूप में फारसी भाषा में कहा - तुम चोर, डाकू, लूटेरे, गुलाम , ‘हिन्दू’ होब्रह्माण्ड बचाओ, आन्दोलन को गति प्रदान करे और आवश्यकता पड़ने पर निगमानन्द सन्त का अनुसरण करेंगे, मृत्यु निश्चित है अतः इस मृत्यु को धर्म की रक्षा के लिए अर्पित कर दे तो यह मृत्यु अमरता प्रदान करती है।
आओ, स्वामी, बाबा, सन्तों , धर्म रक्षा करे, आज सनातन धर्म का अस्तित्व खतरे में है इसी कारण पर्यावरण भी खतरे में है। अतः सर्वप्रथम हमें ईश्वरीय कृत सनातन धर्म को बचाना है। आप अब भी शान्त रहे तो आपको ईश्वर माफ नहीं करेगा और जिस आसन पर आप बैठे हो उसी आसन का कर्तव्य है कि वे सनातन धर्म की रक्षा करें। न कि हिन्दू धर्म, डाकू धर्म, गुलाम धर्म ये शब्द देश की गुलामी तक तो हमारे पूर्वजों ने सहन कर लिया अब आप खामोश क्यों हो? आपको जबाब देना होगा।
विदेशी आक्रमणकारियों , लुटेरों ने हमें गाली के रूप में फारसी भाषा में कहा - तुम चोर, डाकू, लूटेरे, गुलाम , ‘हिन्दू’ हो और सैकड़ों वर्ष की गुलामी में हम (आर्य) भूल गये कि हमारी पहचान क्या थी ?

ओ3म्
‘‘हिन्दू’’ शब्द का मंथन: कड़वा सच हिन्दू शब्द विदेशी लुटेरों (फारसियों) का दिया हुआ नाम है। जिसे कुछ लोगांे ने अज्ञानता से सस्ती लोकप्रियता के लिए राजनैतिक, छद्म धर्म संरक्षण देकर ‘‘हिन्दु धर्म’’ के नाम से जबरदस्ती थोपने की कोशीश की है और कर रहे हैं।
जबकि ‘‘हिन्दू शब्द’’ ही वैदिक (सनातन) नहीं है तो फिर हिन्दू धर्म कैसा?
यह कोई बहुत बड़ा षड़यन्त्र तो नहीं?
हजारों वर्षों से जड़ पूजा करते करते हमारी बुद्धि द्वारा आत्मा में भी जड़तत्त्व भाव आ गया है जिसके कारण हम सत्य और असत्य का सही निर्णय नहीं कर पा रहे है। अब इस वैज्ञानिक समय में भी हमने सृष्टिक्रम या वैज्ञानिक पदार्थ विधा को नहीं समझा तो हमारा या आने वाली पीढ़ी का भविष्य क्या होगा यह भयावह कल्पना हम कर ही नहीं सकते। केवल परमात्मा ही जाने। इसलिए हमें अब चैतन आत्म तत्व का सही बोध कर कि मैं यह शरीर नहीं एक आत्मा हूं इस विशेष शरीर रूपी मानव शरीर द्वारा मानव कल्याण एवं सत्य के मार्ग का निर्णय कर इसका आत्मचिन्तन कर परमात्मा द्वारा दिये गये विवेक द्वारा तीन प्रमुख प्रमाणों (प्रत्यक्ष, आगम, अनुमान) वा सृष्टिक्रमानुसार वैज्ञानिक दृष्टि द्वारा निम्न छद्म प्रचलनों को पढ़कर नीचे लिखे प्रश्नों का निर्णय करवाकर हमारा मार्ग दर्शन करने की कृपा करें।
1. जैसे आजकल बीकानेर-ग्रामीण अंचल में मारवाड़ी भाषा में मां व बहन की बुरी से बुरी गाली बोले बिना अपनी बात पूरी नहीं करते फिर भी इसको खुद गाली नहीं मानते यह अशुद्ध भाषा का पाप अज्ञानता वश करके उसके फलरूपी दुःखको भोग रहे हैं।
2. जैसे भारत में छद्म रूपी गांधीवाद चल रहा है जिसका मोहनदास करम चन्द गांधी से नाहीं कोई खून का रिश्ता ना ही अंश, वंश का ही कोई सम्बन्ध है। गांधीजी के सत्य अहिंसा के सत्याग्रह का त्यागरूपी जीवन के तप को आज 60-65 वर्षों से झूठे गांधीवादी उसके तप रूपी फल सुख को भोग रहे हैं। जिससे देश में भ्रष्टाचार व अनैतिकता का दुःख जनता को परमात्मा की न्याय व्यवस्था द्वारा भोगना पड़ रहा है जबकि सच्चे गांधीजी के वंशजों का नाम ही भारत की राजनीति से लुप्त कर दिया गया है।
सिद्धि साधकों द्वारा ही मिलती है। अंधद्धाधावान साधक झूठों को भी सिद्धि दिलवाते हैं। 100 बार बोला जाने वाला झूठ भी आम जन को सत्य प्रतीत होने लग जाता है परन्तु वास्तव में तो झूठ सत्य नहीं हो सकता। वंश में अंश का असर रहता है जैसा बीज होगा वैसा फल भी होगा। जिनका वंश भोगावादी रहा हो तो त्यागी हो ही नहीं सकता ये तो झूठे विकास के नाम पर मानवता का विनाश ही कर सकते है। यह प्रत्यक्ष है।
3. इसी तरह हिन्दू शब्द भी एक गाली है जिसका महर्षि दयानन्द ने अपनी उपदेश मंजरी में फारसी भाषा में हिन्दू का अर्थ काला या फिर चोर बताया है जो पश्चिम देशों से हम भारतीय रंग के तो काले है ही या भारतीय मुसलमान भी हिन्दू को काफीर मानते है। यह बात तो प्रत्यक्ष को प्रमाण से सिद्ध है तो तीसरा अर्थ फारसी डिक्सनरी से निर्णय लिया जा सकता है हमारे वर्तमान इतिहास से भी यह प्रमाणित है कि हिन्दू शब्द फारसी है।
दूसरा इतिहास प्रमाण यह है कि हिन्दू एक जीवन पद्धति है। जो सनातन धर्म या आर्य संस्कृति की पोषक है परन्तु वास्तव में हिन्दूधर्म में सनातन धर्म का छद्म चोगा पहनकर जिन सनातन धर्म व आर्य संस्कृति के विरुद्ध पारिवारिक सामाजिक व धार्मिक कर्मकाण्ड कर ईश्वर व धर्म के नाम पर भ्रम पैदा किया जा रहे है जोकि महाभारत काल से बाद वैदिक सनातन धर्म के विरुद्ध मत पथों का प्रचलन कर मानव से मानव की दूरी बढ़ाई वे देश को कमजोर कर गुलाम बना दिया गया। पुनः वेदों का वो सनातन धर्म का सही बोध करवाकर आत्मजागृति कर राष्ट्रधर्मी बनाकर महर्षि दयानन्द ने स्वराज्य का उद्घोष किया था। उन्हीं का अनुसरण करने वाले राष्ट्रभक्तों द्वारा देश को पुनः आजाद करवाकर प्रजातंत्र की स्थापना करवाई आजादी आन्दोलन के कांग्रेस इतिहास में कांग्रेस अध्यक्ष श्री पद्यामीसीतारमैया द्वारालिखा गया कि आजादी आन्दोलन में 80 प्रतिशत या तो आर्य समाजी थे या आर्य समाज से प्रेरित थे। अतः उस वक्त भी कट्टर पंथियों ने इस देश के दो टुकड़े हिन्दुस्तान और पाकिस्तान तय कर लिये थे। सो वो भू भाग जो कट्टरपंथियों के हाथों में गया वो पाकिस्तान बन गया परन्तु इस भू भाग पर वेद अनुयायी विद्वान कुछ ज्यादा थे सो यह कट्टरवाद न चल सका और इस भू भाग का नाम भारत ही रह गया या उसी नाम से हमारे देश की मुद्रा भी चल रही है फिर भी इस देश का नाम किसी काल में हिन्दुस्तान ना रहने के बावजूद भी (सौ बार के झूठ को सत्य साबित के) आधार पर कई महान् पुरुषों द्वारा हिन्दुस्तान कहा जाता है जो झूठ व पाप है। शब्द संसार का आधार है, शब्द से संस्कार बनते है। या संस्कारों द्वारा किये गई क्रिया से ही स्वभाव बनता है। स्वभाव ही उच्च या निम्न जीवन पद्धति का मार्ग प्रशस्त कर मानव जीवन के लक्ष्य धर्म-अर्थ काम द्वारा मोक्ष द्वार तक पहुंचाता है।
अतः नम्र निवेदन है कि शब्द के सत्य व असत्य का निर्णय करने के लिए आत्मचिन्तन रागद्वेष त्याग का करे।
जैसे मूलशंकर (महर्षि दयानन्द) ने शिवमूर्ति पर चूहे को चढकर प्रसाद खाते देखकर शिव जो चेतन, ब्रह्माण्ड-नियंता सर्वशक्तिमान का यह जड़ स्वरूप देखकर प्रश्न पैदा करना कि यह शिव नहीं है। इसी प्रश्न के उत्तर के लिए अपनापूरा जीवन आहुत कर वैदिक सनातन धर्म का सही स्वरूप व सच्चे शिव को प्राप्त करने का मार्ग अष्टांग योग द्वारा बताकर सभी मानवों को उद्घोष किया कि वेदों की तरफ लौटो, वेद मार्ग के द्वारा ही किया गया विकास ही आस्तिकता युक्त धर्म युक्त वैज्ञानिक या सुखकारी शान्तिदायक होगा। अतः आप मनीषी भी यह पढ़कर स्वयं ही प्रश्न पैदा करे या स्वयं ही उत्तर खोजे या देश में धर्म और सत्य सनातन के नाम के भ्रम का नाश कर अपने स्व कर्तव्य का पालन कर राष्ट्रभक्ति जागृत करें।
- हिन्दू धर्म के दस प्रश्न -
1. हिन्दू धर्म के प्रवर्तक कौन है?
2. हिन्दूधर्म के धर्म ग्रंथ कौन-से है?
3. हिन्दू धर्म का ईश्वर कौन है?
4. हिन्दू धर्म के उपास्य देव कौन-कौन से हैं?
5. हिन्दू धर्म किस समय से चला है समयावधि बताये?
6. हिन्दू धर्मानुसार सृष्टि कब वा कैसे बनी?
7. हिन्दू धर्मानुसार यह सृष्टि एकत्ववाद, द्वैतवाद या त्रैतवाद है?
8. हिन्दू धर्म की पूजा पद्धति क्या है?
9. हिन्दू धर्मानुयायी की जीवन व सामाजिक पद्धति क्या है?
10. हिन्दू शब्द किस भाषा की देन है?

सनातन धर्म के दस उत्तर
1. सनातन धर्म के प्रवर्तक परमपिता परमेश्वर है। जिसका मुख्य नाम ओ3म् है।
2. सनातन धर्म के धर्मग्रंथ चार वेद (ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद व अथर्ववेद) है तथा वेद प्रणीत चार उपवेद छः दर्शन शास्त्र, 11 उपनिषद व चार ब्राह्मण ग्रंथ व मनुस्मृति आदि भी मान्य ग्रंथ है।
3. सनातन धर्म के ईश्वर एक ओ3म् ही है जो सच्चिदानंद स्वरूप, निराकार, सर्वशक्तिमान, न्यायकारी, दयालु, अजन्मा, अनंत, निर्विकार, अनादि, अनुपम, सर्वाघार, सर्वेश्वर, सर्वअन्तरयामी, अजर, अमर, अभय, नित्य पवित्र और सृष्टिकर्मा है।
4. सनातन धर्म के 33 कोटि जड़ देवता 5 चेतन देव या इन सब देवों का महादेव परमपिता परमेश्वर है। जड़ में 8 वसु अग्नि, जल, वायु, पृथ्वी, आकाश, सूर्य, चन्द्रमा एवं नक्षत्र 11 रुद्र पांच प्राण पांच उपप्राण दस वा ग्यारहवीं आत्मा 12 आदित्य वर्ष के बारह महीने जो हमारी आयु को लेता है। एक इन्द्र (ऐश्वर्यदाता) प्रजापति (यज्ञ), चेतनदेव माता, पिता, आचार्य, गुरु एवं पति के पत्नी और पत्नी के लिए पति देवता है।
5.सनातन धर्म सृष्टि प्रारम्भ काल से ही चल रहाहै जिसको 1960853112 वर्षों से चल रहा है। यह वर्तमान प्रचलन ब्रह्माण्ड गणित के आधार पर है।
6.सनातन धर्मानुसार परमपिता परमेश्वर अपने स्व शक्तिमान होने से प्रलय रूपी रात्री का फिर पल मास वर्ष आदि रचकर पूर्व कल्पनुसार सूर्य चन्द्रमा नक्षत्र आदि कि छः चतुर्युगी अमैथुनी सृष्टि का 994 चतुर्युगी मैथुनी सृष्टि चलती है कुल 1000 चतुर्युगी यानी 4,32,00,00,000 वर्षों तक रहती है व इतने समय ही सृष्टि प्रलय (सूक्ष्म रूप) में रहती है।
7. सनातन धर्मानुसार यह सृष्टि त्रेतवाद है (ईश्वर, जीव, प्रकृति)
(1) ईश्वर पूरे ब्रह्माण्ड का एक ही हैं। सच्चिदानन्दस्वरूप, कर्मफल प्रदाता सृष्टि का रचयिता पालनकर्ता एवं प्रलयकर्ता है।
(2) जीव- जो अनंत व सतचित हैं, अल्पज्ञ कर्मफलानुसार जन्म मरण के चक्र में पड़ते हुए श्रेष्ठ योनी मानव द्वारा मोक्ष की भी प्राप्त कर सकते हैं।
(3) प्रकृति - जो केवल सत् है तीन गुणों (सत्व, रज, तम) से युक्त पंच तत्व स्वरूप में साधन मात्र है।
8. सनातन धर्म के पंच महायज्ञ द्वारा चैतन्य एवं जड़ देवों की पूजा (यथायोग्य सत्कार एवं उपयोग) की जाती है।
(1) ब्रह्मयज्ञ - ईश्वर का ध्यान व वैदिक सत्य शास्त्रों का स्वाध्याय।
(2) देवयज्ञ - जड़ देवों का मुख्य अग्नि है सो गौ घृत एवं सुगन्धित, मिष्ठीकारक पुष्टिकारक वनस्पतियों द्वारा हवन करना। वायु का शुद्ध कर स्वास्थ्यवर्धक बनाना।
(3) पितृयज्ञ - जीवत माता, पिता, दादा, दादी, सास, ससुर आदि बड़ों को प्रातः स्नानकर नमस्ते कर उनकी इच्छानुसार भोजन आदि व्यवस्था द्वारा आज्ञा का पालन करना एवं संतान को सुसंस्कारी बनाना।
(4) बलीवैश्व देव यज्ञ - गाय, कुत्ता, चींटी, पक्षी, विकलांग, विधवा आदि गृह पर आश्रितों की यथा शक्ति सेवा करना।
(5) अतिथियज्ञ - कोई वेदों के विद्वान् संन्यासी घर आये तो उनका हृदय से अभिवादन कर उनसे अपनी शंका का समाधान करना एवं उनकी आवश्यकतानुसार भोजन आदि देकर सेवा करना।
9. सनातन धर्मानुसार व्यक्ति चार वर्ण का चार आश्रमों का पालन करते हुए सोलह संस्कारों द्वारा आत्मोन्नत कर अष्टांग योग द्वारा धर्म अर्थ, काम व मोक्ष को प्राप्त करना।
छुआछूत रहित कर्मानुसार वर्णव्यवस्था, मृत्यु भोज, बाल विवाह, बहुविवाह आदि। वर्तमान सामाजिक कुरीतियों से रहित आदर्श, जीने दो और जीओ के आधार पर सामाजिक संरचना करना सर्वे भवन्तु सुखिनः की कामना करना।
10. सनातन धर्मानुसार हम आर्यावर्त के निवासी होने के कारण आदिकाल से आर्य थे परन्तु 17वीं, 18वीं शताब्दी में हमारा हिन्दू जो - हिन्दू शब्द फारसी भाषा या मुसलमानों द्वारा दिया गया हमारा अपमान जनित नाम है। जिसका अर्थ काला, काफीर व चोर बताया है। महाभारत काल तक हमारे महाराजे आर्य पुत्र, ऋषि, महर्षि संतानकहलाती थी परन्तु महाभारत के बाद भी तथाकथित हिन्दू धार्मिक पुराणों में भी किसी महापुरुष या संत आदि को हिन्दू पुत्र नाम से सम्बोधन नहीं आया है तो हम इस अपनी संस्कृति आर्यावर्त देश की परम्परा के श्रेष्ठ नाम आर्य को छोड़ हिन्दू क्यों बोलने लगे या बोल रहे है, गाली ले रहे है इसका विचार कर त्याग करे। व सत्य का ग्रहण करे यही ईश्वर की कामना है।-bhagwan prajapati

-------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------- ॐ - हमारा ध्येय ब्रह्माण्डिय पर्यावरण सुरक्षा व विश्व शान्ति एवं प्राणियों की स्वास्थ्य रक्षा करनी ही है। आप स्वस्थ रहेंगे तो धर्म-कर्म विद्यापार्जन, धनोपार्जन करेंगे। घर में तुलसी पौध लगाने से सुख-शान्ति मिलती है। प्रकृति शक्ति पीठ, खेजड़ा एक्सप्रेस से तुलसी, पीपल पौध निःशुल्क ले जावें। ------------------------------------------------------------------------------------------------------ पर्यावरण, आध्यात्मिक एवं समसामयिक विचारों एवं स्वास्थ्य रक्षा विषयक धरती से जुड़ा विश्व का अग्रणी ऊँ पाक्षिक खेजड़ा एक्सप्रेस (बीकानेर से प्रकाशित व प्रसारित) ---जगद्गुरु शंकराचार्य भगवान प्रजापति ब्रह्माण्डीय -प्रकृति शक्ति पीठ -बीकानेरjagadguru shankaracharya bhagwan prajapati 

- ऊँ
पाक्षिक खेजड़ा एक्सप्रेस
(बीकानेर से प्रकाशित व प्रसारित)
वर्ष 23अंक 22दि0 -9-7-12

हिन्द-हिन्दी-हिन्दू-हिन्दूस्थान - ये सब फारसी नाम !!!
‘हिन्दू’ शब्द को विदेशी मुसलमान, लूटेरांे, आक्रमणकारियों ने भारत के आर्यों पर सदियांे की गुलामी के समय जबरदस्ती थोपा था। हिन्दू का फारसी भाषा में अर्थ है- चोर, डाकू, लुटेरा, गुलाम, राहाजन आदि यह ऐतिहासिक सत्य है।
हिन्द- यानि गुलाम - जयहिन्द, ये गुलामी के पूर्व तक तो ‘जय गुलाम’ सही था। अब कैसा जय गुलाम। अब जय भारत बोलें। हिन्द यानि ‘हिन्द भूमि’ यानि ‘गुलाम भूमि’ गुलामी तक तो सही थी अब ‘भारत भूमि’ आर्य भूमि आदि ही बोलें !
हिन्दी- यानि संस्कृत की एक सरल भाषा परन्तु इसका नाम ‘हिन्दी’ फारसी शब्द है अतः इसका नाम होना चाहिए ‘आर्ष भाषा’ या देवनागरी भाषा !!
हिन्दू- यानि चोर, डाकू, लूटेरे, राहजन, काला, गुलाम आदि आदि जो कि सदियो की गुलामी में तो ठीक था अब हमें अपने मूल रूप ‘आर्य’ में आना चाहिए। आओ हम आर्य बनें, एक बनें !!!
हिन्दूस्थान- यानि ‘गुलामस्थान’ को बदलकर आर्य स्थान बोलें । विश्व आर्य परिषद, विश्व आर्य धर्म आदि नवीन नामकरण संस्कार से असीम शांति मिलेगी, करके देखो। बोलें !!!!
इस प्रकार उपरोक्त सभी नामों को जिस प्रकार बम्बई से मुम्बई, मद्रास से चैन्नई, कलकत्ता से कोलकाता आदि कई जगहों के नाम को बदलकर मूल रूप में रखने से शांति मिली है वैसे ही इन हिन्द, हिन्दू आदि नामों को आर्य रूप में संसोधन से भी असीम शांति मिलेगी, करके देखो। ‘हिन्दू’ शब्द का फारसी भाषा में मूल अर्थ है- चोर, डाकू, लुटेरे, राहजन, काला, गुलाम आदि यह ऐतिहासिक सत्य है।

What is meaning of Hindu.
Ans.: Lala Lajpat Rai Ed in his introduction of Maharishi Shri Dayanand Sarswati Aur Unka Kam Lahore 1898 said :- Some people according to the author say that this word Hindu is a corrupt from Shindhu but this is wrong because Shindu was the name of the river and not the name of the community moreover, it is correct that this name has been given to the original Aryan race of the region by muslim invaders to humilitate them. In persian, say our author, the word means slave and according to islam, all those who did not embrace islam were termed as slaves.
Further in addition to "black" and "slave" persian and urdu dictionaries describe othe demeaning or contemptuous meaning of "Hindu"
Persian dictionary - lughet - e- kishwari lucknow 1964. chore (thief) dakoo (dacoit) raahzan (waylayer) and gulam (slave)
Urdu-feroze-ul-laghat part-I P. 615 Turkish; Chore, rahzaan and lutera : persian : gulam (salve) barda (obedient servent) Sia faam (black) colour) kalla and black). Page 376 Bhargaw; Dictionery 12th Edition 1965




अब हमें चोर, डाकू, लूटेरे, गुलाम, राहजन नहीं रहना है। हम श्रेष्ठ है। हम आर्य है। राम और कृष्ण आर्य थे। गुरुनानक देव राम के वंशज है।
हस्तिनापुर के वंशज अन्तिम सम्राट श्री पृथ्वीराज चैहान तक हमारी पहचान आर्य थी। बाद में विदेशियों के आधीन हो गये। हमारी पहचान ही खत्म हो गई। वर्तमान में आर्य समाज की संस्थाएं व सदस्य जरूर है।
सिकन्दर ने भी हिन्दू शब्द को बोला था परन्तु प्रचलित 1000 ई. के बाद ही हुआ है। महमूद गजनवी ने 997 ई. से भारत में 27 डाके डाले। मोहम्मद गौरी ने पृथ्वीराज चैहान से कई लड़ाईयां लड़ी दोनों का अन्त हो गया। बाबर आक्रमणकारी था। फिर यहीं रहने का मन बनाया था आदि-आदि के साथ ही ‘हिन्दू’ शब्द आया।
विदेशी, लूटेरों, आक्रमणकारियों के अत्याचार से आर्य हिन्दू-मुस्लिम में बंट गये।
आओ हम आर्य बने, श्रेष्ठ बने, एक बने - हे श्रेष्ठ जनों, हे आर्यों, विदेशी इस्लामिक लूटेरों, आक्रमणकारियों ने भारतवर्ष में शान्तिमय जीवन यापन करने वाले त्यागी, तपस्वी, हमारे पूर्वजों को घोर यातनाएं देकर हिन्दू और मुस्लमान बना दिये।
अब आप स्वतन्त्र हो, आईये हम श्रेष्ठ बने! आर्य बने!! एक बने!!!
‘हिन्दू’ धर्म का कोई प्रवर्तक नहीं है यानि ‘हिन्दू धर्म’ नहीं है। यह झूठ प्रपंच का मनगढन्त नाम है। आप मनीषी भी यह पढ़कर स्वयं ही प्रश्न पैदा करे या स्वयं ही उत्तर खोजे या देश में धर्म और सत्य सनातन के नाम के भ्रम का नाश कर अपने स्व कर्तव्य का पालन कर राष्ट्रभक्ति जागृत करें।
- हिन्दू धर्म के दस प्रश्न -
1. हिन्दू धर्म के प्रवर्तक कौन है?
2. हिन्दूधर्म के धर्म ग्रंथ कौन-से है?
3. हिन्दू धर्म का ईश्वर कौन है?
4. हिन्दू धर्म के उपास्य देव कौन-कौन से हैं?
5. हिन्दू धर्म किस समय से चला है समयावधि बताये?
6. हिन्दू धर्मानुसार सृष्टि कब वा कैसे बनी?
7. हिन्दू धर्मानुसार यह सृष्टि एकत्ववाद, द्वैतवाद या त्रैतवाद है?
8. हिन्दू धर्म की पूजा पद्धति क्या है?
9. हिन्दू धर्मानुयायी की जीवन व सामाजिक पद्धति क्या है?
10. हिन्दू शब्द किस भाषा की देन है?
सनातन धर्म के दस उत्तर
1. सनातन धर्म के प्रवर्तक परमपिता परमेश्वर है। जिसका मुख्य नाम ओ3म् है।
2. सनातन धर्म के धर्मग्रंथ चार वेद (ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद व अथर्ववेद) है तथा वेद प्रणीत चार उपवेद छः दर्शन शास्त्र, 11 उपनिषद व चार ब्राह्मण ग्रंथ व मनुस्मृति आदि भी मान्य ग्रंथ है।
3. सनातन धर्म के ईश्वर एक ओ3म् ही है जो सच्चिदानंद स्वरूप, निराकार, सर्वशक्तिमान, न्यायकारी, दयालु, अजन्मा, अनंत, निर्विकार, अनादि, अनुपम, सर्वाधार, सर्वेश्वर, सर्वअन्तरयामी, अजर, अमर, अभय, नित्य पवित्र और सृष्टिकर्मा है।
4. सनातन धर्म के 33 कोटि जड़ देवता 5 चेतन देव या इन सब देवों का महादेव परमपिता परमेश्वर है। जड़ में 8 वसु अग्नि, जल, वायु, पृथ्वी, आकाश, सूर्य, चन्द्रमा एवं नक्षत्र 11 रुद्र पांच प्राण पांच उपप्राण दस वा ग्यारहवीं आत्मा 12 आदित्य वर्ष के बारह महीने जो हमारी आयु को लेता है। एक इन्द्र (ऐश्वर्यदाता) प्रजापति (यज्ञ), चेतनदेव माता, पिता, आचार्य, गुरु एवं पति के पत्नी और पत्नी के लिए पति देवता है।
5.सनातन धर्म सृष्टि के प्रारम्भ काल से ही चल रहा है जिसको 1960853112 वर्षों से चल रहा है। यह वर्तमान प्रचलन ब्रह्माण्ड गणित के आधार पर है।
6.सनातन धर्मानुसार परमपिता परमेश्वर अपने स्व शक्तिमान होने से प्रलय रूपी रात्री का फिर पल मास वर्ष आदि रचकर पूर्व कल्पनुसार सूर्य चन्द्रमा नक्षत्र आदि कि छः चतुर्युगी अमैथुनी सृष्टि और 994 चतुर्युगी मैथुनी सृष्टि चलती है कुल 1000 चतुर्युगी यानी 4,32,00,00,000 वर्षों तक रहती है व इतने समय ही सृष्टि प्रलय (सूक्ष्म रूप) में रहती है।
7. सनातन धर्मानुसार यह सृष्टि त्रेतवाद है (ईश्वर, जीव, प्रकृति)
(1) ईश्वर पूरे ब्रह्माण्ड का एक ही हैं। सच्चिदानन्दस्वरूप, कर्मफल प्रदाता सृष्टि का रचयिता पालनकर्ता एवं प्रलयकर्ता है।
(2) जीव- जो अनंत व सतचित्त हैं, अल्पज्ञ कर्मफलानुसार जन्म मरण के चक्र में पड़ते हुए श्रेष्ठ योनी मानव द्वारा मोक्ष की भी प्राप्त कर सकते हैं।
(3) प्रकृति - जो केवल सत् है तीन गुणों (सत्व, रज, तम) से युक्त पंच तत्व स्वरूप में है।
8. सनातन धर्म के पंच महायज्ञ द्वारा चैतन्य एवं जड़ देवों की पूजा (यथायोग्य सत्कार एवं उपयोग) की जाती है।
(1) ब्रह्मयज्ञ - ईश्वर का ध्यान व वैदिक सत्य शास्त्रों का स्वाध्याय।
(2) देवयज्ञ - जड़ देवों का मुख अग्नि है सो गौ घृत एवं सुगन्धित, मिष्ठीकारक पुष्टिकारक वनस्पतियों द्वारा हवन करना। वायु का शुद्ध कर स्वास्थ्यवर्धक बनाना।
(3) पितृयज्ञ - जीवत माता, पिता, दादा, दादी, सास, ससुर आदि बड़ों को प्रातः स्नानकर नमस्ते कर उनकी इच्छानुसार भोजन आदि व्यवस्था करना उनकी आज्ञा का पालन करना एवं संतान को सुसंस्कारी बनाना।
(4) बलीवैश्व देव यज्ञ - गाय, कुत्ता, चींटी, पक्षी, विकलांग, विधवा आदि गृह पर आश्रितों की यथा शक्ति सेवा करना।
(5) अतिथियज्ञ - कोई वेदों के विद्वान् संन्यासी घर आये तो उनका हृदय से अभिवादन कर उनसे अपनी शंका का समाधान करना एवं उनकी आवश्यकतानुसार भोजन आदि देकर सेवा करना।
9. सनातन धर्मानुसार व्यक्ति चार वर्ण का चार आश्रमों का पालन करते हुए सोलह संस्कारों द्वारा आत्मोन्नत कर अष्टांग योग द्वारा धर्म अर्थ, काम व मोक्ष को प्राप्त करना।
छुआछूत रहित कर्मानुसार वर्णव्यवस्था, मृत्यु भोज, बाल विवाह, बहुविवाह आदि। वर्तमान सामाजिक कुरीतियों से रहित आदर्श, जीने दो और जीओ के आधार पर सामाजिक संरचना करना सर्वे भवन्तु सुखिनः की कामना करना।
10. सनातन धर्मानुसार हम आर्यावर्त के निवासी होने के कारण आदिकाल से आर्य थे परन्तु 957 ईश्वी से विदेशी लूटेरों, आक्रमणकारियों ने हिन्दू शब्द जो फारसी भाषा में मुसलमानों द्वारा दिया गया हमारा अपमान जनित नाम है। जिसका अर्थ काला, चोर, डाकू, लूटेरा, गुलाम आदि बताया है। महाभारत काल तक हमारे महाराजे आर्य पुत्र, ऋषि, महर्षि संतान कहलाती थी परन्तु महाभारत के बाद भी किसी भी धर्मशास्त्र पुराणों में भी किसी महापुरुष या संत आदि को हिन्दू पुत्र नाम से सम्बोधन नहीं आया है तो हम इस अपनी संस्कृति आर्यावर्त देश की परम्परा के श्रेष्ठ नाम आर्य को छोड़ हिन्दू क्यों बोलने लगे या बोल रहे है, गाली ले रहे है। शब्द संसार ब्राह्मण्ड का सार है शब्द से संस्कार बनते है और इसी हिन्दू शब्द के ये गूढ़ अर्थ यानि चोर, डाकू, लुटेरा, राहजन आदि को न समझने के कारण त्याग, तपस्वी भारत भूमि के त्यागी तपस्वी संतगणों, विद्वानों ने भी हिन्दू पथ पर चलना शुरू कर दिया है। यहाँ तक कि किसान व मजदूर वर्ग भी संतों, विद्वानों व राज में उच्च पदासीनों को हिन्दू यानि चोर, डाकू, राहजन की ओर अग्रसर होते देख क्षुब्ध है और वे भी मौके की तलाश में है। यहाँ तक अध्यापकगण यानि गुरुजन भी ऐसी भयावनी स्थिति में है का गम्भीरता से चिंतन-मनन करें । इसका विचार कर ‘हिन्द’, ‘हिन्दी’, ‘हिन्दू’ और ‘हिन्दूस्थान’ शब्दों का परित्याग करें और इसकी जगह ‘हिन्द’ यानि भारत, ‘हिन्दी’ यानि आर्ष भाषा, देवनागरी, ‘हिन्दू’ यानि आर्य, ‘हिन्दूस्थान’ यानि आर्यस्थान बोलने का प्रचलन शुरू करें । सत्य को ग्रहण करे यही ईश्वर की कामना है।
इनके अलावा हमारी शोध के आधार पर निम्नलिखित 11 प्रश्न और है जो हमने अन्यों से पत्र-प्रेषित करके पूछे थे जिनका उत्तर आज तक नहीं आया । इन सभी का हम ही उत्तर दे सकते है फिर भी आप मनीषी भी इस पर चिंतन-मनन अवश्य करें।
1. सनातन धर्म प्राचीन होते हुवे भी सिमट कर रह गया क्यों? जबकि दूसरे धर्मों का विश्व में राज चलता है।
2. सभी धर्मों में शान्ति का उल्लेख है फिर आतंकवाद क्यों बढ़ रहा है?
3. आतंकवाद रूपी राक्षस की उत्पत्ति कैसे हुई?
4. सन्तों के प्रवचनों का असर क्यों नहीं पड़ रहा है जबकि करोड़ो रुपये सन्तों के प्रवचनों में खर्च होते है। देखने में ओर सुनने में आया है कि जो सन्तों के पास ज्यादा रहते है उनमें से अधिकांश घोटाला-घपलों में क्यों लिप्त है?
5. आज मनुष्य की गरिमा उसके चरित्र से न आंककर धन से आंककर धन के महत्त्व को बढ़ावा क्यों दिया जा रहा है?
6. अधिकांश की येन-केन प्रकरेण अनिति से धन संचय करने की प्रवृति क्यों बढ़ रही है?
7. वर्तमान में वाहन दुर्घटनाएं क्यों बढ़ रही है? (वाशिंगटन, कैलिफोर्निया, यूनिवर्सिटी के मनोवैज्ञानिकों ने कहा कि ध्वनि प्रदूषण, संगीत से वाहन दुर्घटनाएं आदि होते हैं। (28 जून के दैनिक अखबार में प्रकाशित) जबकि खेजड़ा ऐक्सप्रेस ने शोध करके पाँच वर्ष पहले पता कर लिया था कि ध्वनि प्रदूषण, गीतों से वाहन दुर्घटनाएं, बहरापन आदि होती है जो कि 24 अप्रैल 2008 के अंक में 20 अप्रैल को प्रकृति शक्तिपीठ खेजड़ा के कार्यालय में प्रजापति ने शोध पत्र पढ़ा था जिसमें ध्वनि प्रदूषण से वाहन दुर्घटनाएं व अर्द्ध विक्षुप्ता, बहरापन आदि विस्तार से बताया है तथा दुर्घटनाओं के बारे में ओर भी जानकारी की है। सरकार को भी पत्र लिखें। न ही सरकार ने ध्यान दिया और न ही मीडिया ने, जबकि अब अमेरिका केे मनोवैज्ञानिकों की शोध को प्रचारित-प्रसारित कर रहे है।)
8. बच्चों व युवाओं में भी नशे की प्रवृति क्यों बढ़ रही है?
9. अनेक सन्त दुष्आचरण में लिप्त क्यों होते जा रहे हैं?
10. अकाल क्यों पड़ते हैं?
11. कमजोर मानसून में अच्छी वर्षा कैसे ली जा सकती है? आदि आदि अनेकानेक शोध जिसमें अकाल पर शोध में लगभग 30 वर्ष लगे है।
हमारा धर्म ‘सनातन धर्म’ है जिसका प्रवर्तक , ओ3म्, ओं है। आईये इस ‘व्यवस्था सोच परिवर्तन चेतना महायज्ञ’ के जनजागृति अभियान में शामिल हाइये और अनेकानेक गूढ जानकारियों के साथ भारत को विश्व की अग्रणी शक्ति बनाने में अपना योगदान दीजिये।
ओं-शान्ति-शान्ति-शान्ति।
अतः जो भारतीय आर्य है और ‘व्यवस्था सोच परिवर्तन चेतना महायज्ञ’ में विश्वास रखने वाले है सभी मुख्य कार्यालय ‘पाक्षिक खेजड़ा एक्सप्रेस, प्रकृति शक्ति पीठ, बीकानेर -4 से सम्पर्क करें और अधिक जानकारी के लिए खेजड़ा एक्सप्रेस पढ़े।
नोट: विदेशी महमूद गजनवी ने भारत को 27 डाकों से लूटा, लूट के माल से गजनी को सजाया। गजनी जलकर राख हो गई तो आज भारत को अपने ही लूट कर विदेशों में धन जमा कर रहे है। तो जब ये लूटेरे मरेंगे तो इनका विदेशों में धन भी जलकर राख हो जायेगा। (कृपया इस पत्र को आप पढ़कर फैंके नहीं। यह पत्र आपके उज्ज्वल भविष्य की ईश्वर से प्रार्थना करता है। प्राणियों का कल्याण हो।)
एक बात ओर- हे महामानव आप आर्य है, आप श्रेष्ठ है। आप हमें पत्र लिखें, फोन करें, सम्पर्क करें।

------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------ ॐ - हमारा ध्येय ब्रह्माण्डिय पर्यावरण सुरक्षा व विश्व शान्ति एवं प्राणियों की स्वास्थ्य रक्षा करनी ही है। आप स्वस्थ रहेंगे तो धर्म-कर्म विद्यापार्जन, धनोपार्जन करेंगे। घर में तुलसी पौध लगाने से सुख-शान्ति मिलती है। प्रकृति शक्ति पीठ, खेजड़ा एक्सप्रेस से तुलसी, पीपल पौध निःशुल्क ले जावें। ------------------------------------------------------------------------------------------------------ पर्यावरण, आध्यात्मिक एवं समसामयिक विचारों एवं स्वास्थ्य रक्षा विषयक धरती से जुड़ा विश्व का अग्रणी ऊँ पाक्षिक खेजड़ा एक्सप्रेस (बीकानेर से प्रकाशित व प्रसारित) ---जगद्गुरु शंकराचार्य भगवान प्रजापति ब्रह्माण्डीय -प्रकृति शक्ति पीठ -बीकानेरjagadguru shankaracharya bhagwan prajapati 

----- ऊँ
पाक्षिक खेजड़ा एक्सप्रेस
(बीकानेर से प्रकाशित व प्रसारित)
वर्ष 23अंक 23दि0 -24-7-12

स्वतन्त्रता के 64 वर्ष बाद भी! गुलामी के शब्द! क्यों? क्यों?? क्यों??? जबकि शब्द से संस्कार बनते हैं!
प्रश्न: हिन्दू शब्द का अर्थ क्या है?
उत्तर: हिन्दू का अर्थ है लाजपत राय ने अपने परिचय में - महर्षि दयानन्द के लाहौर 1898 के परिचय के बारे में कहा: लेखक के अनुसार कुछ लोग कहते है कि हिन्दू है जो कि सिन्ध का बिगड़ा हुआ नाम है लेकिन यह गलत है। परन्तु सिन्धू एक नदी का नाम है। किसी समुदाय का नाम नहीं है । यह सही है कि यह नाम असली आर्यन जाति को दिया गया है जो कि इस क्षेत्र में मुस्लिम आक्रान्ताओं द्वारा अपमानित करने के लिए इस नाम से पुकारी जाती थी। फारस में लेखक हमारे लेखक कहते है इस शब्द का तात्पर्य ‘दास’ है और इस्लाम के अनुसार वो सारे लोग जिन्होंने इस्लाम को नहीं अपनाया था उनको दास बना दिया गया।
आगे ‘काला’ और ‘दास’ संकलन में फारसी और उर्दू भाषा के शब्द कोष यह वर्णन करते है कि यह अर्थहीन और घ्रणित ‘हिन्दू’ शब्द का अर्थ है- फारसी भाषा का शब्दकोष - ल्युजत-ए-किशवारी, लखनऊ 1964, चोर, डाकू, राहजन, गुलाम, दास। उर्दू फिरोजउल लजत-प्रथम भाग पृ. 615, तुर्की चोर, राहजन, लूटेरा: फारसी गुलाम, दास, बारदा (आज्ञाकारी नौकर), शियाकाम (काला) पेज 376 भार्गव शब्द कोष बारवां संकलन 1965 भी देखे)
परसियन - पंजाबी (डिक्सनरी) शब्द कोश (पंजाबी यूनिवर्सिटी, पटियाला) भारतीय उपमहाद्वीप के निवासी, डाकू, राहजन, चोर, दास, काला, आलसी।
(हिन्दुकुश - यानि भ्पदकन ज्ञपससमतए ैसंनहीजंतद्ध
स्वतन्त्रता के 64 वर्ष बाद भी! गुलामी के शब्द! क्यों? क्यों?? क्यों??? जबकि शब्द से संस्कार बनते हैं!
प्रश्न: हिन्दू शब्द का अर्थ क्या है?
उत्तर: हिन्दू का अर्थ है लाजपत राय ने अपने परिचय में - महर्षि दयानन्द के लाहौर 1898 के परिचय के बारे में कहा: लेखक के अनुसार कुछ लोग कहते है कि हिन्दू है जो कि सिन्ध का बिगड़ा हुआ नाम है लेकिन यह गलत है। परन्तु सिन्धू एक नदी का नाम है। किसी समुदाय का नाम नहीं है । यह सही है कि यह नाम असली आर्यन जाति को दिया गया है जो कि इस क्षेत्र में मुस्लिम आक्रान्ताओं द्वारा अपमानित करने के लिए इस नाम से पुकारी जाती थी। फारस में लेखक हमारे लेखक कहते है इस शब्द का तात्पर्य ‘दास’ है और इस्लाम के अनुसार वो सारे लोग जिन्होंने इस्लाम को नहीं अपनाया था उनको दास बना दिया गया।
आगे ‘काला’ और ‘दास’ संकलन में फारसी और उर्दू भाषा के शब्द कोष यह वर्णन करते है कि यह अर्थहीन और घ्रणित ‘हिन्दू’ शब्द का अर्थ है- फारसी भाषा का शब्दकोष - ल्युजत-ए-किशवारी, लखनऊ 1964, चोर, डाकू, राहजन, गुलाम, दास। उर्दू फिरोजउल लजत-प्रथम भाग पृ. 615, तुर्की चोर, राहजन, लूटेरा: फारसी गुलाम, दास, बारदा (आज्ञाकारी नौकर), शियाकाम (काला) पेज 376 भार्गव शब्द कोष बारवां संकलन 1965 भी देखे)
परसियन - पंजाबी (डिक्सनरी) शब्द कोश (पंजाबी यूनिवर्सिटी, पटियाला) भारतीय उपमहाद्वीप के निवासी, डाकू, राहजन, चोर, दास, काला, आलसी।
(हिन्दुकुश - यानि भ्पदकन ज्ञपससमतए ैसंनहीजंतद्ध
स्वतन्त्रता के 64 वर्ष बाद भी! गुलामी के शब्द! क्यों? क्यों?? क्यों??? जबकि शब्द से संस्कार बनते हैं!
प्रश्न: हिन्दू शब्द का अर्थ क्या है?
उत्तर: हिन्दू का अर्थ है लाजपत राय ने अपने परिचय में - महर्षि दयानन्द के लाहौर 1898 के परिचय के बारे में कहा: लेखक के अनुसार कुछ लोग कहते है कि हिन्दू है जो कि सिन्ध का बिगड़ा हुआ नाम है लेकिन यह गलत है। परन्तु सिन्धू एक नदी का नाम है। किसी समुदाय का नाम नहीं है । यह सही है कि यह नाम असली आर्यन जाति को दिया गया है जो कि इस क्षेत्र में मुस्लिम आक्रान्ताओं द्वारा अपमानित करने के लिए इस नाम से पुकारी जाती थी। फारस में लेखक हमारे लेखक कहते है इस शब्द का तात्पर्य ‘दास’ है और इस्लाम के अनुसार वो सारे लोग जिन्होंने इस्लाम को नहीं अपनाया था उनको दास बना दिया गया।
आगे ‘काला’ और ‘दास’ संकलन में फारसी और उर्दू भाषा के शब्द कोष यह वर्णन करते है कि यह अर्थहीन और घ्रणित ‘हिन्दू’ शब्द का अर्थ है- फारसी भाषा का शब्दकोष - ल्युजत-ए-किशवारी, लखनऊ 1964, चोर, डाकू, राहजन, गुलाम, दास। उर्दू फिरोजउल लजत-प्रथम भाग पृ. 615, तुर्की चोर, राहजन, लूटेरा: फारसी गुलाम, दास, बारदा (आज्ञाकारी नौकर), शियाकाम (काला) पेज 376 भार्गव शब्द कोष बारवां संकलन 1965 भी देखे)
परसियन - पंजाबी (डिक्सनरी) शब्द कोश (पंजाबी यूनिवर्सिटी, पटियाला) भारतीय उपमहाद्वीप के निवासी, डाकू, राहजन, चोर, दास, काला, आलसी।
(हिन्दुकुश - यानि भ्पदकन ज्ञपससमतए ैसंनहीजंतद्ध
हमारा धर्म ‘सनातन धर्म’ है जिसका प्रवर्तक , ओ3म्, ओं है। आईये इस ‘व्यवस्था सोच परिवर्तन चेतना महायज्ञ’ के जनजागृति अभियान में शामिल हाइये और अनेकानेक गूढ जानकारियों के साथ भारत को विश्व की अग्रणी शक्ति बनाने में अपना योगदान दीजिये।
ओं-शान्ति-शान्ति-शान्ति।
अतः जो भारतीय है, आर्य है और ‘व्यवस्था सोच परिवर्तन चेतना महायज्ञ’ में विश्वास रखने वाले है सभी मुख्य कार्यालय ‘पाक्षिक खेजड़ा एक्सप्रेस, प्रकृति शक्ति पीठ, बीकानेर -4 से सम्पर्क करें और अधिक जानकारी के लिए खेजड़ा एक्सप्रेस पढ़े।
नोट: विदेशी महमूद गजनवी ने भारत को 27 डाकों से लूटा, लूट के माल से गजनी को सजाया। गजनी जलकर राख हो गई तो आज भारत को अपने ही लूट कर विदेशों में धन जमा कर रहे है। तो जब ये लूटेरे मरेंगे तो इनका विदेशों में धन भी जलकर राख हो जायेगा। (कृपया इस पत्र को आप पढ़कर फैंके नहीं। यह पत्र

आपके उज्ज्वल भविष्य की ईश्वर से प्रार्थना करता है। प्राणियों का कल्याण हो।)
एक बात ओर- हे महामानव आप आर्य है, आप श्रेष्ठ है। आप हमें पत्र लिखें, फोन

करें, सम्पर्क करें।
जय सनातन-जय भारत-जय आर्यन
-भगवान प्रजापति
- अधिष्ठाता प्रकृति शक्ति पीठ-

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(बीकानेर से प्रकाशित व प्रसारित)
वर्ष 23अंक 24दि0 -9-8-11

सनातन धर्म ही मानव धर्म है।
माता-पिता-गुरु की छत्रछाया में बौद्धिक व शारीरिक विकास सम्भव है।
सनातन धर्म हमें सिखाता है माता-पिता-गुरु के प्रति श्रद्धा रखे, सेवा करें। सनातन धर्म रूपी वृक्ष अपने आप में महाशास्त्र है। महावृक्ष है। तथा माता-पिता-गुरु है, अतः इसकी छत्रछाया में ही हमारा कल्याण है।
ऊँ ब्रह्माण्ड-ओंम शान्ति
(ब्रह्माण्डीय पर्यावरण सुरक्षा एवं प्राकृत, योग, अध्यात्म शोध पीठ)
प्रकृति शक्ति पीठ (खेजड़ा)
विश्वकर्मा गेट के बाहर, बीकानेर-04 (राज.)
मो. 7737957772, सनातन धर्म ही मानव धर्म है।
माता-पिता-गुरु की छत्रछाया में बौद्धिक व शारीरिक विकास सम्भव है।
सनातन धर्म हमें सिखाता है माता-पिता-गुरु के प्रति श्रद्धा रखे, सेवा करें। सनातन धर्म रूपी वृक्ष अपने आप में महाशास्त्र है। महावृक्ष है। तथा माता-पिता-गुरु है, अतः इसकी छत्रछाया में ही हमारा कल्याण है।
ऊँ ब्रह्माण्ड-ओंम शान्ति
(ब्रह्माण्डीय पर्यावरण सुरक्षा एवं प्राकृत, योग, अध्यात्म शोध पीठ)
प्रकृति शक्ति पीठ (खेजड़ा)
विश्वकर्मा गेट के बाहर, बीकानेर-04 (राज.)
मो. 7737957772, e-mail : [email protected]
(संयोजक - सुश्री दया प्रजापति )LL.M., NET (राष्ट्रपति अवार्ड से विभूषित)
सनातन धर्म की रक्षा व प्रसार-प्रचार का दायित्व संतों, धर्मगुरुओं, ब्राह्मणों का था और है भी। इन्होंने अपने दायित्व का निर्वाह क्यों नहीं किया?
आज हिन्दू धर्म (डाकू, चोर आदि) धर्म भारतीय कागजों में घुस गया। सनातन धर्म को खदेड़ कर जन-जन में प्रवेश कर रहा है। क्यों ? क्यों?? आखिर क्यों??? जबकि सनातन धर्म एक विशाल महाशास्त्र, महावृक्ष है, समस्त प्राणियों की रक्षा का धर्म है सनातन धर्म का प्रवर्तक , ओंम है। हिन्दू धर्म का कोई प्रवर्तक नहीं है। सरकारी तन्त्र एवं बौद्धिक तन्त्र, साहित्यकारों, देश के कर्णधारों, नेताओं ने स्वतन्त्रता के 64 वर्ष बाद भी गुलामी के शब्दों को क्यों फलीभूत होने दिया इसका जिम्मेदार कौन है? कौन है?? कौन है??? जबकि शब्द से संस्कार बनते हैं। इतने बड़े षड़यन्त्र का रहस्य क्या है? सर्वोच्च सत्ता, न्याय शक्ति इसकी जांच करें। यह सर्वविदित है कि सभी धर्मो का कोई न कोई प्रवर्तक है फिर भी पिता हीन, प्रवर्तक हीन, हिन्दू धर्म को भारतीय पन्नों में क्यों घुसने दिया, इसके जिम्मेदार कौन है? कौन है?? कौन है??? जनता (आर्यन) जवाब मांग रही है। अतः हिन्द, हिन्दी, हिन्दू, हिन्दुस्तान, हिन्दू धर्म को भारतीय पन्नों से तुरन्त प्रभाव से हटाया जाए। ऐसा करने से सही रूप में स्वतन्त्रता का आभास होगा और असीम शान्ति मिलेगी। करके देखो !
ब्रह्माण्डीय पर्यावरण सन्तुलन तो नितांत आवश्यक है सामाजिक सन्तुलन भी आवश्यक है।
‘‘व्यवस्था सोच-परिवर्तन चेतना महायज्ञ’’ का ‘‘जनजागृति अभियान’’
स्वतन्त्रता के 64 वर्ष बाद भी! गुलामी के शब्द! क्यों? क्यों?? क्यों??? जबकि शब्द से संस्कार बनते हैं!
सेवामें, ........................................हे मनीषी, महामानव आज सनातन धर्म खतरे में है। सनातन धर्म को विलुप्त करने का बहुत बड़ा षड़यन्त्र चल रहा है। हमें सनातन धर्म की रक्षा करनी है। अतः कृपया आप अपने पद की गरीमा को ध्यान में रखते हुए मौन का परित्याग कर हमारी रणनीति में सहयोग करने की कृपा करें ताकि सनातन धर्म को विलुप्त करने के षड़यंत्र को विफल कर सके। सनातन धर्म की पूजा एक साथ करने का समय भी निश्चित कर सकें।
हिन्द-हिन्दी-हिन्दू-हिन्दुस्थान - ये सब फारसी नाम !!!
‘हिन्दू’ शब्द को विदेशी मुसलमान, लूटेरांे, आक्रमणकारियों ने भारत के आर्यों पर सदियांे की गुलामी के समय जबरदस्ती थोपा था। हिन्दू का फारसी भाषा में अर्थ है- चोर, डाकू, लुटेरा, गुलाम, राहजन आदि यह ऐतिहासिक सत्य है।
‘हिन्द’- यानि गुलाम - जयहिन्द, ये गुलामी के पूर्व तक तो ‘जय गुलाम’ सही था। अब कैसा जय गुलाम। अब जय भारत बोलें। हिन्द ‘हिन्द भूमि’ यानि ‘गुलाम भूमि’ गुलामी तक तो सही थी अब ‘भारत भूमि’ आर्य भूमि आदि ही बोलें !
‘हिन्दी’- यानि संस्कृत की एक सरल भाषा परन्तु इसका नाम ‘हिन्दी’ फारसी शब्द है अतः इसका नाम होना चाहिए ‘आर्ष भाषा’ या देवनागरी भाषा !!
‘हिन्दू’- यानि चोर, डाकू, लूटेरे, राहजन, काला, गुलाम आदि आदि जो कि सदियो की गुलामी में तो ठीक था अब हमें अपने मूल रूप ‘आर्य’ में आना चाहिए। आओ हम आर्य बनें, एक बनें , श्रेष्ठ बनें !!!
‘हिन्दुस्थान’- यानि ‘गुलामस्थान’ को बदलकर आर्य स्थान बोलें । विश्व हिन्दू परिषद् की जगह विश्व आर्य परिषद् या विश्व सनातन परिषद् या विश्व भारत परिषद् आदि नवीन नामकरण संस्कार से असीम शांति मिलेगी। करके देखो !!!
इस प्रकार उपरोक्त सभी नामों को जिस प्रकार बम्बई से मुम्बई, मद्रास से चैन्नई, कलकत्ता से कोलकाता आदि कई जगहों के नाम को बदलकर मूल रूप में रखने से शांति मिली है वैसे ही इन हिन्द, हिन्दू आदि नामों को आर्य रूप में संसोधन से भी असीम शांति मिलेगी, करके देखो।
‘हिन्दू’ शब्द का फारसी भाषा में मूल अर्थ है- चोर, डाकू, लुटेरे, राहजन, काला, गुलाम आदि। यह ऐतिहासिक सत्य है।
प्रश्न: हिन्दू शब्द का अर्थ क्या है?
उत्तर: हिन्दू का अर्थ है-लाला लाजपत राय ने अपने परिचय में - महर्षि दयानन्द के लाहौर 1898 के परिचय के बारे में कहा: लेखक के अनुसार कुछ लोग कहते है कि हिन्दू है जो कि सिन्धु का बिगड़ा हुआ नाम है लेकिन यह गलत है। परन्तु सिन्धु एक नदी का नाम है। किसी समुदाय का नाम नहीं है । यह सही है कि यह नाम असली आर्यन जाति को दिया गया है जो कि इस क्षेत्र में मुस्लिम आक्रान्ताओं द्वारा अपमानित करने के लिए इस नाम से पुकारी जाती थी। फारस में लेखक हमारे लेखक कहते है इस शब्द का तात्पर्य ‘दास’ है और इस्लाम के अनुसार वो सारे लोग जिन्होंने इस्लाम को नहीं अपनाया था उनको दास बना दिया गया।
आगे ‘काला’ और ‘दास’ संकलन में फारसी और उर्दू भाषा के शब्द कोष यह वर्णन करते है कि यह अर्थहीन और घ्रणित ‘हिन्दू’ शब्द का अर्थ है- फारसी भाषा का शब्दकोष - ल्युजत-ए-किशवारी, लखनऊ 1964, चोर, डाकू, राहजन, गुलाम, दास। उर्दू फिरोजउल लजत-प्रथम भाग पृ. 615, तुर्की चोर, राहजन, लूटेरा: फारसी गुलाम, दास, बारदा (आज्ञाकारी नौकर), शियाकाम (काला) पेज 376 भार्गव शब्द कोष बारवां संकलन 1965 भी देखे)
परसियन - पंजाबी (डिक्सनरी) शब्द कोश (पंजाबी यूनिवर्सिटी, पटियाला) भारतीय उपमहाद्वीप के निवासी, डाकू, राहजन, चोर, दास, काला, आलसी।
(हिन्दुकुश - यानि भ्पदकन ज्ञपससमतए ैसंनहीजंतद्ध यहाँ असंख्य मौतें, मार-काट, हत्याएं हुई।
अब हमें चोर, डाकू, लूटेरे, गुलाम, राहजन नहीं रहना है। हमें श्रेष्ठ बनना है। हमें आर्य बनना है। आओ हम आर्य बनें।
राम और कृष्ण आर्य थे। गुरुनानक देव राम के वंशज है।
हस्तिनापुर के वंशज अन्तिम सम्राट श्री पृथ्वीराज चैहान तक हमारी पहचान आर्य थी। बाद में विदेशियों के अधीन हो गये। आर्यन पहचान ही खत्म हो गई। अब आर्य समाज की संस्थाएं है।
सिकन्दर ने भी हिन्दू शब्द को बोला था परन्तु प्रचलित 1000 ई. के बाद ही हुआ है। महमूद गजनवी ने 997 ई. से भारत में 27 डाके डाले। मोहम्मद गौरी ने पृथ्वीराज चैहान से कई लड़ाईयां लड़ी दोनों का अन्त हो गया। बाबर आक्रमणकारी था। फिर यहीं रहने का मन बनाया था आदि-आदि आक्रान्ताओं के साथ ही ‘हिन्दू’ शब्द आया।
विदेशी, लूटेरों, आक्रमणकारियों के अत्याचार से आर्य हिन्दू-मुस्लिम में बंट गये।
आओ हम आर्य बने, श्रेष्ठ बने, एक बने - हे श्रेष्ठ जनों, हे आर्यों, विदेशी इस्लामिक लूटेरों, आक्रमणकारियों ने भारतवर्ष में शान्तिमय जीवन यापन करने वाले त्यागी, तपस्वी, हमारे पूर्वजों को घोर यातनाएं देकर हिन्दू और मुस्लमान बना दिये।
अब आप स्वतन्त्र हो, आईये हम श्रेष्ठ बने! आर्य बने!! एक बने!!!
‘हिन्दू’ धर्म का कोई प्रवर्तक नहीं है यानि ‘हिन्दू धर्म’ नहीं है। यह झूठ प्रपंच का मनगढन्त नाम है।
आप मनीषी भी यह पढ़कर स्वयं ही प्रश्न पैदा करे या स्वयं ही उत्तर खोजे या देश में धर्म और सत्य सनातन के नाम के भ्रम का नाश कर अपने स्व कर्तव्य का पालन कर राष्ट्रभक्ति जागृत करें।
- हिन्दू धर्म के दस प्रश्न -
1. हिन्दू धर्म के प्रवर्तक कौन है? 2. हिन्दूधर्म के धर्म ग्रंथ कौन-से है? 3. हिन्दू धर्म का ईश्वर कौन है? 4. हिन्दू धर्म के उपास्य देव कौन-कौन से हैं? 5. हिन्दू धर्म किस समय से चला है समयावधि बताये? 6. हिन्दू धर्मानुसार सृष्टि कब वा कैसे बनी? 7. हिन्दू धर्मानुसार यह सृष्टि एकत्ववाद, द्वैतवाद या त्रैतवाद है?
8. हिन्दू धर्म की पूजा पद्धति क्या है? 9. हिन्दू धर्मानुयायी की जीवन व सामाजिक पद्धति क्या है? 10. हिन्दू शब्द किस भाषा की देन है?
सनातन धर्म के दस उत्तर
1. सनातन धर्म के प्रवर्तक परमपिता परमेश्वर है। जिसका मुख्य नाम ओ3म् है।
2. सनातन धर्म के धर्मग्रंथ चार वेद (ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद व अथर्ववेद) है तथा वेद प्रणीत चार उपवेद छः दर्शन शास्त्र, 11 उपनिषद व चार ब्राह्मण ग्रंथ व मनुस्मृति आदि भी मान्य ग्रंथ है।
3. सनातन धर्म के ईश्वर एक ओ3म् ही है जो सच्चिदानंद स्वरूप, निराकार, सर्वशक्तिमान, न्यायकारी, दयालु, अजन्मा, अनंत, निर्विकार, अनादि, अनुपम, सर्वाधार, सर्वेश्वर, सर्वअन्तरयामी, अजर, अमर, अभय, नित्य पवित्र और सृष्टिकर्मा है।
4. सनातन धर्म के 33 कोटि जड़ देवता 5 चेतन देव या इन सब देवों का महादेव परमपिता परमेश्वर है। जड़ में 8 वसु अग्नि, जल, वायु, पृथ्वी, आकाश, सूर्य, चन्द्रमा एवं नक्षत्र 11 रुद्र पांच प्राण पांच उपप्राण दस वा ग्यारहवीं आत्मा 12 आदित्य वर्ष के बारह महीने जो हमारी आयु को लेता है। एक इन्द्र (ऐश्वर्यदाता) प्रजापति (यज्ञ), चेतनदेव माता, पिता, आचार्य, गुरु एवं पति के पत्नी और पत्नी के लिए पति देवता है।
5.सनातन धर्म सृष्टि के प्रारम्भ काल से ही चल रहा है जिसको 1960853112 वर्षों से चल रहा है। यह वर्तमान प्रचलन ब्रह्माण्ड गणित के आधार पर है।
6.सनातन धर्मानुसार परमपिता परमेश्वर अपने स्व शक्तिमान होने से प्रलय रूपी रात्री का फिर पल मास वर्ष आदि रचकर पूर्व कल्पनुसार सूर्य चन्द्रमा नक्षत्र आदि कि छः चतुर्युगी अमैथुनी सृष्टि और 994 चतुर्युगी मैथुनी सृष्टि चलती है कुल 1000 चतुर्युगी यानी 4,32,00,00,000 वर्षों तक रहती है व इतने समय ही सृष्टि प्रलय (सूक्ष्म रूप) में रहती है।
7. सनातन धर्मानुसार यह सृष्टि त्रेतवाद है (ईश्वर, जीव, प्रकृति)
(1) ईश्वर पूरे ब्रह्माण्ड का एक ही हैं। सच्चिदानन्दस्वरूप, कर्मफल प्रदाता सृष्टि का रचयिता पालनकर्ता एवं प्रलयकर्ता है।
(2) जीव- जो अनंत व सतचित्त हैं, अल्पज्ञ कर्मफलानुसार जन्म मरण के चक्र में पड़ते हुए श्रेष्ठ योनी मानव द्वारा मोक्ष की भी प्राप्त कर सकते हैं।
(3) प्रकृति - जो सत् है तीन गुणों (सत्व, रज, तम) से युक्त पंच तत्व स्वरूप में है।
8. सनातन धर्म, मानव धर्म, प्राणी धर्म के पंच महायज्ञ द्वारा चैतन्य एवं जड़ देवों की पूजा (यथायोग्य सत्कार एवं उपयोग) की जाती है।
(1) ब्रह्मयज्ञ - ईश्वर का ध्यान व वैदिक सत्य शास्त्रों का स्वाध्याय।
(2) देवयज्ञ - जड़ देवों का मुख अग्नि है सो गौ घृत एवं सुगन्धित, मिष्ठीकारक पुष्टिकारक वनस्पतियों द्वारा हवन करना। वायु को शुद्ध कर स्वास्थ्यवर्धक बनाना।
(3) पितृयज्ञ - जीवत माता, पिता, दादा, दादी, सास, ससुर आदि बड़ों को प्रातः स्नानकर नमस्ते कर उनकी इच्छानुसार भोजन आदि व्यवस्था करना उनकी आज्ञा का पालन करना एवं संतान को सुसंस्कारी बनाना।
(4) बलीवैश्व देव यज्ञ - गाय, कुत्ता, चींटी, पक्षी, विकलांग, विधवा आदि गृह पर आश्रितों की यथा शक्ति सेवा करना।
(5) अतिथियज्ञ - कोई वेदों के विद्वान् संन्यासी घर आये तो उनका हृदय से अभिवादन कर उनसे अपनी शंका का समाधान करना एवं उनकी आवश्यकतानुसार भोजन आदि देकर सेवा करना।
9. सनातन धर्मानुसार व्यक्ति चार वर्ण का चार आश्रमों का पालन करते हुए सोलह संस्कारों द्वारा आत्मोन्नत कर अष्टांग योग द्वारा धर्म अर्थ, काम व मोक्ष को प्राप्त करना।
छुआछूत रहित कर्मानुसार वर्णव्यवस्था, मृत्यु भोज, बाल विवाह, बहुविवाह आदि। वर्तमान सामाजिक कुरीतियों से रहित आदर्श, जीने दो और जीओ के आधार पर सामाजिक संरचना करना ‘‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’’ की कामना करना।
10. सनातन धर्मानुसार हम आर्यावर्त के निवासी होने के कारण आदिकाल से आर्य थे परन्तु 997 ईश्वी से विदेशी लूटेरों, आक्रमणकारियों ने हिन्दू शब्द जो फारसी भाषा में मुसलमानों द्वारा दिया गया हमारा अपमान जनित नाम है। जिसका अर्थ काला, चोर, डाकू, लूटेरा, गुलाम आदि बताया है। महाभारत काल तक हमारे महाराजे आर्य पुत्र, ऋषि, महर्षि संतान कहलाती थी परन्तु महाभारत के बाद भी किसी भी धर्मशास्त्र पुराणों में भी किसी महापुरुष या संत आदि को हिन्दू पुत्र नाम से सम्बोधन नहीं आया है तो हम इस अपनी संस्कृति आर्यावर्त देश की परम्परा के श्रेष्ठ नाम आर्य को छोड़ हिन्दू क्यों बोलने लगे या बोल रहे है, गाली ले रहे है। शब्द ब्रह्माण्ड का सार है। शब्द से संस्कार बनते है और इसी हिन्दू शब्द के गूढ़ अर्थ यानि चोर, डाकू, लुटेरा, राहजन आदि को न समझने के कारण त्याग, तपस्वी भारत भूमि के त्यागी तपस्वी संतगणों, विद्वानों ने भी हिन्दू पथ पर चलना शुरू कर दिया है। यहाँ तक कि किसान व मजदूर वर्ग भी संतों, विद्वानों व राज में उच्च पदासीनों को हिन्दू यानि चोर, डाकू, राहजन की ओर अग्रसर होते देख क्षुब्ध है और वे भी मौके की तलाश में है। यहाँ तक अध्यापकगण यानि गुरुजन भी ऐसी भयावनी स्थिति में है का गम्भीरता से चिंतन-मनन करें ।
इसका विचार कर ‘हिन्द’, ‘हिन्दी’, ‘हिन्दू’ और ‘हिन्दुस्तान’ शब्दों का परित्याग करें और इसकी जगह ‘हिन्द’ यानि भारत, ‘हिन्दी’ यानि आर्ष भाषा, देवनागरी, ‘हिन्दू’ यानि आर्य, ‘हिन्दुस्तान’ यानि आर्यस्थान बोलने का प्रचलन शुरू करें । सत्य को ग्रहण करे यही ईश्वर की कामना है।
इनके अलावा हमारी शोध के आधार पर निम्नलिखित 11 प्रश्न और है जो हमने अन्यों से पत्र-प्रेषित करके पूछे थे जिनका उत्तर आज तक नहीं आया। इन सभी का हम ही उत्तर दे सकते है फिर भी आप मनीषी भी इस पर चिंतन-मनन अवश्य करें। उत्तर देने का कष्ट करें।
1. सनातन धर्म प्राचीन होते हुवे भी सिमट कर रह गया क्यों? जबकि दूसरे धर्मों का विश्व में राज चलता है। 2. सभी धर्मों में शान्ति का उल्लेख है फिर आतंकवाद क्यों बढ़ रहा है? 3. आतंकवाद रूपी राक्षस की उत्पत्ति कैसे हुई? 4. सन्तों के प्रवचनों का असर क्यों नहीं पड़ रहा है जबकि करोड़ो रुपये सन्तों के प्रवचनों में खर्च होते है। देखने में ओर सुनने में आया है कि जो सन्तों के पास ज्यादा रहते है उनमें से अधिकांश घोटाला-घपलों में क्यों लिप्त है? 5. आज मनुष्य की गरिमा उसके चरित्र से न आंककर धन से आंककर धन के महत्त्व को बढ़ावा क्यों दिया जा रहा है? 6. अधिकांश की येन-केन प्रकरेण अनीति से धन संचय करने की प्रवृति क्यों बढ़ रही है? 7. वर्तमान में वाहन दुर्घटनाएं क्यों बढ़ रही है? (वाशिंगटन, कैलिफोर्निया, यूनिवर्सिटी के मनोवैज्ञानिकों ने कहा कि ध्वनि प्रदूषण, संगीत से वाहन दुर्घटनाएं आदि होते हैं। (28 जून-2011 के दैनिक अखबार में प्रकाशित) जबकि खेजड़ा एक्सप्रेस के प्रजापति ने शोध करके पाँच वर्ष पहले पता कर लिया था कि ध्वनि प्रदूषण, गीतों से वाहन दुर्घटनाएं, बहरापन आदि होती है जो कि 24 अप्रैल 2008 के अंक में प्रकाशित, 20 अप्रैल को प्रकृति शक्तिपीठ खेजड़ा के कार्यालय में प्रजापति ने शोध पत्र पढ़ा था जिसमें ध्वनि प्रदूषण से वाहन दुर्घटनाएं व अर्द्ध विक्षुप्ता, बहरापन आदि विस्तार से बताया है तथा दुर्घटनाओं के बारे में ओर भी गूढ़ जानकारी की है। सरकार को भी पत्र लिखें। न ही सरकार ने ध्यान दिया और न ही मीडिया ने, जबकि अब अमेरिका केे मनोवैज्ञानिकों की शोध को प्रचारित-प्रसारित कर रहे है।) 8. बच्चों व युवाओं में भी नशे की प्रवृति क्यों बढ़ रही है?
9. अनेक सन्त दुष्आचरण में लिप्त क्यों होते जा रहे हैं? 10. अकाल क्यों पड़ते हैं? एवं 11. कमजोर मानसून में अच्छी वर्षा कैसे ली जा सकती है? आदि आदि अनेकानेक शोध जिसमें विशेष तुलसी, यज्ञ, योग, वनौषधियों से रोगों का उपचार आदि। अकाल पर शोध में लगभग 30 वर्ष लगे है।
हमारा धर्म ‘सनातन धर्म’ है जिसका प्रवर्तक ?, ओ3म्, ओं है। आईये इस ‘व्यवस्था सोच परिवर्तन चेतना महायज्ञ’ के जनजागृति अभियान में शामिल होईये और अनेकानेक गूढ जानकारियों के साथ भारत को विश्व की अग्रणी शक्ति बनाने में अपना योगदान दीजिये।
ओं-शान्ति-शान्ति-शान्ति।
अतः जो भारतीय हैं, आर्य है और ‘व्यवस्था सोच परिवर्तन चेतना महायज्ञ’ में विश्वास रखने वाले है सभी मुख्य कार्यालय ‘पाक्षिक खेजड़ा एक्सप्रेस, प्रकृति शक्ति पीठ, बीकानेर -4 से सम्पर्क करें और अधिक जानकारी के लिए खेजड़ा एक्सप्रेस पढ़े।

नोट: विदेशी महमूद गजनवी ने भारत को 27 डाकों से लूटा, लूट के माल से गजनी को सजाया। गौरी आक्रमण कारियों ने गजनी को जलाकर राख कर दिया। आज भारत को अपने ही लूट कर विदेशों में धन जमा कर रहे है। जब ये लूटेरे मरेंगे तो इनका विदेशों में धन भी जलकर राख हो जायेगा।

यह पत्र आपके उज्ज्वल भविष्य की ईश्वर से प्रार्थना करता है। प्राणियों का कल्याण हो। एक बात ओर- हे महामानव आप आर्य है, आप श्रेष्ठ है। आप हमें पत्र लिखें, फोन करें, सम्पर्क करें। विचार भेंजे। (मिलने का समय सुबह 10 बजे शाम 6 बजे)
जय सनातन-जय भारत-जय आर्यन
आज्ञा से - अधिष्ठाता, प्रकृति शक्तिपीठ
सनातन धर्म खण्ड-खण्ड क्यों हुवा?:- सभी अपने-अपने धर्म की छत्र-छाया में फलीभूत होते हैं सनातन धर्म को अनादि काल में ईश्वर ने रचना की है। सनातन धर्म रूपी विशाल शास्त्र के पन्ने, वेद-पुराण, उपनिषद् आदि धर्म ग्रन्थ है। इन शास्त्रों के किसी मंत्र या श्लोक के गूढ़ रहस्य को हमारे मनीषों ने तप करके योग द्वारा जान लिया और उसी का उन्होंने प्रचार-प्रसार किया और इस प्रकार ऐसे मनीषी महामानवों के नाम से धर्म - सम्प्रदाय बन गये और सनातन धर्म खण्ड-खण्ड में बंटता गया। सनातन धर्म हमारा माता-पिता-गुरु है। माता-पिता-गुरु की छत्र-छाया में हमारा विकास होता है। जो अपने माता-पिता गुरु में श्रद्धा नहीं रखते, उनकी सेवा नहीं करते वो घोर कष्ट के भागीदार बनते हैं। अतः हमें सनातन धर्म रूपी महाशास्त्र, महावृक्ष, माता-पिता-गुरु की छत्र-छाया में रहना है तभी हमारा कल्याण होगा। सनातन धर्म को विलुप्त करने का बहुत बड़ा गूढ़ षड़यन्त्र भी चल रहा है। आज सनातन धर्म को हिन्दू धर्म के नाम से विस्थापित करने का घोर षड़यन्त्र चल रहा है। ऐसे में सभी सच्चे सनातनी, सच्चे आर्यों का कर्तव्य है कि वे सनातन धर्म को बचाने की हमारी रणनीति में हमारा सहयोग करें। जबकि शब्द से संस्कार बनते हैं और हिन्दू का अर्थ ही चोर, डाकू, लूटेरा आदि है तो यह धर्म चोर,डाकू, लूटेरा धर्म बनेगा? यानि देवों पर राक्षसों की विजय। यानी सत्य पर असत्य की विजय। जरा सोचो!!!

--------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------- ब्रह्माण्डगुरु- भगवान प्रजापति -अधिष्ठाता - - प्रकृति शक्ति पीठ.
brahmand guru bhagawan prjapati -adhishthata -prikriti shakti pith-
ने कहा कि ॐ शांति !- शब्द ही ब्रह्म है। शब्द से संस्कार बनते हैं। ये ही सनातन सत्य है !
ॐ तत्सत !जय भारत -!! आर्य संस्कृति सनातन धर्मेव जयते !
------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------
ॐ - हमारा ध्येय ब्रह्माण्डिय पर्यावरण सुरक्षा व विश्व शान्ति एवं प्राणियों की स्वास्थ्य रक्षा करनी ही है। आप स्वस्थ रहेंगे तो धर्म-कर्म विद्यापार्जन, धनोपार्जन करेंगे। घर में तुलसी पौध लगाने से सुख-शान्ति मिलती है। प्रकृति शक्ति पीठ, खेजड़ा एक्सप्रेस से तुलसी, पीपल पौध निःशुल्क ले जावें। ------------------------------------------------------------------------------------------------------ पर्यावरण, आध्यात्मिक एवं समसामयिक विचारों एवं स्वास्थ्य रक्षा विषयक धरती से जुड़ा विश्व का अग्रणी ऊँ पाक्षिक खेजड़ा एक्सप्रेस (बीकानेर से प्रकाशित व प्रसारित) ---जगद्गुरु शंकराचार्य भगवान प्रजापति ब्रह्माण्डीय -प्रकृति शक्ति पीठ -बीकानेरjagadguru shankaracharya bhagwan prajapati  
---- ऊँ
पाक्षिक खेजड़ा एक्सप्रेस
(बीकानेर से प्रकाशित व प्रसारित)
वर्ष 24अंक 7दि0 -24-11-12

--जगद्गुरु शंकराचार्य भगवान प्रजापति
भारत वर्ष या हिन्दूस्तान/हिन्दूस्थान ?
प्रायः विज्ञापनों में सरकारी व गैर सरकारी दोनों ही तरह के विज्ञापनों या कामकाज में हिन्दुस्तान बोला जाता है। जबकि शब्दकोष में हिन्दुस्तान दिल्ली-पटना से यानि मध्य एवं उत्तरी भारत को हिन्दूस्तान कहा है। तो फिर शेष भाग ........?
सी क्षेत्र में विदेशी आक्रमणकारियों, लूटेरों के अत्याचार अधिक हुवे। इसी क्षेत्र में रहने वाले आर्यों को अधिकतर मुसलमान व हिन्दू बनाये।ै जबकि द्रविड तो दक्षिण भारत के भूभाग में थे।
शब्द कोषों से यह भी प्रमाणित होता है कि हिन्दू का मतलब चोर, डाकू, लूटेरा, गुलाम आदि हो तो फिर हिन्दूस्तान क्या अर्थ हुवा?
सीधी-सी बात यह है कि भारत वर्ष के उच्चारण से ही सम्पूर्ण भारत वर्ष का प्रतिनिधित्व होता है।
ये बातें शीर्ष नेताओं, अधिकारियों, विद्वानों के समझ में क्यों नहीं आ रही है।
बदलो, बदलो अपनी सोच को! सोच बदलने से ही सही विकास होगा क्योंकि सोच बदलने से शुद्ध शब्द बोले जायेंगे और शब्द से संस्कार बनते हैं। अतः हमारे व्यवस्था सोच परिवर्तन चेतना महायज्ञमें शामिल होवे और भारतवर्ष को विश्व का अग्रणी बनावे।
------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------ ---- ब्रह्माण्डगुरु- भगवान प्रजापति -अधिष्ठाता - - प्रकृति शक्ति पीठ.
brahmand guru bhagawan prjapati -adhishthata -prikriti shakti pith-
ने कहा कि ॐ शांति !- शब्द ही ब्रह्म है। शब्द से संस्कार बनते हैं। ये ही सनातन सत्य है !
ॐ तत्सत !जय भारत -!! आर्य संस्कृति सनातन धर्मेव जयते !
------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------- ॐ - हमारा ध्येय ब्रह्माण्डिय पर्यावरण सुरक्षा व विश्व शान्ति एवं प्राणियों की स्वास्थ्य रक्षा करनी ही है। आप स्वस्थ रहेंगे तो धर्म-कर्म विद्यापार्जन, धनोपार्जन करेंगे। घर में तुलसी पौध लगाने से सुख-शान्ति मिलती है। प्रकृति शक्ति पीठ, खेजड़ा एक्सप्रेस से तुलसी, पीपल पौध निःशुल्क ले जावें। ------------------------------------------------------------------------------------------------------ पर्यावरण, आध्यात्मिक एवं समसामयिक विचारों एवं स्वास्थ्य रक्षा विषयक धरती से जुड़ा विश्व का अग्रणी ऊँ पाक्षिक खेजड़ा एक्सप्रेस (बीकानेर से प्रकाशित व प्रसारित) ---जगद्गुरु शंकराचार्य भगवान प्रजापति ब्रह्माण्डीय -प्रकृति शक्ति पीठ -बीकानेरjagadguru shankaracharya bhagwan prajapati 
-- ऊँ
पाक्षिक खेजड़ा एक्सप्रेस
(बीकानेर से प्रकाशित व प्रसारित)
वर्ष 24अंक 11दि0 -24-1-12
---जगद्गुरु शंकराचार्य भगवान प्रजापति

भारत की मूल संस्कृति/आर्यावर्त का मूल स्वाभिमान
प्राचीन से अति प्राचीन है! सनातन धर्म है!! सनातन धर्म है!!!
सनातन धर्म यानि प्राणी धर्म को ईश्वर ने प्रगट होते ही रचना की। तत्पश्चात् वेदों की रचना की। यह खोज आर्यों के साथ द्रविड़ों ने भी की। कालान्तर में सभी मानवों ने वेदों की महत्ता स्वीकार करके अंगीकार किया।
ईश्वर ने प्राणियों को उत्पत्ति में मानव को श्रेष्ठ बना दिया। मानव विकास की गति/धूरी की ओर अग्रसर होता गया। कर्म नाम के अनुसार जातियों, उपजातियों में बंटता गया। अपने-अपने वर्चस्व की होड़ भी होने लगी, अधीन-पराधीन का भी वर्चस्व भी बढ़ने लगा।
इस प्रकार की प्रक्रिया के साथ-साथ मानव ने वेदों के ज्ञान विज्ञान से कई आविष्कार करके विकास को चरम सीमा तक पहुंचा, जिसमें पर्यावरण को भारी नुकसान पहुंचाया। प्रकृति का संतुलन बिगड़ा। प्रकृति ने करवट ली। सब कुछ स्वाहा। शहरी सभ्यता पूर्णतः समाप्त हुई।
घुमक्कड़, आदिवासी, ग्रामीण बचे। पुनः विकास की धुरी का प्रारम्भ होना, वेदों की खोज, ज्ञान-विज्ञान का उत्थान। कर्म-नाम-के अनुसार जाति, उपजाति, वर्चस्व, अधीन-पराधीन का सफर। यह चक्र चलते चलते हम यहां तक आ पहुंचे हैं।
हम मानते है कि आज जो कुछ हो रहा है वह निश्चय ही बदल जायेगा। परन्तु जीवित मक्खी को तो निगला नहीं जा सकता।
हम पिछले 25 वर्षों से सनातन धर्म और हिन्दुत्व पर शोध कर रहे हैं।
जब शब्द कोषों में हिन्दू का अर्थ चोर-डाकू, लूटेरा, गुलाम आदि बताया है तो फिर हिन्दू धर्म कैसा?
सनातन धर्म में असीम शान्ति है और आओ हिन्दू, हिन्दी, हिन्दू और, हिन्दूस्थान का परित्याग करे।
शब्द से संस्कार बनते है शब्द हिन्दू से सभी चोर, डाकू, लूटेरे बन रहे हैं। वर्तमान ज्वलन्त उदाहरण है।
गायत्री मंत्र व अन्य मंत्रों के जाप से फल अच्छा ही आता है चाहे जप कर्ता को इसका अर्थ भले ही नहीं आवे।
इसी प्रकार हिन्दूत्व से भारत का मूल स्वाभीमान विलुप्त हो रहा है।
अतः भारत के स्वाभिमान को बचाने के लिए हमें सोच बदलनी होगी। यानि हमें ऊँ ब्रह्माण्ड ओंम शान्ति के व्यवस्था सोच परिवर्तन चेतना महायज्ञ का जन-जागृति अभियान तीव्र गति से चलाना होगा। भारत वर्ष का मूल स्वाभीमान बचाना होगा। इस महायज्ञ की सफलता से भारत विश्व की अग्रणी शक्ति बनेगा और विश्व में असीम सुख, शान्ति समृद्धि आयेगी। यह सत्य ही नहीं परम सत्य है और यही ईश्वर की इच्छा है।-------जगद्गुरु शंकराचार्य भगवान प्रजापति
------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------ ब्रह्माण्डगुरु- भगवान प्रजापति -अधिष्ठाता - - प्रकृति शक्ति पीठ.
brahmand guru bhagawan prjapati -adhishthata -prikriti shakti pith-
ने कहा कि ॐ शांति !- शब्द ही ब्रह्म है। शब्द से संस्कार बनते हैं। ये ही सनातन सत्य है !
ॐ तत्सत !जय भारत -!! आर्य संस्कृति सनातन धर्मेव जयते !
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प्रकृति शक्ति पीठ-खेजडा एक्सप्रेस  के वर्षों से हो रहे सुबह -शाम कि यज्ञ विधि -का विवरण बाद में |
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पाक्षिक खेजड़ा एक्सप्रेस
(बीकानेर से प्रकाशित व प्रसारित)
वर्ष 24अंक-12दि0 -9-2-12
---जगद्गुरु शंकराचार्य भगवान प्रजापति

हे श्री महामानवों, ‘‘ ब्रह्माण्ड - ओंम शान्ति’’ के ‘‘व्यवस्था सोच परिवर्तन चेतना महायज्ञ’’ को भी समझने के लिए आप अपना अमूल्य समय देने की कृपा करें।
हे महामानवों
बम्बई से मुम्बई, कलकत्ता से कोलकाता, मद्रास से चेन्नई भारत के मूल नामों में परिवर्तन होने के पीछे क्षेत्रीय नेताओं का संघर्ष है। जबकि राष्ट्रीय नेता तो राष्ट्र के विकास की व्यवस्था में ही व्यवस्थ रहे इन्हें इस कार्य में समय ही नहीं मिला। जबकि भारतीय भाषा के शब्दकोष में हिन्द-हिन्दी-हिन्दू और हिन्दूस्तान को फारसी भाषा का बताया गया है।
‘हिन्दू’ शब्द का फारसी भाषा में मूल अर्थ है- चोर, डाकू, लुटेरे, राहजन, काला, गुलाम आदि। यह ऐतिहासिक सत्य है।
फारसी भाषा के शब्द कोषों में हिन्दू का अर्थ - आगे ‘काला’ और ‘दास’ संकलन में फारसी और उर्दू भाषा के शब्द कोष यह वर्णन करते है कि यह अर्थहीन और घ्रणित ‘हिन्दू’ शब्द का अर्थ है-
फारसी भाषा का शब्दकोष - ल्युजत-ए-किशवारी, लखनऊ 1964, चोर, डाकू, राहजन, गुलाम, दास। उर्दू फिरोजउल लजत-प्रथम भाग पृ. 615, तुर्की चोर, राहजन, लूटेरा: फारसी गुलाम, दास, बारदा (आज्ञाकारी नौकर), शियाकाम (काला) पेज 376 भार्गव शब्द कोष बारवां संकलन 1965 भी देखे)
परसियन - पंजाबी (डिक्सनरी) शब्द कोश (पंजाबी यूनिवर्सिटी, पटियाला) भारतीय उपमहाद्वीप के निवासी, डाकू, राहजन, चोर, दास, काला, आलसी।
(हिन्दुकुश - यानि भ्पदकन ज्ञपससमतए ैसंनहीजंतद्ध यहाँ असंख्य मौतें, मार-काट, हत्याएं हुई।
लाला लाजपत राय ने अपने परिचय में - महर्षि दयानन्द के लाहौर 1898 के परिचय के बारे में कहा: लेखक के अनुसार कुछ लोग कहते है कि हिन्दू है जो कि सिन्धु का बिगड़ा हुआ नाम है लेकिन यह गलत है। परन्तु सिन्धु एक नदी का नाम है। किसी समुदाय का नाम नहीं है । यह सही है कि यह नाम असली आर्यन जाति को दिया गया है जो कि इस क्षेत्र में मुस्लिम आक्रान्ताओं द्वारा अपमानित करने के लिए इस नाम से पुकारी जाती थी। फारस में लेखक हमारे लेखक कहते है, इस शब्द का तात्पर्य ‘दास’ है और इस्लाम के अनुसार वो सारे लोग जिन्होंने इस्लाम को नहीं अपनाया था उनको दास बना दिया गया।
हे महामानवों,
उपरोक्त शब्द कोषों व महर्षि दयानन्द सरस्वती एवं लाला लाजपत के अनुसार भारत के मूल स्वाभीमान और संस्कृति की रक्षा के लिए आप विचार करे और हमारी शोध (जिसमें हमने पिछले 25 वर्षों से कार्य किया) के अनुसार हमारा आपसे निवेदन है कि कृपया उक्त शब्दों को जिस प्रकार बम्बई को मुम्बई, मद्रास को चेन्नई, कलकत्ता से कोलकाता की तरह भारत के मूल शब्दों में बदला है। उसी तरह हिन्द-हिन्दी, हिन्दू और हिन्दुस्तान को भारत वर्ष केे मूलशब्दों में परिवर्तन करने में सहयोग करने की कृपा करे
हमारे सुझाव भी प्रेषित है:-
हिन्द-हिन्दी-हिन्दू-हिन्दुस्थान - ये सब फारसी नाम !!!
‘हिन्दू’ शब्द को विदेशी मुसलमान, लूटेरांे, आक्रमणकारियों ने भारत के आर्यों पर सदियांे की गुलामी के समय जबरदस्ती थोपा था तथा द्रविडों पर भी प्रभाव पड़ा। हिन्दू का फारसी भाषा में अर्थ है- चोर, डाकू, लुटेरा, गुलाम, राहजन आदि यह ऐतिहासिक सत्य है।
‘हिन्द’- यानि गुलाम - जयहिन्द, ये गुलामी के पूर्व तक तो ‘जय गुलाम’ सही था। अब कैसा जय गुलाम। अब जय भारत बोलें। हिन्द ‘हिन्द भूमि’ यानि ‘गुलाम भूमि’ गुलामी तक तो सही थी अब ‘भारत भूमि’ आर्य भूमि आदि ही बोलें !
‘हिन्दी’- संस्कृत की एक सरल भाषा परन्तु इसका नाम ‘हिन्दी’ फारसी शब्द है अतः इसका नाम होना चाहिए ‘आर्ष भाषा’ या देवनागरी भाषा !!
‘हिन्दू’- चोर, डाकू, लूटेरे, राहजन, काला, गुलाम आदि आदि जो कि सदियो की गुलामी में तो ठीक था अब हमें अपने मूल रूप ‘आर्य’ में आना चाहिए।
आओ हम आर्य बनें ! एक बनें !! श्रेष्ठ बनें !!! भारतीय बने!!!!
‘हिन्दुस्थान’- यानि ‘गुलामस्थान’ को बदलकर आर्य स्थान बोलें। विश्व हिन्दू परिषद् की जगह विश्व आर्य परिषद् या विश्व सनातन परिषद् या विश्व भारत परिषद् आदि नवीन नामकरण संस्कार से असीम शांति मिलेगी। करके देखो !!! (शब्द कोषों में पटना व दिल्ली के उत्तर-पश्चिम को ही हिन्दुस्थान दर्शाया है)
इस प्रकार उपरोक्त सभी नामों को जिस प्रकार बम्बई से मुम्बई, मद्रास से चैन्नई, कलकत्ता से कोलकाता आदि कई जगहों के नाम को बदलकर मूल रूप में रखने से शांति मिली है वैसे ही इन हिन्द, हिन्दू आदि नामों को आर्य रूप में संसोधन से भी असीम शांति मिलेगी, करके देखो। इसी प्रकार प्दकपं का अर्थ भी भारत न समझने की कृपा करे क्योंकि अमेरिका में रेड अमेरिका को पिछड़ा, आदिवासी कहा है तो यहां भारत के लोग काले हैं अतः इससे अर्थ कैसे बदल सकता है? कृपया चिन्तन मनन करें, क्योंकि उपरोक्त गुलामी के शब्दों ने भारत वर्ष की मूल संस्कृति एवं स्वाभीमान पर गहरा आघात किया है। शब्द ही ब्रह्म है। शब्द से संस्कार बनते है!
सुझाव, पत्रोत्तर अवश्य ही देने की कृपा करें।
---------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------- ब्रह्माण्डगुरु- भगवान प्रजापति -अधिष्ठाता - - प्रकृति शक्ति पीठ.
brahmand guru bhagawan prjapati -adhishthata -prikriti shakti pith-
ने कहा कि ॐ शांति !- शब्द ही ब्रह्म है। शब्द से संस्कार बनते हैं। ये ही सनातन सत्य है !
ॐ तत्सत !जय भारत -!! आर्य संस्कृति सनातन धर्मेव जयते !
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ॐ - हमारा ध्येय ब्रह्माण्डिय पर्यावरण सुरक्षा व विश्व शान्ति एवं प्राणियों की स्वास्थ्य रक्षा करनी ही है। आप स्वस्थ रहेंगे तो धर्म-कर्म विद्यापार्जन, धनोपार्जन करेंगे। घर में तुलसी पौध लगाने से सुख-शान्ति मिलती है। प्रकृति शक्ति पीठ, खेजड़ा एक्सप्रेस से तुलसी, पीपल पौध निःशुल्क ले जावें। ------------------------------------------------------------------------------------------------------ पर्यावरण, आध्यात्मिक एवं समसामयिक विचारों एवं स्वास्थ्य रक्षा विषयक धरती से जुड़ा विश्व का अग्रणी ऊँ पाक्षिक खेजड़ा एक्सप्रेस (बीकानेर से प्रकाशित व प्रसारित) ---जगद्गुरु शंकराचार्य भगवान प्रजापति ब्रह्माण्डीय -प्रकृति शक्ति पीठ -बीकानेरjagadguru shankaracharya bhagwan prajapati 
-- ऊँ
पाक्षिक खेजड़ा एक्सप्रेस
(बीकानेर से प्रकाशित व प्रसारित)
वर्ष 24अंक-13दि0 -24-2-12
---जगद्गुरु शंकराचार्य भगवान प्रजापति

योगेश्वर भगवान श्री कृष्ण का खून खौल गया!
भगवान योगेश्वर श्री कृष्ण भगवान को जब बाल्यावस्था में पता चला कि नन्दबाबा व जसौदा माँ उसके जन्मदाता माता-पिता नहीं है। अपितु जन्मदाता माता-पिता तो वासुदेव व माँ देवकी है और वे कंश मामा की कैद में है। उनका खुल खोल गया और बाल्यावस्था में ही अपने बड़े भाई बलराम के साथ मथुरा आकर कंश मामा का वध करके अपने जन्मदाता माता-पिता वसुदेव-देवकी को जेल से मुक्त करवाकर उन्हीं की सेवा में लगे रहे।
अब जब पता लग गया है कि हम हिन्दू नहीं है, हम श्रेष्ठ है, हम आर्य है, हम द्रविड़ है, हम भारतीय है जिन्हें विदेशी आक्रमणकारियों ने जोर जबरदस्ती से गुलाम बनाकर हिन्दुत्व की कैद में कर दिया और इसी हिन्दुत्व से हिन्दु धर्म का भी वर्चस्व बढ़ने लगा है। जब ये सब सत्य ही नहीं परम सत्य तो हमें हिन्दुत्व से मुक्त होना चाहिये हमें आर्य बनना चाहिये आर्य का अर्थ होता है श्रेष्ठ और हिन्दू का अर्थ होता है चोर-डाकू, गुलाम आदि।
इसी तरह हमारे देश का नाम भारत है न कि इण्डिया। इण्डिया का अर्थ आदिवासी व पिछड़ा है और न ही हमारे देश का नाम हिन्दुस्तान है। जब हिन्दू का अर्थ चोर, डाकू लूटेरा है तो हिन्दुस्तान का अर्थ आप खुद ही समझ लीजिये।
आज इस हिन्दुत्व, हिन्दू धर्म के प्रभाव से हमारा प्राचीन से अति प्राचीन सनातन धर्म विलुप्त हो रहा है यानि हिन्दू धर्म की कैद में जा रह है। जबकि सनातन धर्म ही प्राणी धर्म है जिसे ईश्वर ने प्रगट होते ही रचना की है और इन धर्म की खोज आर्यों व द्रविड़ो ने की है। अतः हमें हमारी सही पहचान को मुक्त कराना है।
हमारा देश आजाद हो गया है परन्तु हमारी मूल संस्कृति और स्वाभीमान आज भी गुलाम है। यानि हमारे भारतवर्ष के माता-पिता आज भी हिन्दुत्व की कैद में है।
अतः हमें हमारे देश के माता-पिता को कैद से मुक्त करवाने के लिए हमारे खून में गर्माहट लानी होगी हमें दृढ़ प्रतिज्ञा करनी होगी कि हम आज से जो भी बोलेगे, लिखंेगे, उनमें भारतीय लिखेंगे, या आर्य लिखेंगे या श्रेष्ठ लिखेंगे, बोलेंगे और हमारा धर्म एक मात्र सनातन धर्म है जो विश्व के सभी धर्मों से अति प्राचीन है।
इसके बाद जितने भी धर्म सम्प्रदाय बने है उन पर प्रभाव सनातन धर्म व वेद शास्त्रों का हैं। अतः हम कृष्ण प्रेमी है हम गीता प्रेमी है। गीता विश्व का प्रमाणित ग्रन्थ है (जिसकी योगेश्वर श्री कृष्ण भगवान ने रचना की है तथा वेदव्यास ने श्रीगणेश जी से लिखवाई है वैसे तो वेद व्यास ने योग विद्या से गीता के ज्ञान को अर्जुन को जब श्री कृष्ण ने दिया था तब ही जान लिया था फिर भी संजय भी तो आंखों देखा हाल सम्राट धृतराष्ट्र को बता ही रहा था।)
तो योगेश्वर श्री कृष्ण भगवान को पता जब चला कि मेेरे माता-पिता वासुदेव-देवकी है तो उन्होंने स्वीकारभी कर लिया। इसी प्रकार अब हमें जब पता चल गया कि हम आर्य है, द्रविड़ है, भारतीय है हमारा धर्म सनातन है तो हम हिन्दुत्व को क्यों अपनाये बैठे है?
हमारा खून खौलना चाहिये और हिन्दुत्व का चोगा को तुरन्त फैंक देना चाहिए।
भारतवर्ष के मूल संस्कृति व स्वाभीमान को बचाने के लिए हमें सोच बदलनी है।
अतः ऊँ ब्रह्माण्ड ओंम शान्ति के सदस्य आज ही बनिये ताकि व्यवस्था सोच परिवर्तन चेतना महायज्ञ सुचारु रूप चलाकर स्वतन्त्रता भारत के 64 वर्ष बाद भी फलीभूत हो रहे गुलामी के शब्दों को हटाया जा सके एवं सनातन धर्म की सही पहचान कराकर भारत को विश्व की अग्रणी शक्ति बनावे ताकि विश्व में शान्ति हो
सके।--------जगद्गुरु शंकराचार्य भगवान प्रजापति
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---- ब्रह्माण्डगुरु- भगवान प्रजापति -अधिष्ठाता - - प्रकृति शक्ति पीठ.
brahmand guru bhagawan prjapati -adhishthata -prikriti shakti pith-
ने कहा कि ॐ शांति !- शब्द ही ब्रह्म है। शब्द से संस्कार बनते हैं। ये ही सनातन सत्य है !
ॐ तत्सत !जय भारत -!! आर्य संस्कृति सनातन धर्मेव जयते !
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पाक्षिक खेजड़ा एक्सप्रेस
(बीकानेर से प्रकाशित व प्रसारित)
वर्ष 24अंक-14दि0 -9-3-12
---जगद्गुरु शंकराचार्य भगवान प्रजापति

प्रकृति शक्ति पीठ - पाक्षिक खेजड़ा एक्सप्रेस का कार्यालय व कर्मस्थल है।
आज जो प्रकृति शक्ति पीठ का दृश्य रमणीक है, दिखाई दे रहा है जिसे हम ब्रह्माण्ड का एक मात्र पवित्र तीर्थ स्थल कह रहे हैं। इसे यहां तक पहुंचने में बहुत जटिल व लम्बा संघर्ष करना पड़ा है।
- 1973 में भगवानाराम ने न्यास से बोली पर प्लाॅट नं. 6 लिया। इसके आगे की जमीन उबड़-खाबड़ थी उसमें पेड़ लगाने योग्य बनाने का प्रयास मन्थर गति से था।
1980 में एक दिन पड़ौसी ने बताया कि भूमाफियों ने कब्जा कर लिया। (उस समय भगवानाराम किराये के मकान में रहते थे।)
भूमाफियो गिरोह बहुत सशक्त था इसलिए लम्बे संघर्ष में धन, समय और शक्ति खर्च हो गई और पेड़ लगाने के कार्य में विघ्न पड़ गया। 1983 में भगवानाराम अपने प्लाॅट में आवास करने लगे ओर आगे की जमीन पर पेड़ लगाने व सुरक्षा करने का सफर सुचारू रूप से शुरू हो गया और यह स्थल रमणीक लगने लगा परन्तु रोड़ के किनारे, बढ़ती आबादी के बीच भी आ गया तो समाज कंटकों की गिद्ध दृष्टी पड़ने लगी। इस स्थल को हड़फने के कई कुचक्र, षडयंत्र चले, धमकिया, प्रलोभन भी मिले, परन्तु इस सब उतार-चढ़ाव में इस स्थल का विकास जारी रहा। अंततः 1988 में पाक्षिक खेजड़ा के प्रकाशन के बाद इस स्थल को खेजड़ा एक्सप्रेस ने अपना कार्यालय व कर्मस्थल बना लिया और खेजड़ा एक्सप्रेस के मूल उद्देश्य में इस स्थल में रचनात्मक कार्य शुरू कर दिये। प्रकृति शक्ति पीठ में विभिन्न प्रकार के पेड़-पौधों-वनौषधियों को ऊगाया गया, जिसमें तुलसी के पौधे बहुतायत में ऊगाये और निःशुल्क वितरण करने शुरू किय इस अभियान का नाम दिया घरेलू प्रदूषण मिटाओ, स्वास्थ्य लाभ पाओ।
इस प्रकार तुलसी पौधों के इस स्थल का नामकरण में तुलसी पौधशाला, तुलसी विरतण केन्द्र, तुलसी औषधालय आदि नामों के साथ ‘‘प्रकृति शक्ति पीठ’’ नाम को महत्व मिला और आज प्रकृति शक्ति पीठ का जो स्थल है वह बहुत ही सुन्दर व पवित्र स्थल है जहां कई कार्यक्रम हुवे है जिसमें प्राकृतिक आपदा के समय तुलसी निःशुल्क देकर तुलसी के बदले आटा, दाल, चावल, कपड़े आदि लेकर अभावग्रस्तों को बांटे।
आप अब इसी सफर के फोटो, वीडियो देखिये जिमसें कौन सहयोग दे रहे है, कौन कार्य कर रहे हैं। कितना मेहनती व संघर्षमय कार्य को भगवानाराम प्रायः प्रायः अकेले ही कर रहे हैं। कई बार चोटिल हुवे, बीमार पड़े, परन्तु ये कार्य अनवरत चल रहा है। यहां भगवानाराम ने युवावस्था में खेतों में (सिरी, हाली) मजदूरी करके सम्पति बनाई वह लाखांे की सम्पति इस स्थल के विकास और रचनात्मक कार्यो में खर्च कर दी और लाखों का कर्जदार हो गया है।
इस स्थल से छोटे-बड़े पीपल तो बांटे है परन्तु 35-35 फुट के लम्बे पीपल तैयार करके अपने गांव ढाणी बड़ी कानासर की श्मसान भूमि में लगाये है उसका विडियो भी आप देखेंगे। तथा अन्य सभी कार्यों के प्रायः प्रायः फोटो व विडियों भी देखेगे तो स्वतः ही समझ आ जायेगा।
इस प्रकार इतने बड़े सफर में जो योग विद्या से शोध की है जिसे आसन पर तपने से नीचे फोड़े से नासूर हो गया परन्तु जब तक शोध पूरी नहीं की योग करते रहे ओर अन्ततः सफल हो गये। शोध के सुत्र भी बारह है तथा अनेक प्रकार की अनुभूतियां भी मिली है।
शोध पूरी होने पर 23 जून 2008 को आॅपरेशन करवाया असफल रहा। 8-10 महीनों बाद डाॅक्टरों ने पुनः आॅपरेशन कराने को कहा परन्तु भगवानाराम ने पुनः आॅपरेशन करवाने से अच्छा जड़ी-बुटियों से उपचार करने को उचित समझा। अब पुनः 5 दिसम्बर 11 से साईकिल चलानी शुरू कर दी है।
इतने लम्बे सफर में भगवानराम ने सरकार से न तो प्रकृति शक्ति पीठ के लिये आर्थिक सहयोग लिया और न पाक्षिक खेजड़ा एक्सप्रेस के लिए। यहां तक स्थानीय निकायों ने भी कोई सहयोग नहीं दिया।
इस प्रकार आप इस संघर्षमय सफल-सफर की अधिक जानकारी के लिए पाक्षिक खेजड़ा एक्सप्रेस पढि़ये, साईट देखिये, फेश बुक देखिये, ट्वीट देखिये।
अन्ततः एक निवेदन भी है कि इस अद्भुत पर्यावरण, अध्यात्म व अन्य प्रकार के प्रदूषण के खिलाफ संघर्ष में हमारा कोई सहयोग अब देना चाहते है तो हमें स्वीकार है लेकिन इस सहयोग से पहले उन्हें इस कार्य की सच्चाई को जानना होगा और अन्तःकरण में भी स्थापित करना होगा किसी प्रकार का ऊहापोह न होने के बाद ही सहयोग करें। हमें सहयोगी साथी (युवक-युवती) की आवश्यकता है। जो हमारे खेजड़ा एक्सप्रेस के लेखन, रचनात्मक कार्य को कर सके और कम्प्यूटर की जानकारी रखता हो। ऐसे महामानव (युवक-युवती) हमसे सम्पर्क करने की कृपा करें।हमें अभी बहुत कार्य करने है और विशेष तौर से जो हमने शोध की है प्राणियों के कल्याण के लिए उन्हें प्रमाणित भी तो करना है।लिखने को तो बहुत कुछ है परन्तु आप बाकी स्वयं ही समझ गये होंगे।
अतः आइये शामिल हो जाइये और प्राणियों के कल्याण, स्वास्थ्य, समृद्धि और विश्व शान्ति के लिए हमारे इस महायज्ञ में शामिल होईये।
अधिष्ठाता - किसी पवित्र स्थल का निर्माण, सृजन करके विकास की गति देते हैं तथा वहां प्राणियों के कल्याण व ब्रह्माण्ड में शान्ति के लिए कार्य करते हैं। उस पवित्र स्थल के सृजनकर्ता को ही अधिष्ठाता कहा जाता है।
शब्द ही ब्रह्म है। शब्द से संस्कार बनते हैं। गायत्री मंत्र का अर्थ भले ही न आवे जाप से लाभ ही होता है। सभी मंत्रों में अपार शक्ति है। कौन-कौनसा मंत्र कब और कैसे जपा जाये यह सद्गुरु, ज्ञानी, बता सकते हैं या प्रकृति शक्ति पीठ।
जप-मंत्र-मानसिक जाप से, जीभ हिलाकर, होठ हिलाकर, धीमी आवाज में बुदबुदाकर, तेज आवाज में जाप कब और कैसे लाभ आदि की जानकारी जपकर्ता के उद्देश्य, परियोजन, शारीरिक क्षमता, स्थान आदि को मध्य नजर रखकर दी जाती है। जपकर्ता को सही जानकारी नहीं होने के कारण वह लक्ष्य से भटक जाता है और सही सफलता प्राप्त नहीं होती है।
यदि शरीर बीमार है तो पाप कर्म के कारण है और जीवात्मा जो शरीर पापी है। रुग्णावस्था में है। उसकी जीवात्मा भी पापी है। अतः शरीर को स्वस्थ करना व जीवात्मा को परमात्मा बनाने के लिए प्रयास साथ-साथ एक जटिल प्रकिया से सम्भव है यह ईश्वर कृपा, सद्गुरु व प्रकृति शक्ति पीठ ही बता सकते हैं।
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- ब्रह्माण्डगुरु- भगवान प्रजापति -अधिष्ठाता - - प्रकृति शक्ति पीठ.
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ने कहा कि ॐ शांति !- शब्द ही ब्रह्म है। शब्द से संस्कार बनते हैं। ये ही सनातन सत्य है !
ॐ तत्सत !जय भारत -!! आर्य संस्कृति सनातन धर्मेव जयते !
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पाक्षिक खेजड़ा एक्सप्रेस
(बीकानेर से प्रकाशित व प्रसारित)
वर्ष 24अंक-15दि0 -24-3-12
---जगद्गुरु शंकराचार्य भगवान प्रजापति

सेवामें,
हे श्री महामानव ........................................
सनातन धर्म ही प्राचीन से अतिप्राचीन ईश्वर द्वारा बनाया गया धर्म है। जिसे प्राणी धर्म भी कहते हैं। सनातन धर्म की खोज आर्यों ने की, द्रविड़ों ने की और अन्तर्मन से घट में बैठा लिया!
विषय: हिन्द, हिन्दी, हिन्दू और हिन्दुस्तान शब्द स्वतन्त्र भारत वर्ष के 64 वर्ष बाद भी के विषय एवं भारत के मूल स्वाभिमान के सन्दर्भ में एवं
प्दकपं का अर्थ अमेरिका में आदिवासी व पिछड़ा है तो भारत में प्दकपं का अर्थ भारत क्यों के संदर्भ में।
हे महामानव
बम्बई से मुम्बई, कलकत्ता से कोलकाता, मद्रास से चेन्नई भारत के मूल नामों में परिवर्तन होने के पीछे क्षेत्रीय नेताओं का संघर्ष है। जबकि राष्ट्रीय नेता तो राष्ट्र के विकास की व्यवस्था में ही व्यवस्थ रहे इन्हें इस कार्य में समय ही नहीं मिला। जबकि भारतीय भाषा के शब्दकोष में हिन्द-हिन्दी-हिन्दू और हिन्दुस्तान को फारसी भाषा का बताया गया है।
‘हिन्दू’ शब्द का फारसी भाषा में मूल अर्थ है- चोर, डाकू, लुटेरे, राहजन, काला, गुलाम आदि। यह ऐतिहासिक सत्य है।
फारसी भाषा के शब्द कोषों में हिन्दू का अर्थ - आगे ‘काला’ और ‘दास’ संकलन में फारसी और उर्दू भाषा के शब्द कोष यह वर्णन करते है कि यह अर्थहीन और घ्रणित ‘हिन्दू’ शब्द का अर्थ है-
फारसी भाषा का शब्दकोष - ल्युजत-ए-किशवारी, लखनऊ 1964, चोर, डाकू, राहजन, गुलाम, दास। उर्दू फिरोजउल लजत-प्रथम भाग पृ. 615, तुर्की चोर, राहजन, लूटेरा: फारसी गुलाम, दास, बारदा (आज्ञाकारी नौकर), शियाकाम (काला) पेज 376 भार्गव शब्द कोष बारवां संकलन 1965 भी देखे)
परसियन - पंजाबी (डिक्सनरी) शब्द कोश (पंजाबी यूनिवर्सिटी, पटियाला) भारतीय उपमहाद्वीप के निवासी, डाकू, राहजन, चोर, दास, काला, आलसी।
(हिन्दुकुश - यानि भ्पदकन ज्ञपससमतए ैसंनहीजंतद्ध यहाँ असंख्य मौतें, मार-काट, हत्याएं हुई।
लाला लाजपत राय ने अपने परिचय में - महर्षि दयानन्द के लाहौर 1898 के परिचय के बारे में कहा: लेखक के अनुसार कुछ लोग कहते है कि हिन्दू है जो कि सिन्धु का बिगड़ा हुआ नाम है लेकिन यह गलत है। परन्तु सिन्धु एक नदी का नाम है। किसी समुदाय का नाम नहीं है । यह सही है कि यह नाम असली आर्यन जाति को दिया गया है जो कि इस क्षेत्र में मुस्लिम आक्रान्ताओं द्वारा अपमानित करने के लिए इस नाम से पुकारी जाती थी। फारस में लेखक हमारे लेखक कहते है, इस शब्द का तात्पर्य ‘दास’ है और इस्लाम के अनुसार वो सारे लोग जिन्होंने इस्लाम को नहीं अपनाया था उनको दास बना दिया गया।
हे महामानव,
उपरोक्त शब्द कोषों व महर्षि दयानन्द सरस्वती एवं लाला लाजपत के अनुसार भारत के मूल स्वाभीमान और संस्कृति की रक्षा के लिए आप विचार करे और हमारी शोध (जिसमें हमने पिछले 25 वर्षों से कार्य किया) के अनुसार हमारा आपसे निवेदन है कि कृपया उक्त शब्दों को जिस प्रकार बम्बई को मुम्बई, मद्रास को चेन्नई, कलकत्ता से कोलकाता की तरह भारत के मूल शब्दों में बदला है। उसी तरह हिन्द-हिन्दी, हिन्दू और हिन्दुस्तान को भारत वर्ष केे मूलशब्दों में परिवर्तन करने में सहयोग करने की कृपा करे
हमारे सुझाव भी प्रेषित है:-
हिन्द-हिन्दी-हिन्दू-हिन्दुस्थान - ये सब फारसी नाम !!!
‘हिन्दू’ शब्द को विदेशी मुसलमान, लूटेरांे, आक्रमणकारियों ने भारत के आर्यों पर सदियांे की गुलामी के समय जबरदस्ती थोपा था तथा द्रविडों पर भी प्रभाव पड़ा। हिन्दू का फारसी भाषा में अर्थ है- चोर, डाकू, लुटेरा, गुलाम, राहजन आदि यह ऐतिहासिक सत्य है।
‘हिन्द’- यानि गुलाम - जयहिन्द, ये गुलामी के पूर्व तक तो ‘जय गुलाम’ सही था। अब कैसा जय गुलाम। अब जय भारत बोलें। हिन्द ‘हिन्द भूमि’ यानि ‘गुलाम भूमि’ गुलामी तक तो सही थी अब ‘भारत भूमि’ आर्य भूमि आदि ही बोलें!
‘हिन्दी’- संस्कृत की एक सरल भाषा परन्तु इसका नाम ‘हिन्दी’ फारसी शब्द है अतः इसका नाम होना चाहिए ‘आर्ष भाषा’ या देवनागरी भाषा !!
‘हिन्दू’- चोर, डाकू, लूटेरे, राहजन, काला, गुलाम आदि आदि जो कि सदियो की गुलामी में तो ठीक था अब हमें अपने मूल रूप ‘आर्य’ में आना चाहिए।
आओ हम आर्य बनें ! एक बनें !! श्रेष्ठ बनें !!! भारतीय बने!!!!
‘हिन्दुस्थान’- यानि ‘गुलामस्थान’ को बदलकर आर्य स्थान बोलें । विश्व हिन्दू परिषद् की जगह विश्व आर्य परिषद् या विश्व सनातन परिषद् या विश्व भारत परिषद् आदि नवीन नामकरण संस्कार से असीम शांति मिलेगी। करके देखो !!! (शब्द कोषों में पटना व दिल्ली के उत्तर-पश्चिम को ही हिन्दुस्थान दर्शाया है)
इस प्रकार उपरोक्त सभी नामों को जिस प्रकार बम्बई से मुम्बई, मद्रास से चैन्नई, कलकत्ता से कोलकाता आदि कई जगहों के नाम को बदलकर मूल रूप में रखने से शांति मिली है वैसे ही इन हिन्द, हिन्दू आदि नामों को आर्य रूप में संसोधन से भी असीम शांति मिलेगी, करके देखो। इसी प्रकार प्दकपं का अर्थ भी भारत न समझने की कृपा करे क्योंकि अमेरिका में रेड अमेरिका को पिछड़ा, आदिवासी कहा है तो यहां भारत के लोग काले हैं अतः इससे अर्थ कैसे बदल सकता है? कृपया चिन्तन मनन करें, क्योंकि उपरोक्त गुलामी के शब्दों ने भारत वर्ष की मूल संस्कृति एवं स्वाभीमान पर गहरा आघात किया है। शब्द ही ब्रह्म है। शब्द से संस्कार बनते है!
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- प्रकृति शक्ति पीठ-------जगद्गुरु शंकराचार्य भगवान प्रजापति
योगेश्वर भगवान श्री कृष्ण का खून खौल गया!
भगवान योगेश्वर श्री कृष्ण भगवान को जब बाल्यावस्था में पता चला कि नन्दबाबा व जसौदा माँ उसके जन्मदाता माता-पिता नहीं है। अपितु जन्मदाता माता-पिता तो वासुदेव व माँ देवकी है और वे कंश मामा की कैद में है। उनका खुल खोल गया और बाल्यावस्था में ही अपने बड़े भाई बलराम के साथ मथुरा आकर कंश मामा का वध करके अपने जन्मदाता माता-पिता वसुदेव-देवकी को जेल से मुक्त करवाकर उन्हीं की सेवा में लगे रहे।
जब हमें पता लग गया है कि हिन्दु हम नहीं है हम आर्य है हमारा धर्म सनातन है और हमारी संस्कृति और स्वाभिमान हिन्दुत्व के आगोश में लुप्त हो रहा है तो हमें आर्यत्व ही अपनाना चाहिए। इसकी रक्षा करनी चाहिए।
भारत की मूल संस्कृति/आर्यावर्त का मूल स्वाभिमान
प्राचीन से अति प्राचीन है! सनातन धर्म है!! सनातन धर्म है!!!
सनातन धर्म यानि प्राणी धर्म को ईश्वर ने प्रगट होते ही रचना की। तत्पश्चात् वेदों की रचना की। यह खोज आर्यों के साथ द्रविड़ों ने भी की। कालान्तर में सभी मानवों ने वेदों की महत्ता स्वीकार करके अंगीकार किया।
ईश्वर ने प्राणियों को उत्पत्ति में मानव को श्रेष्ठ बना दिया। मानव विकास की गति/धूरी की ओर अग्रसर होता गया। कर्म नाम के अनुसार जातियों, उपजातियों में बंटता गया। अपने-अपने वर्चस्व की होड़ भी होने लगी, अधीन-पराधीन का भी वर्चस्व भी बढ़ने लगा।
इस प्रकार की प्रक्रिया के साथ-साथ मानव ने वेदों के ज्ञान विज्ञान से कई आविष्कार करके विकास को चरम सीमा तक पहुंचा, जिसमें पर्यावरण को भारी नुकसान पहुंचाया। प्रकृति का संतुलन बिगड़ा। प्रकृति ने करवट ली। सब कुछ स्वाहा। शहरी सभ्यता पूर्णतः समाप्त हुई।
घुमक्कड़, आदिवासी, ग्रामीण बचे। पुनः विकास की धुरी का प्रारम्भ होना, वेदों की खोज, ज्ञान-विज्ञान का उत्थान। कर्म-नाम-के अनुसार जाति, उपजाति, वर्चस्व, अधीन-पराधीन का सफर। यह चक्र चलते चलते हम यहां तक आ पहुंचे हैं।
हम मानते है कि आज जो कुछ हो रहा है वह निश्चय ही बदल जायेगा। परन्तु जीवित मक्खी को तो निगला नहीं जा सकता।
हम पिछले 25 वर्षों से सनातन धर्म और हिन्दुत्व पर शोध कर रहे हैं।
जब शब्द कोषों में हिन्दू का अर्थ चोर-डाकू, लूटेरा, गुलाम आदि बताया है तो फिर हिन्दू धर्म कैसा?
सनातन धर्म में असीम शान्ति है और आओ हिन्दू, हिन्दी, हिन्दू और, हिन्दूस्थान का परित्याग करे।
शब्द से संस्कार बनते है शब्द हिन्दू से सभी चोर, डाकू, लूटेरे बन रहे हैं। वर्तमान ज्वलन्त उदाहरण है।
गायत्री मंत्र व अन्य मंत्रों के जाप से फल अच्छा ही आता है चाहे जप कर्ता को इसका अर्थ भले ही नहीं आवे।
इसी प्रकार हिन्दूत्व से भारत का मूल स्वाभीमान विलुप्त हो रहा है।
अतः भारत के स्वाभिमान को बचाने के लिए हमें सोच बदलनी होगी। यानि हमें ऊँ ब्रह्माण्ड ओंम शान्ति के व्यवस्था सोच परिवर्तन चेतना महायज्ञ का जन-जागृति अभियान तीव्र गति से चलाना होगा। भारत वर्ष का मूल स्वाभीमान बचाना होगा। इस महायज्ञ की सफलता से भारत विश्व की अग्रणी शक्ति बनेगा और विश्व में असीम सुख, शान्ति समृद्धि आयेगी। यह सत्य ही नहीं परम सत्य है और यही ईश्वर की इच्छा है।
-------- अधिष्ठाता -------------------- प्रकृति शक्ति पीठ----------जगद्गुरु शंकराचार्य भगवान प्रजापति

-------शब्द ही ब्रह्म है-------

शब्द ही ब्रह्म है। शब्द से संस्कार बनते हैं। गायत्री मंत्र का अर्थ भले ही न आवे जाप से लाभ ही होता है। सभी मंत्रों में अपार शक्ति है। कौन-कौनसा मंत्र कब और कैसे जपा जाये यह सद्गुरु, ज्ञानी, बता सकते हैं या प्रकृति शक्ति पीठ।
अधिष्ठाता -
किसी पवित्र स्थल का निर्माण, सृजन करके विकास की गति देते हैं तथा वहां प्राणियों के कल्याण व ब्रह्माण्ड में शान्ति के लिए कार्य करते हैं। उस पवित्र स्थल के सृजनकर्ता को ही अधिष्ठाता कहा जाता है।
मंत्र शक्ति -
जप-मंत्र-मानसिक जाप से, जीभ हिलाकर, होठ हिलाकर, धीमी आवाज में बुदबुदाकर, तेज आवाज में जाप कब और कैसे लाभ आदि की जानकारी जपकर्ता के उद्देश्य, परियोजन, शारीरिक क्षमता, स्थान आदि को मध्य नजर रखकर दी जाती है। जपकर्ता को सही जानकारी नहीं होने के कारण वह लक्ष्य से भटक जाता है और सही सफलता प्राप्त नहीं होती है।
जीवात्मा को परमात्मा बनावे -
यदि शरीर बीमार है तो पाप कर्म के कारण है और जीवात्मा जो शरीर पापी है। रुग्णावस्था में है। उसकी जीवात्मा भी पापी है। अतः शरीर को स्वस्थ करना व जीवात्मा को परमात्मा बनाने के लिए प्रयास साथ-साथ एक जटिल प्रकिया से सम्भव है यह ईश्वर कृपा, सद्गुरु व प्रकृति शक्ति पीठ ही बता सकते हैं।
प्रकृति शक्ति पीठ
---जगद्गुरु शंकराचार्य भगवान प्रजापति
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ब्रह्माण्डगुरु- भगवान प्रजापति -अधिष्ठाता - - प्रकृति शक्ति पीठ.
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ने कहा कि ॐ शांति !- शब्द ही ब्रह्म है। शब्द से संस्कार बनते हैं। ये ही सनातन सत्य है !
ॐ तत्सत !जय भारत -!! आर्य संस्कृति सनातन धर्मेव जयते ! ---------------------------------
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(बीकानेर से प्रकाशित व प्रसारित)
वर्ष 24अंक-17दि0 -24-4-12
---जगद्गुरु शंकराचार्य भगवान प्रजापति
आर्य बोलने व लिखने में शर्म आती है तो भारतीय या श्रेष्ठ लिखना, बोलना शुरु करो परन्तु हिन्दु-मुस्लिम का चैगा उतार फेंको क्योंकि यह विदेशी आक्रान्ताओं द्वारा भारतवर्ष के आर्यो को जबरदस्ती दिये हुवे नाम है - भगवान
गीता में श्री कृष्ण ने अर्जुन को कहा अनार्य मत बनो, आर्य बनो।
कुतस्त्व कश्मलमिदं विषमे समुपस्थित्।
अनार्यजुष्टमस्वग्यमकीर्तिकरमर्जुन।।2-2।। गीता
हे अर्जुन! तुम आर्य हो और अनार्यो की भाषा बोल रहे हो। यह तुम्हें शोभा नहीं देता आर्य तो विषम परिस्थितियों में भी अपने धर्म के लिए लड़ता है। यानि श्रेष्ठ पुरुषों का दायित्व बनता है कि वे अपने कर्तव्य का पालन करते हुवे चाहे कैसी भी परिस्थिति हो धर्म के लिए संघर्ष करता ही है।
तुम बोल रहे हो कि ये हमारे अपने है हमारे पुजनीय है, हमारे प्रिय है हमारे सम्बन्धी है। हे आर्य श्रेष्ठ ये लोग अभी बुराई का साथ दे रहे हैं ये अधर्म का साथ दे रहे हैं और अधर्म का साथ देने वाले अनार्यों की श्रेणी में आते हैं यानि एक तरह से ये अनार्य ही है ऐसे समझो। अनार्यों का कोई धर्म-कर्तव्य नहीं होता है। वे तो मात्र हिंसा, चोरी, अपहरण, हत्या आदि में ही लिप्त रहते है और ऐसे कर्म करने वालों का जो साथ देते है वे चाहे आर्य हो, धर्मी हो, अनार्य ही कहलायेंगे, अधर्मी कहलायेंगे ऐसे लोगों को मारना आर्यो का धर्म है।
जो आर्य ऐसा नहीं करते वे श्रेष्ठ नहीं है सकते, वे स्वर्ग के अधिकारी भी नहीं हो सकते और नहीं उनकी प्रतिष्ठा हो सकती।
विशेष - चोरी करने वाले चोर का साथ देता है और चोरी का सामान खरीदता है वही भी गुनहगार ही होता हैं अतः हे आर्यो, जागो, उठो और हिन्दु, मुस्लिम का चोगा उतार फेंको श्रेष्ठ बनो, आर्य बनो।
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ब्रह्माण्डगुरु- भगवान प्रजापति -अधिष्ठाता - - प्रकृति शक्ति पीठ.
brahmand guru bhagawan prjapati -adhishthata -prikriti shakti pith-
ने कहा कि ॐ शांति !-
ॐ प्रेम !!
शब्द ही ब्रह्म है। शब्द से संस्कार बनते हैं। ये ही सनातन सत्य है !
ॐ तत्सत !जय भारत -!! आर्य संस्कृति सनातन धर्मेव जयते !
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ऊँ
पाक्षिक खेजड़ा एक्सप्रेस
(बीकानेर से प्रकाशित व प्रसारित)
वर्ष 24अंक-18दि0 -9-5-12 -------------------------------------page 12
.ब्रह्मा, विष्णु, महेश, त्रिगुणात्मक शक्तियां ने सनातन धर्म व वेदों की रचना आर्य संस्कृति की स्थापना की। राम ने विदेशी राक्षस संस्कृति से आर्य संस्कृति की रक्षा की। 
कृष्ण ने आर्य संस्कृति की रक्षा कीं। वशिष्ठ, विश्वामित्र आदि ऋषि-मुनियों, चाणक्य आदि ने आर्य संस्कृति की रक्षा की।
ये ही नहीं जगद्गुरु आदि शंकराचार्य ने आर्य संस्कृति और सनातन धर्म के वर्चस्व को कायम रखने के लिए चार धाम बनाये और शंकराचार्य के पद बनाये विधि की विडम्बना से आज ये शंकराचार्य सनातन धर्म, आर्य संस्कृति व हिन्दुत्व पर मौन है।
यह कैसी विडम्बना है आर्य संस्कृति का लोप हो रहा है और विदेशी संस्कृति का वर्चस्व स्थापित हो रहा है क्यों?, क्यों?, क्यों? क्या वशिष्ठ, विश्वामित्र, चाणक्य
आदि विचारों के ऋषि-मुनियों का भारत वर्ष में लोप हो गया है?
क्या हिन्दू संस्कृति विदेशी शब्द नहीं है? जिसका फारसी अर्थ चोर, डाकू, लूटेरा, गुलाम आदि है।
क्या इण्डिया का अर्थ भारत है? कदापि नहीं। भारत का अर्थ भारत ही है। इण्डिया का अर्थ आदिवासी व पिछड़ा है। हम न ही अब आदिवासी है और न ही पिछड़े और न ही हिन्दुस्तान का अर्थ भारत हो सकता है हम गुलाम नहीं, चोर नहीं, डाकू नहीं है। हम आर्य है, हम श्रेष्ठ है, हम भारतीय है ।
अतः भारत का अर्थ भारत ही है, भारत वर्ष है। आर्यावर्त है।
अतः इण्डिया, हिन्दुस्तान आदि शब्दों का भारतीय पन्नों से हटाया जावे।
शब्द से संस्कार बनते है। हमें आदिवासी, पिछड़ा, गुलाम, चोर आदि श्रेणी में नहीं रहना है। हमें भारत वर्ष बनाना है। हमें भारत वर्ष को विश्व का मार्ग दर्शन देने वाला शांति, अहिंसा की शक्ति बनाना है। हमें हिन्दू-मुस्लिम के कपड़े उतार कर आर्यता, श्रेष्ठता, भारतीयता के कपड़े पहनने है। आईये हमारा साथ दीजिये। आपकी शक्ति से ही भारतवर्ष विश्व की अग्रणी शक्ति बनेगी! सोचो!! विचार करों!!! अपने पूर्वजों को प्रणाम करो जिन्होंने आपको सनातन धर्म व आर्य संस्कृति दी है।
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ब्रह्माण्डगुरु- भगवान प्रजापति -अधिष्ठाता - - प्रकृति शक्ति पीठ.
brahmand guru bhagawan prjapati -adhishthata -prikriti shakti pith-
ने कहा कि ॐ शांति !
ॐ प्रेम !!
- शब्द ही ब्रह्म है। शब्द से संस्कार बनते हैं। ये ही सनातन सत्य है !
ॐ तत्सत !जय भारत -!! आर्य संस्कृति सनातन धर्मेव जयते !
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ऊँ
पाक्षिक खेजड़ा एक्सप्रेस
(बीकानेर से प्रकाशित व प्रसारित)
वर्ष 24अंक-19दि0 -24-5-12
---जगद्गुरु शंकराचार्य भगवान प्रजापति

ब्रह्माण्ड शान्ति का सोच परिवर्तन चेतना महायज्ञ के विशेष आयोजन में आर्य संस्कृति, सनातन धर्म और भारत वर्ष के मूल स्वाभीमान को बचाने के धर्म संघर्ष का शंखनाद हुआ।
हे आर्य, हे महामानव, गर्व से कहो हम आर्य ही है।
जैसा कि विदित है कि त्रिगुणात्मक शक्ति (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) ओंकार ने सनातन धर्म (प्राणी धर्म), आर्य संस्कृति और वेदों की रचना करके प्राणियों में श्रेष्ठ प्राणी मानव को दी।
सनातन धर्म, आर्य संस्कृति और वेदों को सत्युग ने पाला पोशा और राक्षस संस्कृति से रक्षा की।
त्रेतायुग मंे आर्य संस्कृति की विदेशी संस्कृति, राक्षस संस्कृति से श्री राम और श्री हनुमान ने रक्षा की। ये ही नहीं आर्य संस्कृति को विदेशी संस्कृति, राक्षस संस्कृति से वशिष्ठ, विश्वामित्र, दधीची गौतम आदि ऋषि मुनियों ने त्याग-तपस्या से रक्षा की तथा अपने शरीर तक का बलिदान किया है।
द्वापर युग में श्री कृष्ण ने आर्य संस्कृति की रक्षा की है। कलियुग में आदि गुरु शंकराचार्य, चाणक्य और हस्तिनापुर के अन्तिम सम्राट पृथ्वीराज चैहान तक से आर्य संस्कृति की रक्षा हुई है। स्वामी विवेकानन्द ने संसार के समक्ष आर्य संस्कृति और सनातन धर्म की पहचान कराई।
विधि की विडम्बना से अन्तत विदेशी हिन्दू-हिन्दू धर्म, हिन्दू संस्कृति ने आर्य संस्कृति, सनातन धर्म ओर भारत के मूल स्वाभीमान को गहरा आघात पहुंचाया है और भारत वर्ष के आर्यों और द्रविड़ों को हिन्दू-मुसलमान दो भागों में बांट दिया है।
आर्य संस्कृति, सनातन धर्म और भारत के मूल स्वाभिमान को बचाने के लिए सोच परिवर्तन चेतना महायज्ञ का विशेष आयोजन प्रकृति शक्ति पीठ में दिनांक 21-5-2012 को सुबह 9 बजे रखा ओर शंखनाद किया।
इस महायज्ञ में आर्य संस्कृति, सनातन धर्म और आर्यावर्त के स्वाभीमान को बचाने के साथ विदेशी आक्रान्ताओं को दिये हुवे भारतवर्ष के नाम हिन्दुस्तान, इण्डिया की जगह भारत वर्ष ही हो तथा दिल्ली का नाम इन्द्रप्रस्थ हो के संघर्ष का शंखनाद भी हुआ। यह धर्म संघर्ष, धरती-आकाश से (लेखन, पत्राचार, चर्चा, गोष्ठियां, इन्टरनेट) एक साथ लड़ा जायेगा। आप भी इस धर्म संघर्ष में अभी ही शामिल होईये। अधिष्ठाता - प्रकृति शक्ति पीठ, बीकानेर

--------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------- स्वदेशी-स्वदेशी का शोर करने वालों मूल स्वदेशी तो सदियों से हिन्दुत्व में दबी हुई है और
इन्द्र प्रस्थ का दिल्ली के नीचे समावेश हो गया।
जिसे राम, कृष्ण ने बचाया, जिसे वशिष्ठ, विश्वामित्र आदि ऋषि मुनियों ने बचाने के लिए सतत संघर्ष राक्षस संस्कृति से किया और इस संघर्ष में कई ऋषि-मुनियों ने शरीर बलिदान किये है।
आदि गुरु शंकराचार्य ने स्वदेशी के लिए संघर्ष किया और चार धाम बनाये। चाणक्य ने स्वदेशी के लिए संघर्ष किया और अन्त में हस्तिनापुर के अन्तिम वंशज पृथ्वीराज चैहान ने स्वदेशी आर्य संस्कृति और स्वाभीमान व सनातन धर्म को बचाने के लिए अपने शरीर का बलिदान किया।
सम्राट पृथ्वीराज चैहान के बाद स्वदेशी आर्य संस्कृति, स्वाभिमान और सनातन धर्म पर इतना गहरा वज्रपात विदेशी आक्रान्ताओं का हुवा कि भारतवर्ष की मूल स्वदेशी यानि संस्कृति और स्वाभिमान, हिन्दुत्व के आगोश में आ गया ओर सदियों की गुलामी में वह हिन्दुत्व की कैद में हो गया।
तत्पश्चात विदेशियों, अंग्रेजों ने इस पर मोहर लगाकर सील कर दिया और भारत वर्ष, हिन्दुस्तान और प्छक्प्। (इण्डिया) हो गया। आर्य संस्कृति हिन्दू-मुसलमान दो भागों में बंट गई। अब बताईये स्वदेशी का राग अलापने वालों कहां है वह आर्य संस्कृति, कहां है वह आर्यावर्त कहां है वह भारतवर्ष और कहां है वह सनातन धर्म। आज मूल आर्यों या द्रविडों में प्रकाण्ड से प्रकाण्ड पंडित से पूछते है कि आप कौन है आपका धर्म क्या है तो उसमें प्रायः प्रायः जवाब देते हैं हम हिन्दू है और हमारा धर्म हिन्दू धर्म है।
अब बताइये स्वदेशी का शोर करने वाले यह आप कैसे आडम्बर कर रहे है। अपने को पहिचानो और अपनी सोच बदलो। यानि व्यवस्था सोच परिवतर्नन चेतना महायज्ञ के आन्दोलन में शामिल होईये और मूल स्वदेशी संस्कृति, आर्य संस्कृति, सनातन धर्म और स्वाभिमान को पहिचानिये।
ईश्वर आपको सद्बुद्धि देंवे।
हे आर्यों एक होवो! गर्व से कहो हम आर्य ही है। भारत का मूल स्वाभीमान आर्य संस्कृति और सनातन धर्म खतरे में है। भारत का मूल स्वाभीमान, आर्य संस्कृति और सनातन को बचाना ही है। 
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ब्रह्माण्डगुरु- भगवान प्रजापति -अधिष्ठाता - - प्रकृति शक्ति पीठ.
brahmand guru bhagawan prjapati -adhishthata -prikriti shakti pith-
ने कहा कि ॐ शांति !
ॐ प्रेम !!
- शब्द ही ब्रह्म है। शब्द से संस्कार बनते हैं। ये ही सनातन सत्य है !
ॐ तत्सत !जय भारत -!! आर्य संस्कृति सनातन धर्मेव जयते !-------------------------
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ॐ - हमारा ध्येय ब्रह्माण्डिय पर्यावरण सुरक्षा व विश्व शान्ति एवं प्राणियों की स्वास्थ्य रक्षा करनी ही है। आप स्वस्थ रहेंगे तो धर्म-कर्म विद्यापार्जन, धनोपार्जन करेंगे। घर में तुलसी पौध लगाने से सुख-शान्ति मिलती है। प्रकृति शक्ति पीठ, खेजड़ा एक्सप्रेस से तुलसी, पीपल पौध निःशुल्क ले जावें। ------------------------------------------------------------------------------------------------------ पर्यावरण, आध्यात्मिक एवं समसामयिक विचारों एवं स्वास्थ्य रक्षा विषयक धरती से जुड़ा विश्व का अग्रणी ऊँ पाक्षिक खेजड़ा एक्सप्रेस (बीकानेर से प्रकाशित व प्रसारित) ---जगद्गुरु शंकराचार्य भगवान प्रजापति ब्रह्माण्डीय -प्रकृति शक्ति पीठ -बीकानेरjagadguru shankaracharya bhagwan prajapati 

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पाक्षिक खेजड़ा एक्सप्रेस
(बीकानेर से प्रकाशित व प्रसारित)
वर्ष 24अंक 20-21दि0 -24-6-12
---जगद्गुरु शंकराचार्य भगवान प्रजापति ब्रह्माण्डीय -प्रकृति शक्ति पीठ -बीकानेरjagadguru shankaracharya bhagwan prajapati brahmandiya,prakriti shakti pith ,bikaner

पाक्षिक खेजड़ा एक्सप्रेस.....24 जून 2012
आर्य संस्कृति -सनातन धर्म - आर्य समाज
आर्य संस्कृति और सनातन धर्म (प्राणी धर्म) का सृजन त्रिगुणात्मक शक्ति () ओंकर ने सृष्टि रचना के समय ही की है। आर्य संस्कृति सनातन धर्म प्रत्येक प्राणी को प्राकृतिक नियम से कार्य करने का अधिकार देता है। आर्य संस्कृति व सनातन धर्म विश्व को अपना परिवार मानता हैं। आर्य संस्कृति-सनातन धर्म सत्युग, त्रेतायुग, द्वापरयुग व कलियुग तक एक लम्बा विशालतम न समाप्त होने वाला सफर किया है।
आर्य समाज का गठन कलियुग में स्वामी दयानन्द सरस्वती ने किया है। आर्यसमाज के अनुयायी अपने को उच्च कोटि के आर्य समझते है और किसी की भी आलोचना करने में सक्षम है। आर्यसमाज इस्लामिक धर्म के मूर्ति पूजा सुत्र के विरोध से प्रभावित हैं इसलिए आर्यसमाजी कभी भी किसी भी तीर्थ या मन्दिर की आलोचना करने में हिचकिचाते नहीं है। स्वामी दयानन्द सरस्वती ने राम के वंशज गुरूनानक देव की भी आलोचना की थी।
लेकिन स्वामी दयानन्द सरस्वती , उच्च कोटि के विद्वान, सन्त, देश भक्त, समाज सुधारक, भारतीय संस्कृति, आर्य संस्कृति व सनातन धर्म के अनुयायी व रक्षक थे। पोषक थे। आर्य समाज के अनुयायी अपने श्रेष्ठता के अहंकार से प्रभावित होने के कारण सिमटता ही जा रहा है। आर्य समाज सेे जो युवक-युवतियां भाग कर विवाह करती है वे विवाह होने तक ही सम्बन्ध रखते है। आर्यसमाज की रिति-रिवाज से वास्तविक विवाह तो गिनती के ही हो रहे है।
उपरोक्त तथ्यों में यदि कहीं हमसे त्रुटि हो गई है, भूलवश भी ओर किसी के मन को अशानत किया है या अच्छा नहीं लगा है तो हम उनसे करबध क्षमा मांगते है और उनसे निवेदन करते है कि वे हमारा मार्गदर्शन करे क्योंकि वे श्रेष्ठ है
वे आर्य है। वे हमें क्षमा करे
---जगद्गुरु शंकराचार्य भगवान प्रजापति ब्रह्माण्डीय -प्रकृति शक्ति पीठ -बीकानेरjagadguru shankaracharya bhagwan prajapati brahmandiya,prakriti shakti pith ,bikaner

गांधी महात्मा भारत वर्ष के राष्ट्रपिता है।
राष्ट्रपिता महात्मा का कहना है सत्य-अहिंसा परमो धर्म है। जिस देश का राष्ट्रपिता सत्य-अहिंसा को परम धर्म मानते हैं उस देश में हिंसा, बलात्कार, लूट, झूट-कपट का साम्राज्य क्यों?
ओर उस देश में जीववध हो रहा है। क्यों?
जब देश में हिंसात्मक प्रवृतियां चर्मोत्कर्ष पर है तेा फिर गांधी जी के सत्य-अहिंसा परमोधर्म का क्या औचित्य है।
ओर तो ओर भारत वर्ष ही नहीं संसार का विकास ओर शक्ति का स्रोत गौ-धन है उसका वध क्यों? गांधी के देश में गोधन को गो माता के रूप में पूजा जाता है उसका वध क्यों?
ओर क्यों कांग्रेस सरकार ने गोवध के आन्दोलन को असफल किया? क्या सन्तों द्वारा चलाया गया आन्दोलन था! जिसका नेतृत्व जगद्गुरु शंकराचार्य ने किया इसीलिए .........!
जरा सोचो! इन्हीं सन्तों के आश्रमांे में आज भी मृत प्रायः अवस्था में भारत की संस्कृति आर्य संस्कृति सनातन धर्म सांसे ले रहे हैं और इन्हीं के आश्रमों में प्राचीन शास्त्र सुरक्षित (मौखिक व लिखित) है।
जबकि गीता प्रेस, आरएसएस, भाजपा आदि ने तो विदेशी इस्लामिक आक्रान्ताओं के दिये हुवे नाम हिन्द, हिन्दू, हिन्दूधर्म और हिन्दू संस्कृति को बढ़ावा देने में एडी-चोटी का जोर लगाकर आर्य संस्कृति और सनातन धर्म को लुप्त करने की कोशिश की है ओर इनकी सहयोगी संस्थाओं ने तो विदेशी इस्लामिक आक्रान्ताओं के दिये हुवे नाम से संस्थाएं तक बना रखी है ओर तो ओर स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा गठित आर्य समाज भी इस्लामिक धर्म के मूर्ति पूजा के विरोध के सुत्र से प्रभावित है जबकि असल आर्यसंस्कृति में ऐसा नहीं है।
आज आर्य संस्कृति की बात करते है तो तुरन्त बोलते है आर्यसमाज के हो क्या, जो हमारे सनातन धर्म की देवी-देवताओं की, मूर्तियों की पूजा करने का विरोध करते है। अब उन्हें समझ लेना चाहिये कि आर्य संस्कृति तो सतयुग से चली आ रही है जिसका सृजनकर्ता त्रिगुणात्मक शक्ति ओंकार है। जबकि आर्यसमाज का गठन कलियुग में स्वामी दयानन्द सरस्वती ने किया है।
हाँ! हम कह रहे है कि यदि गो-वध का आन्दोलन सन्तों ने किया था कौनसा प्रलय हो गया? फिर भी सत्य-अहिंसा परमो धर्म क्या है वह तो बताओ। अब सन्तों को छोड़ो। यह तो बताओ सत्य, अहिंसा परमोधर्म क्या है?
अब सन्तों को छोड़ो राष्ट्रपिता सत्य-अहिंसा के पुजारी हैै और आपके वैज्ञानिक भी जब कह रहे है कि गौ वध से पीड़ा की तरंगे उठती है ओर जिससे प्राकृतिक आपदाएं आती है फिर भी-गौ वध क्यों?
और जैन धर्म मौन क्यों? जो आर्य संस्कृति व सनातन धर्म का ही अंग है।
आइये असली सरकार जनता के पास चले। ये सरकार तो जनता की गाढी कमाई के धन से खुद के सुख-साधन बनाने में ही व्यस्त है। जनता का अधिकांश धन इनकी सुख-सुविधाओं पर खर्च हो रहा है।
अतः जनता सरकार के पास चले और गौ-वध को तुरन्त प्रभाव से बन्द करने का जोरदार आन्दोलन शुरू करे और आर्य - संस्कृति व सनातन धर्म का भी वर्चस्व बढ़ाकर भारत का मूल स्वाभिमान बचाकर भारत को विश्व की अग्रणी शक्ति बनावें।
अतः ‘‘ ब्रह्माण्ड ओम शान्ति’’ के सोच परिवर्तन चेतना महायज्ञ में अभी इसी क्षण शामिल होने का संकल्प लेवे और सम्पर्क करें।

---जगद्गुरु शंकराचार्य भगवान प्रजापति ब्रह्माण्डीय -प्रकृति शक्ति पीठ -बीकानेरjagadguru shankaracharya bhagwan prajapati brahmandiya,prakriti shakti pith ,bikaner
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ब्रह्माण्डगुरु- भगवान प्रजापति -अधिष्ठाता - - प्रकृति शक्ति पीठ.
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ने कहा कि ॐ शांति !
ॐ प्रेम !!
- शब्द ही ब्रह्म है। शब्द से संस्कार बनते हैं। ये ही सनातन सत्य है !
ॐ तत्सत !जय भारत -!! आर्य संस्कृति सनातन धर्मेव जयते !
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पाक्षिक खेजड़ा एक्सप्रेस
(बीकानेर से प्रकाशित व प्रसारित)
वर्ष 24अंक-22दि0 -9-7-12
---जगद्गुरु शंकराचार्य भगवान प्रजापति ब्रह्माण्डीय -प्रकृति शक्ति पीठ -बीकानेरjagadguru shankaracharya bhagwan prajapati brahmandiya,prakriti shakti pith ,bikaner

पाक्षिक खेजड़ा एक्सप्रेस...9 जुलाई 12
मैंने जन्म लिया, हिन्दू, हिन्दू धर्म में!
मैं मरुंगा नहीं हिन्दू-हिन्दू धर्म में!! -डाॅ. भीमराम अम्बेडकर (बाबा साहब)
इन शब्दांे का गूढ़ रहस्य क्या है?

उपरोक्त शब्द कभी बाबा साहब ने कहे थे? किसलिए कहे थे? किसको कहे थे? क्यों कहे थे? आदि आदि का हम वर्षों से चिन्तन-मनन कर रहें हैं। करते करते हम इस निर्णय पर पहुंचे कि बाबा साहब ने जान लिया होगा कि शब्द से संस्कार बनते है और शब्द हिन्दू और हिन्दू धर्म सबको हिन्दू बना देगा। इसके प्रभाव से मुक्त होने के लिए स्वयं ने बौद्ध धर्म अपनाया यानि उन्हें सत्य का ज्ञान हो गया था कि हिन्दू शब्द का अर्थ क्या है?
हालांकि वे आर्यसमाजी हो सकते थे परन्तु उन्होंने महसूस कर लिया था कि आर्य समाज विदेशी इस्लाम धर्म के मूर्ति पूजा के खण्डन से प्रभावित है और यहां आर्य संस्कृति पर वज्रपात हो रहा है जबकि बौद्ध धर्म में शुद्ध आर्य संस्कृति सनातन धर्म की झलक दिखाई दी होगी और वे बौद्ध हो गये यानि ज्ञानी हो गये। सत्य-अहिंसा के वास्तविक पूजारी हो गये और गांधी जी के सच्चे अनुयायी होकर संविधान के निर्माताओं में अग्रणी बनकर पूजनीय हो गये। आडम्बर से कोशों दूर चले गये। जबकि आज सत्य-अहिंसा के पूजारी देश में सभी आडम्बर कर रहे हैं यानि हिन्दूपथ की ओर अग्रसर होकर जनता की गाढ़ी कमाई से चन्द-देश के कर्णधार अपना खजाना भर रहे है। यदि ऐसा नहीं है तो विधायकों, सांसदों आदि के पास कुछ समय में ही हजार गुणा धन कैसे बढ़ जाता है।
‘‘स्व. राजीव गांधी ने कहा था कि जनता तक तो विकास के नाम पर रुपये में से 15 पैसे पहुंचते है।’’ तो फिर बाकी 85 पैसे कहां जाते है?
ये सब भ्रष्टाचार के कार्य हिन्दू शब्द के प्रभाव से है और शब्द हिन्दू के प्रभाव से गांधी जी की समाधि भी प्रभावित हो रही है।
भगवान बुद्ध को बोध हो गया, सत्य अहिंसा के पुजारी हो गये!
महात्मा गांधी को बोध हो गया, सत्य अहिंसा के पुजारी हो गये!
बाबा साहब को हिन्दू शब्द का बोध हो गया वे भगवान बुद्ध के शरण चले गये! हमें हिन्दू शब्द का बोध हो गया हम त्रिगुणात्मक शक्ति की शरण में होकर आर्य संस्कृति-सनातन धर्म के कार्य में लग गये।
अतः हिन्दूपथ को छोड़े और आर्यपथ, आर्यसंस्कृति, सनातन धर्म पर चलने की शपथ लेवें और ......

ऊँ

---जगद्गुरु शंकराचार्य भगवान प्रजापति ब्रह्माण्डीय -प्रकृति शक्ति पीठ -बीकानेरjagadguru shankaracharya bhagwan prajapati brahmandiya,prakriti shakti pith ,bikaner

........‘‘गांधी जी का चिन्तन करें’’......
राष्ट्रपिता महात्मा गांधी, बापूजी का मूल सिद्धान्त सत्य-अहिंसा परमोधर्म है। अतः जो भी बापू की समाधी स्थल पर जाते हैं। वे हिंसा न करने की समाधी स्थल पर प्रतिज्ञा लेवे। अन्यथा गांधीजी की समाधि को अपवित्र न करें।
यदि हिंसा परमोधर्म है और गांधी जी के नाम का मात्र सत्य-अहिंसा का आडम्बर ही कर रहे है तो यह बात जनता को जरूर बतावे। क्योंकि असली सरकार तो जनता ही है जिस की गाढी कमाई के बल-बूतें पर देश की सभी पार्टियां के कर्णधार ऐशो-आराम कर रहे है।

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ब्रह्माण्डगुरु- भगवान प्रजापति -अधिष्ठाता - - प्रकृति शक्ति पीठ.
brahmand guru bhagawan prjapati -adhishthata -prikriti shakti pith-
ने कहा कि ॐ शांति !
ॐ प्रेम !!
- शब्द ही ब्रह्म है। शब्द से संस्कार बनते हैं। ये ही सनातन सत्य है !
ॐ तत्सत !जय भारत -!! आर्य संस्कृति सनातन धर्मेव जयते !
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पाक्षिक खेजड़ा एक्सप्रेस
(बीकानेर से प्रकाशित व प्रसारित)
वर्ष 24अंक-23दि0 -24-7-12
---जगद्गुरु शंकराचार्य भगवान प्रजापति ब्रह्माण्डीय -प्रकृति शक्ति पीठ -बीकानेरjagadguru shankaracharya bhagwan prajapati brahmandiya,prakriti shakti pith ,bikaner

पाक्षिक खेजड़ा एक्सप्रेस.. 24 जुलाई 2012
वेदों में मूर्ति पूजा का खण्डन भी नहीं लिखा है जबकि हमने साकार-निराकार (आर्य समाज की मूर्ति पूजा खण्डन प्रकरण) पर लिखा तो आर्य समाज के सन्तों ने हायतौबा मचायी, धमकियाँ दी।

वेदों में नई-नई शोध करने का लिखा है तो आर्य समाज शोध करें या हमारी शोध को सरकार तक पहुंचाये कि शोर से भी नशा प्रवृति व वाहन दुर्घटनाएं होती है। ‘‘यह हमारी शोध अक्षरशः सत्य है लेकिन सरकार हमें तो टटपूूचिंया समझ रही है। ऐसा नहीं होता सरकार आज तक हमारी शोध के 12 सुत्रों पर वैज्ञानिकों से हमसे चर्चा करने जरूर भेजती।
आप तो आर्य है वेदों के ज्ञाता है आपकी बात सरकार अवश्य सुनंेगी।
सरकार गुटखों पर पाबन्दी लगावे, तम्बाकु पर पाबन्दी लगावे, शराब, मदिरा पर पाबन्दी लगावे, क्या होगा? कुछ नहीं! शराब पर पाबन्दी लगाई। अनापशनाप शराब माफियां पैदा हो गये और सरकार ने भी शराब बेचनी शुरू कर दी। पोलिथिन पर पाबन्दी है परन्तु पोलीथिन बेशुमार बिक रही है।
आज वाहन दुर्घटनाओं, नशा प्रवृति, भ्रष्टाचार, मिलावट खोरी, रिश्वतखोरी के मूल कारणों की शोध गहराई से करने की आवश्यकता है।
आर्य समाज के अनुयायी, वेदों के ज्ञाता और वैज्ञानिक इस पर शोध करे या हमारी शोध को समझे। माँ प्रकृति शक्ति आपको सद्बुद्धि देवे।
।।ऊँ तत्सत्।।

-जगद्गुरु शंकराचार्य भगवान प्रजापति ब्रह्माण्डीय -प्रकृति शक्ति पीठ -बीकानेरjagadguru shankaracharya bhagwan prajapati brahmandiya,prakriti shakti pith ,bikaner

गीता प्रेस, आरएसएस, भाजपा व सहयोगी संस्थाएं विदेशी संस्कृति के शब्द हिन्द-हिन्दू-हिन्दू धर्म, हिन्दू संस्कृति को ही बढ़ावा क्यों दे रही है? इसके पीछे रहस्य क्या है?
- भारतीय संस्कृति यानि आर्य संस्कृति, सनातन धर्म ही भारत का, आर्यावर्त का मूल स्वाभीमान है। इसे विलुप्त करने के षड्यन्त्र क्यों चल रहे हैं?
- रावण विद्वान ब्राह्मण आर्य था उसने ननिहाल की रक्ष संस्कृति को अपनाया और सम्पूर्ण विश्व में रक्ष संस्कृति की स्थापना करने लग गया।
- रावण के भारत वर्ष में, आर्यावर्त में भी उपनिवेश थे और इन उपनिवेशों में एक उपनिवेश पर शक्ति सम्पन्नता आर्य पुत्री ताड़का का नेतृत्व था
- फिर भी महारानी कैकेयी की कूटनीति, श्री राम-लक्ष्मण की शक्ति, श्री हनुमान की भक्ति, विश्वामिश्र, अगस्तय आदि अनेकानेक ऋषिमुनियों के त्याग-तपस्या के हमारी प्रयास आदि ने रावण जैसे शक्तिशाली सम्राट को भारत वर्ष में रक्ष संस्कृति को जबरदस्ती थोंपने नहीं दिया।
अब ‘‘ऊँ ब्राह्मण्ड ओंम शान्ति’’ ने आर्यवत्र्त के मूल स्वाभिमान को बचाने का प्रयास शुरु किया है इस प्रयास में अनेकानेक आर्यजन जुड़ रहे है और संकल्प ले रहे है कि विदेशी संस्कृति के शब्द हिन्द, हिन्दी, हिन्दू और हिन्दूस्तान की जगह आर्य संस्कृति, सनातन धर्म संस्कृति के वैदिक शब्दों को पुनः स्थापित किया जायेगा।
भारत वर्ष को इण्डिया व हिन्दूस्तान के शब्दों की पहचान से मुक्ति दिलाने व दिल्ली को इन्द्रप्रस्थ की पहचान दिलाने में हर सम्भव प्रयास में शामिल हो रहे है।
.......................................................................................................................-जगद्गुरु शंकराचार्य भगवान प्रजापति ब्रह्माण्डीय -प्रकृति शक्ति पीठ -बीकानेरjagadguru shankaracharya bhagwan prajapati brahmandiya,prakriti shakti pith ,bikaner

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ब्रह्माण्डगुरु- भगवान प्रजापति -अधिष्ठाता - - प्रकृति शक्ति पीठ.
brahmand guru bhagawan prjapati -adhishthata -prikriti shakti pith-
ने कहा कि ॐ शांति !
ॐ प्रेम !!
- शब्द ही ब्रह्म है। शब्द से संस्कार बनते हैं। ये ही सनातन सत्य है !
ॐ तत्सत !जय भारत -!! आर्य संस्कृति सनातन धर्मेव जयते !
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ॐ - हमारा ध्येय ब्रह्माण्डिय पर्यावरण सुरक्षा व विश्व शान्ति एवं प्राणियों की स्वास्थ्य रक्षा करनी ही है। आप स्वस्थ रहेंगे तो धर्म-कर्म विद्यापार्जन, धनोपार्जन करेंगे। घर में तुलसी पौध लगाने से सुख-शान्ति मिलती है। प्रकृति शक्ति पीठ, खेजड़ा एक्सप्रेस से तुलसी, पीपल पौध निःशुल्क ले जावें। ------------------------------------------------------------------------------------------------------ पर्यावरण, आध्यात्मिक एवं समसामयिक विचारों एवं स्वास्थ्य रक्षा विषयक धरती से जुड़ा विश्व का अग्रणी ऊँ पाक्षिक खेजड़ा एक्सप्रेस (बीकानेर से प्रकाशित व प्रसारित) ---जगद्गुरु शंकराचार्य भगवान प्रजापति ब्रह्माण्डीय -प्रकृति शक्ति पीठ -बीकानेरjagadguru shankaracharya bhagwan prajapati 
ऊँ
पाक्षिक खेजड़ा एक्सप्रेस
(बीकानेर से प्रकाशित व प्रसारित)
वर्ष 24अंक-24दि0 -09-8-12
पति के सम्मान में कार्य करने वाली ,पति के पीछे शरीर का बलिदान करने वाली महिलाओं को सत्ती क्यों कहा गया ?
शिव पत्त्नी पार्वती दक्ष प्रजापति के यज्ञ के हवन कुण्ड में कूद गई?

उपरोक्त शीर्षक पढ़कर आपको अचम्भा हो रहा होगा कि हमने प्रश्न क्यों किया है क्योंकि दिनांक 16-7-2012 को एक दैनिक पत्र ने खाप पंचायत के बारे में छापा कि - 1. शिव की पत्नि पार्वती ने दक्ष प्रजापति के यज्ञ के हवन कुण्ड में कूद कर प्राण त्याग दिये। 2. शिवगण वीरभद्र ने यज्ञ स्थल में जाकर मारकाट करके यज्ञ-स्थल तहस-नहस कर दिया। दक्ष प्रजापति का वध कर दिया। 3. और यह उपरोक्त निर्णय क्षाप पंचायत ने सत्ययुग में किया। यह प्रथम खाप पंचायत थी।
यह आलेख प्रकाशित होने के बाद इतने समय में अभी तक कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई जबकि यह तीनों ही सुत्र एकदम असत्य ही नहीं परम असत्य है-
जगद्गुरु शंकराचार्य, विद्वजन, संत, विद्वान उपरोक्त आलेख में अभी मौन है? आखिर क्यों? क्यों? क्यों? 
बात एक ही समझ में आती है कि जो कोई भी भारतीय संस्कृति, सनातन संस्कृति, आर्य संस्कृति पर कुछ भी लिख दे उसका विरोध करने की शक्ति जगद्गुरु शंकराचार्यों में भी नहीं है। तभी तो भारतीय, आर्य, सनातन संस्कृति हिन्दू संस्कृति, हिन्दू धर्म में परिवर्तित हो रही है आर्य हिन्दू हो गये भारतवर्ष हिन्दूस्तान और इण्डिया हो गया।
और भारतवर्ष को चलाने वाले विद्वान ब्राह्मण वर्चस्व के अधीन होने के कारण जगद् उत्पतिकत्र्ता प्रजापति ब्रह्मा के मूल वंशज कुम्हार, प्रजापति ने हिन्द-हिन्दी-हिन्दू ओर हिन्दुस्तान जैसे शब्दों से भारत वर्ष की मूल पहिचान पर गम्भीर खतरे की चेतावनी दी है तो ब्राह्मण वर्ग विशेष तौर से मखौल उड़ा रहा है कि एक कुम्हार होकर ब्राह्मणों को, संतों को, जगदगुरु शंकराचार्य को उपदेश दे रहा है यानि सूर्य को दीपक दिखा रहा है। आज ब्राह्मण वर्ग चाहे जितनी मखौल उड़ावे, सन्तजन मखौल उड़ावे परन्तु वे पूजनीय अपने अन्दर झांककर देखे कि सृष्टि रचियता कुम्हार ही है- कर्मों के अनुसार जातीय बनी है, सृष्टि रचियता के असली वंशज कुम्हार ही है प्रजापति ही है। 
पुजनीय महानुभाव ये भी देखें कि क्या वे विकास के पथ पर है क्या उनके कार्यों से भारतवर्ष की संस्कृति अक्षूण रह पायेगी ओर तो ओर जिस प्रकार ब्राह्मणों के स्तर, सन्तों के स्तर में गिरावट आई है उसके मूल कारणों को एक मात्र प्रजापति ही बता सकते है ये बात आज से नहीं पिछले कई वर्षों से खुले रूप से कह रहे है और लिख भी रहे है यदि ब्राह्मणों, सन्तों में विद्वता थी तो पार्वती को हवन कुण्ड में जिस दैनिक समाचार पत्र में कुदाया उसको पुनः खण्डन प्रकाशित कराने के लिए मजबूर क्यों नहीं किया गया खण्डन करना तो दूर की बात अपनी प्रतिक्रिया भी प्रेषित नहीं की।
जब विद्वजन, देश के अग्रणी ऐसे विद्वान है तो देश में हिन्द, हिन्दू, हिन्दी और हिन्दूस्तान व इण्डिया जैसे शब्दों का ही वर्चस्व बढ़ेगा। 
अरे भारतीय आर्यों, द्रविडों, जागो तुम्हें सनातन जगावे, आर्य संस्कृति जगावे, सनातन धर्म जगावे। भारत वर्ष की मूल आत्मा जगावे। भारतवर्ष के देवी-देवता जगावे। भारतवर्ष की ऋषि-मुनियों की आत्मा जगावे।
अब हम प्रथम प्रश्न का उत्तर देते है शिव की पहली पत्नि दक्ष प्रजापति की पुत्री ‘सती’ हवन कुण्ड में कूदी थी क्योंकि उनके पति का आसन उस यज्ञ स्थल में नहीं था शिव का आसन उस यज्ञ स्थल में नहीं था अपने पति की बेइज्जती सहन नहीं कर पायी ओर हवन कुण्ड में कूद गयी। इसलिए पति के लिए शरीर त्यागने वाली महिलाओं को, पति के सम्मान में कार्य करने वाली महिलाओं को सती के नाम से महिमा मंडित किया गया है।
सत्ययुग की प्रथम - क्षाप पंचायत 
1. जो महिला पति के सम्मान का कार्य करेगी उसे सती की उपाधि से विभूषित किया जावेगा। 2. दक्ष प्रजापति को राजकीय सत्ता से पदच्युत कर दिया और कहा इनमें राज कार्य करने की दक्षता नहीं है। इस प्रकार इस पंचायत के फैसलों में ऐसे फैसले है जिसका प्रभाव आज भी कायम है और प्रजापति समाज इससे आज भी प्रभावित है।

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ब्रह्माण्डगुरु- भगवान प्रजापति -अधिष्ठाता - - प्रकृति शक्ति पीठ.
brahmand guru bhagawan prjapati -adhishthata -prikriti shakti pith-
ने कहा कि ॐ शांति !
ॐ प्रेम !!
- शब्द ही ब्रह्म है। शब्द से संस्कार बनते हैं। ये ही सनातन सत्य है !
ॐ तत्सत !जय भारत -!! आर्य संस्कृति सनातन धर्मेव जयते !
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ॐ शांति !!!

 सनातन धर्म ही प्राचीन से प्राचीन ॐकार-ओंकार रचित धर्म है ।

सनातन धर्म ही एक मात्र धर्म है जो स्रष्टि रचना के समय से "सतयुग "से सनातन, अविरल चला आ रहा है ।

सनातन धर्म ही-----------------------अन्य धर्मों का जन्दाता है ।

सनातन धर्म ही से जैन धर्म का जन्म हुआ है !

-ये सनातन सत्य ही है ! 

सनातन धर्म ही से बॊद्ध धर्म का जन्म हुआ है !

-ये सनातन सत्य ही है !

सनातन धर्म ही मानव धर्म है।प्राणी धर्म है !

माता-पिता-गुरु की छत्रछाया में बौद्धिक व शारीरिक विकास सम्भव है।

सनातन धर्म हमें सिखाता है--माता-पिता-गुरु की छत्रछाया में बौद्धिक व शारीरिक विकास सम्भव है।

सनातन धर्म हमें सिखाता है- -माता-पिता-गुरु के प्रति----------प्रेम करों !

सनातन धर्म हमें सिखाता है- -प्रकृति-पर्यावरण -वनस्पति के प्रति --------प्रेम करों !

सनातन धर्म हमें सिखाता है- -तुलसी -पीपल पेड़ -पौधोंके प्रति --------प्रेम करों !

सनातन धर्म हमें सिखाता है- -जीव मात्र के प्रति ---------प्रेम करों !

सनातन धर्म हमें सिखाता है- -समस्त संसार के प्रति ---------प्रेम करों !

सनातन धर्म हमें सिखाता है- -सभी धर्मों के प्रति -------प्रेम करों !

सनातन धर्म हमें सिखाता है- -त्याग -तपस्या से योग की उर्जा मिलती है!

-(इसे किताबों से नहीं सदगुरु से ग्रहण करों !)

सनातन धर्म हमें सिखाता है- - "वसुधैव कुटुम्बकम " की भावना रखों ।

सनातन धर्म हमें सिखाता है- - "वसुधैव कुटुम्बकम " से श्रद्धा रखे, सेवा करें। 

सनातन धर्म रूपी वृक्ष अपने आप में महाशास्त्र है। महावृक्ष है। तथा माता-पिता-गुरु है, अतः इसकी छत्रछाया में ही हमारा कल्याण है।

सनातन धर्म रूपी वृक्ष के नीचे- छत्रछाया में-हमें असीम शीतल शांति मिलती है !

-ये सनातन सत्य ही है ! 

ॐ तत्सत !

शब्द ही ब्रह्म है। शब्द से संस्कार बनते हैं। ये ही सनातन सत्य है !

ब्रह्माण्डगुरु- भगवान प्रजापति -अधिष्ठाता - -प्रकृति शक्ति पीठ.

brahmand guru bhagawan prjapati -adhishthata -prikriti shakti pith

ब्रह्माण्डगुरु- भगवान प्रजापति -अधिष्ठाता - -प्रकृति शक्ति पीठ.

brahmand guru bhagawan prjapati -adhishthata -prikriti shakti पीठ ने कहा कि -

-

-जगद्गुरु शंकराचार्य -मिडिया -देश के कर्णधार -विद्वान आदि बतावें" हिन्दू "" शब्द "कहाँ है ?

-

देखे जी भरकर सबूत -जो अटल सत्य ही है ।

-

ये तो हमने 

आर .एस एस को भी कहा था 

- कि ये हमारे मान्य शास्त्र नहीं है -

मान्य शास्त्रों के नाम हमने बता दिए है --जब हमारी संस्कृत और देनागरी भाषा का ही" हिन्दू " शब्द नहीं है -हम यदि पुराणोंकी बात भी करे तो उसमें भी हिन्दू शब्द नहीं है ।

आपने(प्राचीन साहित्य माधव दिग्विजय ) साहित्य बताया है न की शास्त्र -शास्त्रों के नाम हमने बता दिए है।-

आप भी -हम भी साहित्य -पुस्तकें -उपन्यास -कहानिया में जो लिखेंगे वे आपके- हमारे विचार है -

उसको सनातन धर्म -संस्कृति मान्यता नहीं देती ।

-

-मनुस्मृति को भी मान्य शास्त्रों में मान लिया है --उसमें भी नहीं है --शब्द-" हिन्दू" !

पुराणों में भी - नहीं है --शब्द हिन्दू !

अब हम पुराणों के नाम बता रहे हैं ।


सही और गलत का फैसला तथाकथित हर किसी के लिखने से नहीं -अपितु हमारे मान्य वेद-उपनिषद् आदि मान्य शास्त्रों से होता है ---

वैसे आप लाला लाजपतराय से बड़े हो तो और बात है -उन्होंने भी १८९८ में कहा था कि -हिन्दू शब्द भारतीय सनातन आर्यों को अपमानित करने के लिए इस्लामी आक्रंताओ ने जबरदस्ती थोपा है ।-जिसका आर्थ -गुलाम -चोर आदि ही है -ये सब सबूत -

आप खेजडा एक्सप्रेस -९-८-११ व २४ ५- १३ में पढ़ सकते हों ।

---मिडिया -देश के कर्णधार -विद्वान बतावें हिन्दू कहाँ है ?

-

देखे जी भरकर सबूत -जो अटल सत्य ही है ।

-

--हिन्दू शब्द---

-९९७ ईसवी में महमूद गजनवी ने पहला डाका डाला था ऒर २७ डाके डाले थे -के साथ व बाद के आक्रान्ताओ ने भारतीय भू -भाग के सनातन आर्यों को- जैनों -बोद्धो को गाजर -मूली की तरह काटा था और हिन्दू बनाया _।

बाद में जिन्होंने इस्लाम स्वीकार किया वे मुसलमान कहलाये ।

ये ही अटल ऐतिहासिक सत्य है ।

सदियों -वर्षों कीइस्लामी गुलामी में हमारे पूर्वज अपनी पहचान भूल गए -

फिर इंग्लिश गुलामी में रहते -रहते तो सब कुछ-बदल गया ।

-क्योंकि -हिन्दू -मुस्लिम -एक्ट अंग्रेजों ने जो बना दिया ।

इस प्रकार हिन्दू शब्द हमारे गले में रह ही गया ।

स्वतंत्रता के बाद किसी ने शब्द कोष संभालने की कोशिश ही नहीं की -।

हमारे शब्द कोषों में साफ लिखा है की -हिन्द -हिंदी -हिन्दू -हिन्दुस्थान आदि फारसी शब्द है ।

-

-फारसी -उर्दू शब्द कोषोंमें हिन्दू का अर्थ बताया है ----गुलाम -आज्ञाकारी नॊकर-डाकू -चोर -राहजन आदि आदि।

-

अत हिन्दू न ही हमारा शब्द है - हिदू न ही हमारी जाति है -हिन्दू न ही हमारा धर्म है ।

यह अटल सत्य है -हमारा धर्म है -सनातन --जो प्राचीन से प्राचीन है -जिससे बाद के सभी धर्म प्रेरित-प्रभावित हुवे है ।

-

मिडिया -देश के कर्णधार -विद्वान बतावें हिन्दू कहाँ है ?

देखे जी भरकर सबूत -जो अटल सत्य ही है ।

-

--सृष्टि उत्पति -सतयुग से सनातन के-

ईश्वर रचित वेद-सनातन धर्म के किसी भी शास्त्र में हिदू शब्द नहीं है !

- ४ -चारों वेदों -में --नहीं है -शब्द "हिन्दू "-!!!

१-ऋग्वेद 

२-यजुर्वेद 

३- सामवेद 

४- अथर्ववेद 

-- ४-चारों उपवेदों --में --नहीं है -शब्द "हिन्दू "-!!!

१- आयुर्वेद 

२- धनुर्वेद 

३- गन्धर्ववेद

४-अर्थवेद 

६ - छ :दर्शन शास्त्रों--में --नहीं है -शब्द "हिन्दू "-!!!

१-मीमांसा दर्शन -----जैमिनी 

२-साख्य दर्शन ---------कपिल 

३-न्याय दर्शन ------गॊतम

४-विशेषिक -----वाद 

५-योग दर्शन ---पतंजलि 

६-वेदांत दर्शन ---वेदव्यास 

- ६- छ :अंग में ---में --नहीं है -शब्द "हिन्दू "-!!!

१- शिक्षा 

२- कल्प 

३-व्याकरण 

४- सिरुक्त 

५-छंद 

६-ज्योतिष 

४- चार ब्राह्मण ग्रंथों --में --नहीं है -शब्द "हिन्दू "-!!!

१- शतपथ ब्राह्मण 

२-ऐतरेय ब्राह्मण 

३- ताण्डय ब्राह्मण 

४- गोपथ ब्राह्मण 

१०३ -एक सॊ तीन उपनिषदों में से- (१३ -) तेरह -का महत्त्व है पर (११- )-ग्यारह ही ज्यादा महत्त्व रखते है ।-बाकी के दो का भी विशेष स्थान है ---- में --नहीं है -शब्द "हिन्दू "-!!!

१-ईसोपनिषद 

२-केनोपनिषद 

३- कन्ठोपनिषद

४-प्रश्नोपनिषद 

५-मुण्डकोपनिषद

६-एतरेयोपनिषद

७- मांडूक्योपनिषद 

८- छान्दोग्योपनिषद 

९- तैतिरीयोपनिषद 

१०-वृहदोपनिषद 

११-मैत्राणीय -आख्योपनिषद 

१२-श्वेताश्वर 

१३ कोषीतक

मनुस्मृति भी मान्य ग्रन्थ है -- -में --नहीं है -शब्द "हिन्दू "-!!!

- वाल्मीकी रामायण ---में --नहीं है -शब्द "हिन्दू "-!!!

गीता -महाभारत ----में --नहीं है -शब्द "हिन्दू "-!!!

- तुलसी -रामायण ----में --नहीं है -शब्द "हिन्दू "-!!!

हमारी देव भाषा --संस्कृत -----में --नहीं है -शब्द "हिन्दू "-!!!

- हमारी देवनागरी भाषा -------में --नहीं है -शब्द "हिन्दू "-!!!

ॐ तत्सत !

शब्द ही ब्रह्म है। शब्द से संस्कार बनते हैं। ये ही सनातन सत्य है !

ब्रह्माण्डगुरु- भगवान प्रजापति -अधिष्ठाता - -प्रकृति शक्ति पीठ.

brahmand guru bhagawan prjapati -adhishthata -prikriti shakti pith

kejada express ank 23-24 ,dinak 9-8-14
पाक्षिक खेजड़ा एक्सप्रेस -पाक्षिक खेजड़ा एक्सप्रेस ---पाक्षिक खेजड़ा एक्सप्रेस
दिनांक9-8-14 वर्ष 26 अंक 23-24
वार्षिक 36-रुपये-मूल्य - 1.50

पो. पजि. स. बीकानेर025/2012-14.
पर्यावरण, आध्यात्मिक एवं समसामयिक विचारों एवं स्वास्थ्य रक्षा विषयक धरती से जुड़ा विश्व का अग्रणी शास्त्र
पाक्षिक खेजड़ा एक्सप्रेस
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तुलसी पौध से स्वस्थ रहे-
- आर्य संस्कृति, माता-पिता- गुरु, प्रकृति
वनस्पति, तुलसी और पर्यावरण से जोड़ने का हमारा महायज्ञ सफलता की ओर अग्रसर है। आप आज ही शामिल होवे। -प्रजापति
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हमारा ध्येय ब्रह्माण्डिय पर्यावरण सुरक्षा व विश्व शान्ति
एवं प्राणियों की स्वास्थ्य रक्षा करनी ही है।
आप स्वस्थ रहेंगे तो धर्म-कर्म विद्यौपार्जन,धनोपार्जन
करेंगे। घर में तुलसी पौध लगाने से सुख-शान्ति मिलती है।
प्रकृति शक्ति पीठ, खेजड़ा एक्सप्रेस से तुलसी, पीपल
- पौध निःशुल्क ले जावें।
ऊँ प्रजापतयै नमः ओम प्रजापति ब्रह्मायै नमः
प्रजापति ब्रह्मा ने सृष्टि रचना की है अतः ब्रह्मा प्रजापति के वंशज प्रजापति ही होने चाहिये , हिन्दू कैसे? और क्यों हो गये? जानिये!
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"सत्य से सत्य की खोज " 6 अरब लोगों मे- भगवान प्रजापति
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जो लोग वृक्ष के तने पर लगे फलों को खाते है तथा तने की ही सार-सम्भाल करते है। ऐसे लोगों के वृक्ष का तना टूट जाता है। वृक्ष सूख जाता है। उस वृक्ष की पहिचान खत्म हो जाती है।
जो लोग वृक्ष की जड़ों की सार-सम्भार करते है। वृक्ष की जड़ों में खाद-पानी देते है। उनके वृक्ष का तना भरपूर फल देता है। तना टूट भी जाता है तो नया तना खिल जाता है जो भरपूर फल देता है और वंश बढ़ाता है। इसी प्रकार जो लोग अपने पूर्वज, अपने जन्मदाता को भूल जाते है। अपनी जड़ों से कट जाते है वे कटे तने की तरह हो जाते हैं।
जैसे सृष्टि रचियता प्रजापति ब्रह्मा के वंशज अपने को प्रजापति कहलाने में शर्म महसूस करने लगे, अपनी दूसरी पहिचान बनाने का प्रयास करने लगे। इस प्रकार पूर्वजों की जड़ों से कटने से सनातन धर्म संस्कृति से ही कट गये और विदेशी लूटेरों ने गुलाम-मुसलमान, हिन्दू बना दिया और हिन्दू से हिन्दू धर्म - इस पर आधारित है ये ‘सत्य से सत्य की खोज ’ 6 अरब लोगों में (भाग-2) । आइये देखे... ओर पढ़े...
ब्रह्मा प्रजापति के वंशज प्रजापति ही है। प्रजापतियों ने नये-नये अनुसंधान किये इसलिए श्रेष्ठ या आर्य कहलाये। ऋषि-मुनियों की प्रेरणा के कार्य किये इसलिए आर्ष भी होने चाहिये थे, परन्तु हिन्दू कैसे हो गये? हम भारतीय होने चाहिये। हिन्दुस्तानी ओर इण्डियन कैसे हो गये?
ऊँ ही ब्रह्माण्ड की सर्वोपरि शक्ति है। ब्रह्माण्ड की रचना ओम ने की है। प्रजापति ब्रह्मा ही सृष्टि रचियता है। जिन्होंने ब्रह्माण्ड की रचना के बाद पृथ्वी पर सजीव-निर्जीव के स्वरूप बनाये। पंच महाभूतों, ग्रहों, नक्षत्रों आदि के साथ विभिन्न प्रकार के जीव-जन्तु-वनस्पति के पेड़-पौधों का सृजन किया। इनका पालन-पोषण किया। सत्-असत् की क्रिया कलापों का सृजन किया।
ब्रह्माण्ड के पृथ्वी ग्रह पर प्रजापति ब्रह्मा ने काल चक्र से सत्-असत् का सृजन किया है।
इन्हीं में मानवरूपी जीव का भी मिट्टी से सृजन किया। मानव मिट्टी का होता है। मिट्टी से जन्म लेता है। मिट्टी में ही फलता-फूलता है। मिट्टी में क्रिया-कलाप करता हैं। मिट्टी में रहकर सृष्टि निर्माण कर्ता के साथ मिलकर सृष्टि के विकास में सहयोग करता है। बच्चा जन्म के समय गीली मिट्टी का होता है। मानव-मरकर मिट्टी में मिल जाता है। अतः जब मानव रूपी जीव विकास करते-करते शैशव काल में आता है तो मिट्टी से खेलता हैं मिट्टी से खेलते-खेलते पत्थरों से खेलता है।
मिट्टी के घरौन्दे बनाता है। घरौन्दो को तोड़ता है।
इस प्रकार चलते-चलते मिट्टी के पात्र बनाता है। पत्थरों को तोड़ते-तोड़ते अग्नि की चिनगारियों को समझता है।
अग्नि का अविष्कार करता है।
पहिये, चक्र का अविष्कार करता है, उसे धुरी पर चलाता है।
ओर अपने गुण-धर्म के अनुसार मिट्टी के बर्तन बनाता है। पत्थर के बर्तन, औजार आदि बनाता हुवा प्रगतिपथ पर चलता रहता है।
इस प्रकार प्रजापति ब्रह्मा मिट्टी से जिस मानव रूपी जीव को बनाता है। मानव अपनी बुद्धि कौशल से अपने जन्मदाता, सृजनकर्ता, प्रजापति ब्रह्मा के गुण-धर्म प्राप्त करके जीवों में सर्वश्रेष्ठ शक्तिशाली जीव बन जाता है।
इस प्रकार मानव चक्र से, पहिये से मिट्टी के विभिन्न प्रकार के बर्तन बनाता है जो टूट जाने पर मिट्टी में मिल जाते हैं। मानव भी भरकर मिट्टी में मिल जाता है।
प्रजापति ब्रह्मा के इस गुण के कारण प्रजापति ब्रह्मा व प्रजापति द्वारा सृजन किया गया मानव भी कुम्भकार, कुम्हार कहलाता है।
मानव जब कुम्भकार रूप में था तब चक्र, पहिये व अग्नि का आविष्कार किया।
पहिये को ध्ुारी पर घुमाया। सृष्टि रचना में प्रथम वैज्ञानिक चमत्कार किया। आज कुम्भकार के इसी आविष्कार के कारण विज्ञान ने इतनी तरक्की की है।
इस प्रकार मानव ने सत्युग से त्रेतायुग से द्वापर युग और कलियुग के इस काल तक के सफर में कई उतार-चढ़ाव, प्रलय-महाप्रलय देखे है।
जब मानव जंगीली था। वनस्पति से, जीवों से उदरपूर्ति करता था। ऐसा करते-करते कृषि-गोपालक तक के सफर में मानव ने परिवार-समाज, कबीलों, गांवों, नगरों तक का सफर किया है।
इस तरह मानव ने सनातन धर्म के वेदों का ज्ञान प्राप्त किया। शास्त्रों, शस्त्रों आदि का ज्ञान प्राप्त किया। कई वैदिक अनुसन्धान किये तो आर्य कहलाया, श्रेष्ठ कहलाया और आर्य संस्कृति बनी। साथ ही मानव ने अपनी पहिचान के लिए अपने कार्यों, स्थानों, नामों के चिन्ह बनाये। वर्ण बनाये, कालान्तर में ये चिन्ह जातियाँ कहलाने लगी। परन्तु इस जातीय पहिचानों में कोई ऊँच-नीच नहीं थी। वर्णों में कोई ऊँच-नीच नहीं थी।
जो लोग पढ़ लिख गये वे ब्राह्मण, जो सुरक्षा के कार्य करते वे क्षत्रिय, जो कृषि-गोपालन का कार्य करते वे, वैश्य तथा इन तीनों वर्णों को जो सहयोग करते वे शूद्र कहलाते थे। ये सब पहिचान के लिए, एक सुव्यवस्थित व्यवस्था के लिए था।
शूद्र भी ब्राह्मण वर्ण का कार्य कर लेता तथा ब्राह्मण शूद्र का कार्यकर लेता इसमें किसी के प्रति हीन भावना नहीं थी। सभी, सभी को समान समझते थे।
चलते-चलते प्रकृति के गुण धर्म के अनुसार मानव में विकृतियां आई।
लोभ, मोह, माया, क्रोध आदि का उत्सर्जन हुआ। जातियों-उपजातियों में भेद-भाव होने लगा।
क्षत्रिय अपने को श्रेष्ठ समझने लगे, ब्राह्मणों ने भी अपनी श्रेष्ठता की पहिचान दे दी।
इस भेद-भाव के कारण कई लोग प्रताडि़त होने लगे उन्हें लगने लगा कि हमारे साथ अन्याय हो रहा है ओर ऐसे लोगों का आक्रोश समय-समय पर उबलकर बाहर आने लगा। विद्रोह होने लगे।
इस प्रकार - सुर-असुर दो विचारधाराओं का उदय हुवा जो आज तक के सफर में विभिन्न नामों की पहिचान लिये हुए हैं।
सतयुग के अन्तिम समय तक मानव पूर्ण रूप से विकसित था।
उस समय तक ब्रह्मचर्य आश्रम, गृहस्थाश्रम, वानप्रस्थ आश्रम, संन्यास आश्रम आदि की अच्छी व्यवस्था हो चुकी थी।
सनातन धर्म की विवाह प्रथा कई प्रकार की थी।
आज संसार में जितनी भी विवाह प्रथा हैं वे सब प्रथाएं सत्युग में सनातन धर्म में मान्य थीं, प्रेम विवाह में छूट थी मानता है। सनातन धर्म संसार को परिवार मानता था।
मानव ने एक जंगली कुम्भकार से सफर शुरु करके राज्य और राजा तक का सफर तय किया था इस सफर में ईष्र्या, मोह, माया-अहंकार का उदय हो गया था।
राजा में श्रेष्ठता का अहंकार आने लगा। इसी अहंकार के कारण दक्ष प्रजापति ने शिव को जंगली कहा, द्रविड़ कहा। परन्तु अपनी बड़ी पुत्री ‘सती’ के विवाह को शिव के साथ होने से रोक नहीं सका क्योंंिक उस समय सामाजिक व्यवस्थाओं का कुछ तो पालन करना ही होता था।
परन्तु अपना अहंकार दक्ष प्रजापति छोड़ नहीं सका। प्रजापति दक्ष शक्तिशाली, यज्ञवेता सम्राट जो था इसलिए ब्रह्मा के सभी गुण तो होने ही है, वेदों का ज्ञाता, धुरं-धर यज्ञवेता, शक्तिशाली सम्राट होने के कारण दक्ष ने अहंकार में चूर होकर शिव का अनादर करके अपनी पुत्री सती को हवन कुण्ड में भस्म हो जाने की घटना कर बैठे।
हाहाकार मचा, विध्वंश हुआ और अन्ततः ब्रह्माण्ड की प्रथम महापंचायत हुई जिसमें दक्ष प्रजापति को दोषी माना, इस महापंचायत जो निर्णय हुआ, उसमें दक्ष प्रजापति को राज्य बहिष्कार का दण्ड मिला। इस प्रकार दक्ष प्रजापति के पक्षकार थे दक्ष के साथ हो गये उन्होंने भी राज्य बहिष्कार स्वीकार किया। अपने को जो कुम्भकार कहते है, प्रजापति कहते है वे आज भी राज्य शक्ति से बहिष्कारित ही है। यहां तक की प्रजापति ब्रह्मा का भी पूजा अर्चना का मन्दिर नहीं है।
जिन्होंने अपनी पहिचान बदल ली वे आज राजशक्ति के शिरोमणि बने हुवे है। परन्तु इनके पूर्वज तो प्रजापति ही है।
दूसरा निर्णय यह हुवा कि जो स्त्री अपने पति के सम्मान में कार्य करेगी, मर मिटेगी आदि-आदि। उसे ‘सती’ की उपाधि दी जावेगी।
अब आप सोचिये कि आप कौन हंै, आपके पूर्वज प्रजापति ब्रह्मा हैं, आपके पूर्वज कुम्भकार हंै। यह भी सोचिये कि प्रजापति ब्रह्मा ने दक्ष के प्रति सहानुभूति दिखाई तो वे आज तक अलग थलग ही है।
एक बात और सत्युग में अच्छे-अच्छे कार्य होने लगे, मनुष्य निरन्तर अच्छे विकास कार्य करने लगा तो उसे श्रेष्ठ कहा जाने लगा। आर्य कहा जाने लगा इसलिए यहां के भू-भाग को आर्यावर्त कहा जाने लगा।
इस प्रकार आर्य-संस्कृति, सनातन धर्म का वर्चस्व पूरे ब्रह्माण्ड में प्रकाशित होने लगा।
ऋषि-मुनियों ने कई नये-नये अनुसन्धान किये, शास्त्र लिखे। इन्होंने प्राणी हित में, सृष्टि विकास में कई अच्छे-अच्छे नियम बनाये। इसलिए हम आर्य संस्कृति को आर्ष संस्कृति भी कह सकते है। अतः हम प्रजापति है, आर्य है, आर्ष है और भारतीय भी हैं, क्योंकि आर्यावर्त को विश्वामित्र की पुत्री शकुन्तला के शूरवीर पुत्र भरत के नाम से भारत भी कहा जाने लगा।
चलते-चलते मानव जब कलियुग में आता है तो मोह-माया-अहंकार का वर्चस्व बढ़ जाता है। ये वर्चस्व इतना बढ़ जाता है कि अपने पूर्वजों की पहिचान को भूलकर अपनी पहिचान में लिप्त होकर अपने धर्म-संस्कृति को भी विखण्डित करने में लगकर अपनी पहिचान की धर्म संस्कृति बनाने का प्रयास करने लग जाता है।
इसी क्रम में बौद्ध-जैन, ईसाई-इस्लाम आदि का प्रार्दुभाव होता है।
7वीं, 8वीं सदी में सनातन धर्म एक दम कमजोर होने लगता है तो प्रजापति शंकर नाम के युवक का उदय होता है और प्रजापति उन्हें विद्वान बनाते है और शंकर ऋषि-मुनियों का शास्त्रार्थ में हराकर आचार्य शिरोमणि बन जाता है।
इस प्रकार शंकर से शंकराचार्य ने सनातन धर्म-आर्य संस्कृति की रक्षा के लिए चार धाम बनाये और भागवस्त्रधारी संत-संन्यासी परम्परा शुरु करके इन धामों में विराजमान होने वाले को शंकर ने जगद्गुरु शंकराचार्य की उपाधि से विभूषित किया, जिनका मुख्य काम सनातन संस्कृति कहो, या आर्ष संस्कृति कहो पर आर्य संस्कृति-सनतान धर्म की रक्षा करना ही मूल ध्येय रखा गया था।
997 ई. में विदेशी आक्रमणकारी, लूटेरों द्वारा आर्यों को, प्रजापतियों को जबरदस्ती गुलाम (हिन्दू) बनाया जो इन ताकतों के अत्याचार सह नहीं कर सके उन्होंने धर्म परिवर्तन किया। वे मुसलमान बने।
सत्य तो ये ही है। ओर इन लूटेरों के दास बने, गुलाम बने, उन्हें हिन्दू कहा। इसी हिन्दू शब्द का इन शंकराचार्यों ने हिन्दू धर्म में परिवर्तन करने की कोशिश की है।
विस्तृत जानकारी के लिए खेजड़ा एक्सप्रेस 9.8.11, 9.8.13 व 24.3.14 के अंक पढ़े।
आज इस सत्य को भगवान प्रजापति ने उजागर किया तो कुछ अबोध लोग कह रहे है कि भगवान प्रजापति कुम्भकार हमें शिक्षा देगा कि हिन्दू कौन है?
शब्द ही ब्रह्म है। शब्द में शक्ति है! आज संसार में हिन्दू शब्द के कारण ही हिंसा, भ्रष्टाचार, लूट, बलात्कार का वर्चस्व हैं ये शब्द फारसी है अतः इस्लामिक हिंसा सर्वोपरि हो रही है। इस शब्द में नकारात्मक ऊर्जा भरपूर बढ़ गई है। इसे रोकना होगा। इसको संविधान से हटाना होगा। संसार के शब्दकोष से हटाना होगा।
यदि कोई वास्तविक आध्यात्मिक इस आलेख को पढ़ रहा है तो वे जरूर समझेगा कि बार-बार एक झूठ को बोलने से वह झूठ सिद्ध हो जाता है और अपनी शक्ति प्रदर्शित करता है । किसी वैदिक मंत्र या अन्य मन्त्र को बार-बार जपने से वह अपनी शक्ति के अनुसार सिद्ध हो जाता है। अपनी शक्ति प्रदर्शित करता है।
वाल्मीकि ने राम नाम का जप किया प्रहलाद ने राम का जप किया ध्रुव कुमार ने ओम नमो भगवते वासुदेवाय का जप किया। विश्वामित्र ने गायत्री मंत्र का जप किया ओर क्रूर सम्राट से ब्रह्मऋषि बन गये। गांधीजी ने राम का जप किया। अतः समझो, सोचो ओर कहो आर्य संस्कृति सनातन धर्मेव जयते शब्द ही ब्रह्म है शब्द में शक्ति है अतः हम प्रजापति है, आर्य है आर्ष है पर हिन्दू नहीं है।
ओम तत्सत्।
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हिंसा से स्वर्ग की ओर ! ओर रोम के नीरों का स्व.....
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हे मिडीया कर्णधारों, धर्म गुरुओं!
मारकाट की हिंसा से स्वर्ग मिल जायेगा। इसलिए आप सभी मिलकर एक निश्चिय समय तय कर लो ओर उस निश्चित समय में हम सभी एक दूसरे को मारना-काटना शुरु कर दे। कुछ ही समय में हम सभी मर-कटकर स्वर्ग में चले जायेंगे। हमारे शरीरों को जंगली-जानवर, पक्षी बड़े ही चाव से खायेंगे। हमें आशीर्वाद मिलेगा। पशु-पक्षी निर्भय होकर विचरण करेंगे। पेड़-पौधे, वनस्पति बिना किसी रुकावट से फलेगी फूलेगी। ओर चारों ओर स्वर्गीय वातावरण होगा। कैसा रहेगा? ये हिंसा से स्वर्ग की ओर! जरा सोचो! हिंसा के पुजारियों, विश्व विजेता सिकन्दर रास्ते में तड़फकर मरा। गजनवी को गौरी ने जलाकर राख कर दिया जबकि गजनबी ने भारतवर्ष को 27 बार लूटा था। गौरी को भारतवर्ष के शक्ति शिरोमणी आर्य पृथ्वीराज ने बार-बार हराया। अन्ततः पृथ्वीराज हारा तो गौरी ने चैहान को अन्धा कर दिया। नेत्रहीन हो जाने के बाद भी हस्तिनापुर/इन्द्रप्रस्थ के अन्तिम वंशज सम्राट आर्य पृथ्वीराज चैहान ने भरे दरबार में गौरी को सिंहासन पर तीर से बींध दिया। ओर खुद भी मर गया ओर इसी के साथ भारतवर्ष में स्वरभेध विद्या भी चली गई ओर भारतवर्ष का शौर्य विदेशी लूटेरों ने लूट लिया। यानि गुलाम बना लिया ओर कईयों को मुसलमान बना दिया।
हिंसा का पर्याय लादेन अन्तिम समय में भयभीत, अज्ञातवास जीवन जीया ओर उनकी भयावनी मौत हुई जिसकी कब्र तक का पता नहीं है।
रोम का क्रूर निर्दयी शासक का स्वर्ग कहां है? मुगलों के एक छत्र राज्य के अन्तिम सम्राट बहादुर शाह जफर को अंग्रेजी लूटेरों ने उन्हीं के महल में कैद करके आनन-फानन की तथाकथित अदालत से अपराधी घोषित करके जेल में डाल दिया।
जहाँ अंग्रेजी लूटेरों का संसार के साम्राज्य में सूर्यास्त नहीं होता था आज वे सिमट कर अपने देश में सूर्य का प्रकाश आता रहे के प्रयास में रत है।
सोचो-सोचो! सोचो, ओर सोचो! हिंसा रोको, प्रेम अपनाओ। अशोक सम्राट भी अशोक प्रिय बन गया था इसी कारण भारत सरकार ने अशोक प्रिय के चिन्हों को राष्ट्रीय चिन्ह बनाये है। अतः हे!
हिंसा के पुजारियों आप भी प्रियों के प्रिय बन जाओ। स्वर्ग इसी धरती पर है। नरक भी इसी धरती पर है।
ओम प्रेम! ओम शान्ति!! ओम तत्सत्!!!
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योग क्या है? -जाने -
अध्यात्म में दो रस्ते है एक योग का दूसरा भोग का । यानि राज करने का ।
जो¨ भोग का रास्ता चुनता है व यहीं अध्यात्म शक्ति नष्ट कर देता है ।
जो¨ योगका रास्ता चुनता है .व ओर शक्ति अर्जित करके ;शाांति+ प्रेम +ऊर्जा के सूत्र के अनुसार वह योगी हो ¨ जाता है . उनकी शक्ति के आगे राजकीय शक्ति भी नतमस्तक रहती है .यह सत्य ही नहीं परमसत्य है ।
विधि कि विडम्बना से इस समय ऐसा कोई संत नहीं हैजो¨ राजकीय शक्ति को झुका सके ।
पर्यावरण की सेवामें ---
जो लोग पेड़ -पौधे लगाते हैं उनकी सार-संभार करते हैं -वन्य जीवों
की रक्षा करते हैं ।वे लोग अष्टांग योग की प्रक्रिया पूरी कर लेते हैं !
यह रास्ता उन्हीं को सुगमता से मिल सकता है
इस काम से उन्हें संतुष्टि है- तो शांति भी मिलेगी -!
इन पेड़- पौधों- वन्य जीवों से प्रेम भी है-
त्यागी -तपस्वी भी हैं -
तो अपने आप शारीर में विलक्षण उर्जा भी आयेगी -ये ही योग का रास्ता है -
इस श्रेणी में किसान भी आ जाते हैं
-आदिवासी भी आ जाते है ।
सभी किसान -सभी आदिवासी इस योग के रास्ते को -प्राप्त नहीं कर सकते ।
क्योंकि योग का रास्ता जटिल तो है -असम्भव नहीं है -
-जो सत्य के पथ पर चलता है ।
समय का ध्यान रखता है -समय पर अपना काम पूरा करता हैं ।
-जैसे -कौनसे पेड़ -पौधों को कब उगाना है।
-कब पानी -देना है -कब सार -संभार करनी है ।
-वन्य जीवों को समय पर दाना -पानी देना आदि आदि ।
ऐसे लोगों में से कुछ त्यागी -तपस्वी भी होते हैं -
आप देख लीजिये कुछ किसान/आदिवासी प्रकृति का अद्भुत ज्ञान रखते है -
-वे मौसम की जो जानकारी देते हैं -उतनी सच्ची तो करोड़ों रूपयों का
मौसम विभाग भी नहीं दे पाता है ।
उनमें ईश्वरीय कार्य करने से योग की शक्ति मिल गई है ।
इन्हें लोग महात्माजी -योगीजी -त्रिकाल दर्शी कहते है !
इन्ही लोगों में से कुछ लोग गीता के अनुसार पुन र्जन्म लेते हैं -
राष्ट्र निर्माण का नेत्रत्व करते हैं -इन्ही में से कुछ लोग भटक भी जाते
हैं -बादलों कि तरह छिन्न - भिन्न हो जाते हैं -और
आज का भ्रष्टतंत्र पनपता है।
-इन्हें सही रास्ता दिखाने वाला सदगुरु नहीं मिलता।
क्योंकि आज कोई योग की शक्ति का सदगुरु ही नहीं है -
जो कोई है -उनकी इन्हें पहचान नहीं है -
वो इनसे बहुत दूर हैं !
आप अच्छी तरह जानले कि-
पर्यावरण और अध्यात्म का अन्नन्य सम्बन्ध है !
ॐ शांति - ॐ प्रेम -ॐ तत्सत -जय भारत
आर्य संस्कृति सनातन धर्मेव जयते !!
विशेष जानकारी के लिए ब्रह्माण्डगुरु भगवान प्रजापति-अधिष्ठाता प्रकृति शक्ति पीठ, खेजड़ा एक्सप्रेस
विशेष जानकारी के लिए हमसे मिले/सम्पर्क करे। मो. 7737957772
देखे http://bhagwanprajapati.webs.com/-- खेजड़ा एक्सप्रेस पढ़े

kejada express ank 22dinak 9-7-14
पाक्षिक खेजड़ा एक्सप्रेस -पाक्षिक खेजड़ा एक्सप्रेस ---पाक्षिक खेजड़ा एक्सप्रेस
दिनांक9-7-14 वर्ष 26 अंक 22
वार्षिक 36-रुपये-मूल्य - 1.50

पो. पजि. स. बीकानेर025/2012-14.
पर्यावरण, आध्यात्मिक एवं समसामयिक विचारों एवं स्वास्थ्य रक्षा विषयक धरती से जुड़ा विश्व का अग्रणी शास्त्र
पाक्षिक खेजड़ा एक्सप्रेस
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तुलसी पौध से स्वस्थ रहे-
- आर्य संस्कृति, माता-पिता- गुरु, प्रकृति
वनस्पति, तुलसी और पर्यावरण से जोड़ने का हमारा महायज्ञ सफलता की ओर अग्रसर है। आप आज ही शामिल होवे। -प्रजापति
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हमारा ध्येय ब्रह्माण्डिय पर्यावरण सुरक्षा व विश्व शान्ति
एवं प्राणियों की स्वास्थ्य रक्षा करनी ही है।
आप स्वस्थ रहेंगे तो धर्म-कर्म विद्यौपार्जन,धनोपार्जन
करेंगे। घर में तुलसी पौध लगाने से सुख-शान्ति मिलती है।
प्रकृति शक्ति पीठ, खेजड़ा एक्सप्रेस से तुलसी, पीपल
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1.मानसून ने मौसम विभाग की धज्जियां उड़ाई। 2. मानसून मौसम विभाग को बिना सूचना दिए ही बीकानेर से राजस्थान में प्रवेश कर गया।
3. मौसम विभाग को 23 जून की रात्रि में घनघोर वर्षा व 2 जुलाई रात्रि में बीकानेर से राजस्थान में मानसून का प्रवेश एक पहेली आज तक बन कर रह गई है।
जिसका समाधान
एक मात्र खेजड़ा एक्सप्रेस प्रकृति शक्ति पीठ के भगवान प्रजापति के ही पास है।
ऐसी वैदिक प्रक्रिया आगे भी होगी।
-भगवान प्रजापति

भगवान प्रजापति बीकानेर-4
प्रकृति शक्ति पीठ, खेजड़ा एक्सप्रेस द्वारा गीतों और संगीत से वाहन दुर्घटनाओं की शोध की सूचना पुलिस अधीक्षक बीकानेर को दी।
जिसकी संलग्न प्राप्ति रसीद दिनांक 23-4-2008 की है। इस पत्र को सरकार को भी भेजा है जिसमें एक पत्र मार्फत पुलिस अधीक्षक बीकानेर का है।
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समुन्द्र में जहरीले अवशेष डालने से समन्दर के पानी की गुणवत्ता में जहर घुल रहा है ओर यही जहर पानी के साथ भाप में आसमान में जाता है। इसी पानी से सूदूर तक वर्षा होती है और इसी वर्षा में समुन्द्र के जहरीले अवशेष भी बरसते है। यह क्रम ऐसा ही रहा तो आने वाले समय में पृथ्वी में त्राहि-त्राहि मच जायेगी। समुद्र में हर प्रकार का कुड़ा-करकट न डाले, कुड़े करकट को शोधन करने की परम्परा डालने से पर्यावरण को लाभ होगा।
मैं समुन्द्र ही हूँ
विधि की विडम्बना से आज हमें हमारे बच्चों के जीवन को बचाने व अपने मूल अस्तित्व व गरिमा को बचाने के लिए मजबूर होकर रोना-रोना पड़ रहा है हमें बचाया जावे।
युगों पहले जहां भी जल हुवा वहीं जीवन हुआ और जल के उद्गम का मुख्य स्थान का नाम समुन्द्र ही रखा गया है।
सीधे तौर से कहे तो पानी का स्वरूप जब बना तभी से विभिन्न प्रकार के जीवों का स्वरूप भी बना है।
बर्फ की चट्टानों में जीवन प्रक्रिया सुचारू रूप से चल नहीं पाती परन्तु पानी रूप में जीवन प्रक्रिया का विकास होता है।
हमारे यहां जो पानी होता है हम उसी पानी को धरती पर विचरण करने वाले अन्य जीवों को अग्नि व वायु तत्व के माध्यम से दूर-दराज तक भेजते हैं। हम वही पानी ऊपर भेजते है जो पूर्णतः शुद्ध होता है और वह पानी वायुदेव, अग्निदेव के साथ मिलकर आकाशीय सहयोग से पृथ्वी पर जहां आवश्यकता होती है वहीं भेजते है और वहां से अतिरिक्त पानी को पुनः हममें समावेश कर लेते हैं।
आज में बहुत ही दुःख के साथ कहना पड़ रहा है कि जो जल हम यहां से भेजते है उसके युगों से जो रास्ते थे जो विश्राम घर थे, जहां से तरोताजा होकर हमारा जल बादलों के रूप में आगे बढ़ता था। वे सब रास्ते अवरूद्ध कर दिये, वे विश्रामघर (पेड़-पौधे) जहां से नई ऊर्जा मिलती थी उनको तहस-नहस कर दिया।
आज जब हमारे पानी से बने बादल अपने गन्तव्य स्थान से आगे बढ़ते है तो उन्हें रास्ता नहीं मिलता। क्योंकि वे सब बादल अबोध होते है उनमें पिछले वर्ष के पानी के बादल जो होते हैं वे तो किसी न किसी तरह अवरोधों को दूर करके पिछले वर्ष की यादास्त के जरिये आगे बढ़ जाते हैं परन्तु जो नये सृजित बादल तो भटक जाते है और हतास होकर जहां-तहां जगह मिलती है वहीं अपनी जल बिखेर देते हैं इस प्रकार कहीं बाढ तो कहीं सूखा का प्रकोप सहन करना ही पड़ता है इस स्वार्थी शक्तिशाली मनुष्य को।
ये मनुष्य समझता है कि हमारी क्रियाकलापों का बुरा असर हम पर नहीं पड़ेगा। ऐसी सोच रख मनुष्य बहुत भारी भूल कर रहा है।
(जो जैसा बोयेगा वैसा ही उसे फल मिलेगा।) (जो खड्डा खोदेगा एक दिन उसे ही उस खड्डे में गिरना होगा)
मनुष्य ने वर्षाजन्य पेड़ काटे, हमारे बादल भटके ओर कष्ट मनुष्य के साथ मनुष्य के सहयोगी जीवों को भी हुवा है।
मनुष्य ने अपनी सुखसुविधा के साधनों के लिए जंगल के बच्चों को तो मारा ही है साथ हमारे बच्चों को भी मारा है। ये ही नहीं हमारे बच्चों को मारकर अपनी सुख-सुविधा के साधनों को बेशुमार बढ़ाया है तथा इसके लिए अनेकानेक औद्योगिक कारखाने खोल लिये गये है। इन कारखानों में अत्यधिक जहरीला रसायनिक अपशिष्ट जो निकलता है उसको हममें फैंक दिया है।
बेरहम क्रूर मनुष्य द्वारा फैंका गया जहरीले कचरे से हमारा पानी जहरीला हो गया इससे हमारे अनेकानेक छोटे-बड़े जीव (जलचर) तड़फ-तड़फ कर मर गये। आप विश्वास नहीं करोगे हमारे जीवों में विशालतम मछलियां भी मानव के क्रूर क्रिया-कलापों से मर रही है जिनके पेट में 40-40 किलो पोलीथीन निकलता है। जहरीले रासायनिक कचरे से अनेकानेक जीव अन्धे हो गये। अनेका नेक जीव बहरे हो गये है। अनेकानेक जीवों के घाव हो गये जो उनके शरीर में जलन पैदा कर रहे हैं और उनका जीवन नारकीय हो गया है।
ऐसे जहरीले रासायनिक कचरे से तड़फ-तड़फकर मरने वाले जीवों की तो गिनती ही नहीं है।
इस प्रकार मनुष्य जो जहरीला कचरा हममंे डालकर सन्तोष की सांस लेता है ओर हमारी नींद हराम हो जाती है। परन्तु मनुष्य यह भूल कर रहा है कि कभी हमें क्रोध आता है तो मनुष्य को भी हम प्रताडि़त करते हैं या हम यह भी कह सकते हैं कि हम क्या प्रताडि़त करे वह खुद ही अपने कुकृत्यों से प्रताडि़त होता है।
उसे आंधी तूफान, बवंडरों से भारी क्षति होती है साथ ही जो जहरीला कचरा डाला जाता है। उसे हम पानी के साथ वापिस मनुष्य को भेज देते हैं और वह कचरा वर्षा के साथ पुनः धरती पर आता है तो मनुष्य घबराता है ओर तरह-तरह की बाते करता है ये ईश्वरीय चमत्कार है ये फलां देवी का प्रकोप है, यह फंला देव को प्रसन्न करने के लिए संकेत है आदि आदि।
अरे घमंडी मानव किसी देव को प्रसन्न करने की जरूरत नहीं है मात्र हम समुद्र की सार-सम्भार की जरूरत हैं।
यदि जल हमने पुनः हवा के साथ नहीं भेजा तो तुम (मनुष्य) ही नहीं तुम्हारे सहयोगी जीव भी तड़फ-तड़फकर मर जायेगे ओर तुम सोचते हो कि हम धरती के गर्भ में पानी निकाल लेगें तो यह भी तुम्हारी भूल ही होगी। क्योंकि धरती के गर्भ में पानी हमारे द्वारा भेजे गये पानी वर्षा का ही जाता है।
अब समझ लीजिये कि आप क्या करना है क्या आपका आक्रमण हमारे ऊपर यूं ही जारी रहेगा क्या हमारे बच्चे यूं ही मरते रहेंगे या इसकी रोकथाम होगी।
अरे स्वार्थी मानव जरा सोच हममें जहरीला कचरा डालकर तूू जिस डाल पर बैठा है उसी डाल को काटने का कार्य कर रहा है जरा सोच तुम्हारे क्रिया कलापों से हमारे बच्चे मर गये ओर मर रहे हैं हमारे बादल सही जगह पहुंच नही ंरहे ओर इस कारण हमारे प्रिय भाई जंगल के बच्चे भी तड़फ-तड़फकर मर रहे हैं जरा सोच मनुष्य ये कितना घोर पाप हो रहा है इस घोर पाप का निवारण कैसे होगा। हमारे बादलों को सही रास्ता नहीं मिल रहा है उसका कारण खोज ओर तुझे नही ंमिल रहा है तो तु खेजड़ा की प्रकृति शक्ति पीठ के प्रजापति से मिल वह तुम्हें सही रास्त बतायेगा।
क्योंकि वर्षाजन्य पेड़ों के कटने से जो रास्ता की पहचान समाप्त हुई है उस रास्ते की पहचान अब प्रजापति के पास है लेकिन क्रूर मनुष्य ध्यान रख वर्षाजन्य मार्ग तो प्रजापति बता देगा परन्तु हममें जो जहरीला कचरा डाला है वह जल के साथ हम वापिस भेजेंगे तो इसका इलाज प्रजापति के पास नहीं है इसका एक मात्र इलाज है हममें जहरीला कचरा डालना बन्द करें वरना उसी जहरीले कचरे से है मनुष्य, तुम्हारे हाल का बेहाल हो जायेगा।
- प्रजापति
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हम आर्य ही है
जैसा कि विदित है कि त्रिगुणात्मक शक्ति (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) ओंकार ने सनातन धर्म (प्राणी धर्म), आर्य संस्कृति और वेदों की रचना करके प्राणियों में श्रेष्ठ प्राणी मानव को दी।
सनातन धर्म, आर्य संस्कृति और वेदों को सत्युग ने पाला पोशा और राक्षस संस्कृति से रक्षा की।
त्रेतायुग मंे आर्य संस्कृति की विदेशी संस्कृति, राक्षस संस्कृति से श्री राम और श्री हनुमान ने रक्षा की। ये ही नहीं आर्य संस्कृति को विदेशी संस्कृति, राक्षस संस्कृति से वशिष्ठ, विश्वामित्र, दधीची गौतम आदि ऋषि मुनियों ने त्याग-तपस्या से रक्षा की तथा अपने शरीर तक का बलिदान किया है।
द्वापर युग में श्री कृष्ण ने आर्य संस्कृति की रक्षा की है। कलियुग में आदि गुरु शंकराचार्य, चाणक्य और हस्तिनापुर के अन्तिम सम्राट पृथ्वीराज चैहान तक से आर्य संस्कृति की रक्षा हुई है। स्वामी विवेकानन्द ने संसार के समक्ष आर्य संस्कृति और सनातन धर्म की पहचान कराई।
विधि की विडम्बना से अन्तत विदेशी हिन्दू-हिन्दू धर्म, हिन्दू संस्कृति ने आर्य संस्कृति, सनातन धर्म ओर भारत के मूल स्वाभीमान को गहरा आघात पहुंचाया है और भारत वर्ष के आर्यों और द्रविड़ों को हिन्दू-मुसलमान दो भागों में बांट दिया है।
अतः आर्य संस्कृति, सनातन धर्म और आर्यावर्त के स्वाभीमान को बचाने के साथ विदेशी आक्रान्ताओं को दिये हुवे भारतवर्ष के नाम हिन्दुस्तान, इण्डिया की जगह भारत वर्ष ही हो तथा दिल्ली का नाम इन्द्रप्रस्थ हो का धर्म संघर्ष, धरती-आकाश से (लेखन, पत्राचार, चर्चा, गोष्ठियां, इन्टरनेट) एक साथ लड़ा जा रहा है। आप भी इस धर्म संघर्ष में अभी ही शामिल होईये।
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पाँच देवों (पृथ्वी, आकाश, अग्नि, वायु, जल) की प्रसन्नता के लिए दिया जाने वाला दान सर्वश्रेष्ठ दान है पर्यावरण शुद्धि के कामों से पाँच देव प्रसन्न होते हैं। -
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प्रकृति शक्ति पीठ
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दान के बारे में धर्मगुरुओं ने बहुत ही विस्तृत रूप से जानकारी दी है। अनेकानेक शास्त्रों में दान के बारे में लिखा हुवा है अनेक श्लोक, दोहे, कविताएं, कहानियां आदि दान के बारे में हमें पढ़ने को मिलती हैै।
अब हम भी दान के बारे में कुछ बताने जा रहे हैं जिसकी जानकारी से आप निश्चय ही लाभान्वित होगें। दान देना चाहिये ये आवश्यक ही नहीं अति आवश्यक है क्योंकि दान से विकास होता है। दान को देते समय दान लेने वाले पात्र स्थान, प्रयोजन समय आदि का विशेष ध्यान रखना होता है। दान में किसान धरती को अनाज देता है। जब दान जब धरती को दिया जाता है तो किसान को समय-स्थान-प्रयोजन का ध्यान रखना होता है। जब वह धरती को जिस अनाज का दान कर रहा है वह अनाज दोष मुक्त होना चाहिये। धरती भी दान लेने में सक्षम होनी चाहिये। धरती को अनाज देते समय-समय का भी ध्यान रखना होता है। यदि किसान जुलाई-अगस्त में कणक का दान करेगा तो वह निरर्थक जायेगा और अक्टुबर-नवम्बर में ग्वार-मोठ का धरती को दान करेगा तो वह निरर्थक जायेगा।
इसी प्रकार वह धरती जहां किसान अनाज का दान करता है वह उपयुक्त है या नहीं है वह दान पचा सकेगी या नहीं ये सब बातें देश-काल समय के अनुसार परिवर्तित हो जाती है। अब दान के भावों का भी महत्व होता है। मन-कर्म-वचन का विशेष ध्यान रखना चाहिये। मन कर्म वचन का सन्तुलन बनाकर दिया गया दान निरर्थक नहीं जाता बशर्ते जिसको दान दिया जाने वाला दान मन-कर्म-वचन के पवित्र भाव किया जाता हैै तो निश्चय मानो दिया जाने वाला अनाज हजार गुणा फल देता है।
दान धार्मिक स्थलों के लिए भी दिया जाता है पारिवारिक अभावग्रस्तों के लिए भी दान दिया जाता है। अभावग्रस्त पड़ोसियों, मित्रों आदि को भी दान दिया जाता है। अभावग्रस्त धूमन्तु लोगों को भी दिया जाता है इस प्रकार दान, औषधालयों, धर्मशालाओं, स्कूलों आदि के अलावा कई संस्थाओं को दिया जाता है।
जहां भी दान दिया जा रहा है उसके लिए कुछ विशेष जरूरी बातें ध्यान रखनी जरूरी होती है क्योंकि सही जगह सही पात्र सही प्रयोजन के लिए दिया जाने वाला दान हजार गुणा बढ़ोतरी करता है। सबसे पहले जो दान प्राणियों के कल्याण के लिए दिया जाना चाहिये जहां अनेकानेक प्राणी उस किये गये दान से लाभान्वित होने चाहिये। ऐसे दान में प्राथमिकता उसे देनी चाहिये जो समय मांग कर रहा है।
आज समय की पहली मांग है पवित्र कृत्यों की। क्योकि वर्तमान में धार्मिक कृत्यों में आडम्बर की चकाचैंध बढ़ती जा रही है और इस चकाचैंध में दानवीर प्रभावित होकर खींचा चला जाता है और न चाहता हुआ भी आडम्बर की चकाचैंध में दान कर देता है जबकि वहां पहले से असंख्य दानवीरों के दान के ढेर पेड़ हुवे हैं।
उदाहरण (किसान जहां अनाज का दान करता है वहां वह दूसरे दिन भी करे और तीसरे दिन भी और अन्य परिवारजन भी वहीं जाकर उसी धरती पर अनाज का दान करे जहां उसके अन्य परिवारजनों ने किया तो आप समझ सकते हैं कि वह अनाज क्या उगा पायेगा? वह अनाज कदापि नहीं उगेगा और वहीं सड़-गल जायेगा।) इसी प्रकार जहां पहले से दानवीरों ने दान की भरपाई कर रखी है जहां अपार धन सम्पदा है जो वर्षो तक खर्च करे तब भी खर्च होने का नाम नहीं लेगी। वहां दान करने से लाभ होगा या वहां लाभ समय की मांग के अनुसार उस देशकाल स्थान में काम हो रहा है। देखने सुनने में आया है जहां अत्यधिक दान की बढ़ोतरी हुई वहां पर उसका दुरूपयोग होने लगा वहां के कार्यकर्ता भोग-विलास में लिप्त होने लगे है।
यदि दान देना है तो सोच समझ कर दिया जाना चाहिये। आज दान से करोड़ो रुपये सन्तों के प्रवचनों पर खर्च होते हैं। सन्त लोग बड़ी मेहनत करके शिक्षाप्रद बाते बताते हैं। अब समझना यह है कि जो सन्त प्रवचन दे रहे हैं वे सन्त उस प्रवचनों के सही पात्र है या नहीं उनमें त्याग व तपस्या की शक्ति है या नहीं। मात्र थोथे प्रवचनों से कुछ भी बनना नहीं है क्योंकि यह हमारी दृष्टि से वैचारिक असन्तुलन हो गया यानि विचार तो हमने दे दिये परन्तु जिन्हें देने है और जो दे रहे है उन्हें पर्यावरण की जानकारी होनी जरूरी है।
वर्तमान में पर्यावरण की जानकारी तो हो ही साथ ही पर्यावरण शुद्धि करने की भी लालसा तन-मन-धन, मन-कर्म-वचन से होनी चाहिये। अभी समय की मांग है पर्यावरण की शुद्धि में दान दिया जाये। यह बात सत्य ही नहीं परन्तु कटु सत्य से ही सत्य है। वर्तमान में पेड़ पौधों व अन्य प्राणियों का धरती के अनुपात से जितनी संख्या होनी चाहिए उससे बहुत कम है दूसरी ओर मन्दिरों की संख्या बढ़ती जा रही है जहां ध्वनि प्रदूषण विस्तारक यन्त्र लगे हुवे हैं।
ऐसे समय में यदि दान देकर वास्तविक लाभ लेना है तो पर्यावरण की शुद्धि के प्रयास में दिया जाने वाला दान आज हजारों नहीं लाखों गुणा बढ़ोतरी करेगा। हमारे वचन ईश्वरीयकृत है जो प्रकृति शक्ति पीठ से कहे हैं। दान हमेशा जरूरतमन्द को देना चाहिये और जिसे दान दिया जाता है उसे उस दान से सन्तोष आ जाना चाहिये। दान सामथ्र्यनुसार देना चाहिये। आपने दान अपनी सामथ्यानुसार चाहे वह 25 पैसे ही हो दिये चाहे आपने एक हजार दस हजार या इससे भी अधिक।
हमारे कहने का मतलब है आप जितना भी दान करें वह मन-कर्म-वचन से होना चाहिये और दान लेने वालों के भाव भी मन-कर्म-वचन के होने चाहिये। ये नहीं कि आप पहले तो देना ही नहीं चाहते और फिर दे रहें तो अनमने मन से। अब जब दान दे ही रहे हैं तो मन से वचन से देना चाहिये और देने की प्रक्रिया को हम कर्म कहेंगे। दान लेने वालों के भाव भी मन-वचन-कर्म से साथ थे यानि उसके भाव मन से वचन से सन्तुष्टि के होने चाहिये। ये ही नहीं कि आपने उसे जो दिया है जैसे एक दो पांच या दस रुपये या इससे अधिक और लेने वाला कह रहा है नहीं साहब ये तो कम है आप इतने दे दो आदि आदि इतने दोगे तो आपका ईश्वर भला करेगा।
दान लेने वाले की संतुष्टि के भाव होने नितान्त ही आवश्यक है यदि दान लेने वाले के सन्तुष्टि के भाव नहीं है और आपने उसे करोड़ों रुपये दे दिये और उसे सन्तुष्टि नहंी हुई तो वह दान व फल नहीं देगा जो उस दान से मिलना चाहिये था। वैसे तो दान में सकाम भाव न हो तो वह बड़ा ही लाभकारी होता है परन्तु कोई भी कृत्य करने से पहले सकाम भाव तो पहले आ जाता है इसलिए निष्काम भाव के दानी तो बहुत ही कम ही होते है और उनके द्वारा दान दिया जाना, लेने वाले के प्रयोजन के कई गुना ज्यादा लाभ देता है तो देने वाले के प्रयोजन का पहुंचा हुवा परमहंस ही होता है।
सबसे अहम बात दान देते समय ध्यान रखने की यह है कि आपने ईश्वर कृत्य के लिए दान देने का संकल्प किया और सकाम भाव से और वह मनोरथ पूरा भी हो गया और आप संकलप किया गया दान नहीं देते तो आने वाले समय में बहुत बड़ा नुकसान का कारण बनेगा यदि आप संकल्प किया गया दान देना भूल जाते हो तो याद आने पर कुछ हिस्सा और जोड़कर क्षमा याचना के साथ दान दे दीजिये। ये आपका भाग्य का सूचक बनेगा।
कुछ लोग दान देने का संकल्प की तो डींग हांक देते है परन्तु बाद में उस पर अमल को क्या याद करना भी उचित नहीं समझते याद दिलाये जाने पर भी अनसुनी करते है अब ऐसे लोगों को आप देख लीजिये जीवन स्तर स्थिर होकर चलता है। दान मनुष्य को गति प्रदान करता है दान से मनुष्य को दूसरे के आशीर्वाद की शक्ति मिलती है और यही दान असंख्य प्राणियों के सुखी जीवन के लिए दिया जाता है तो दान देने वाले को उन सभी प्राणियों को शुभाशीर्वाद की शक्ति मिलती है।
आप अपने आस-पास के औषधालयों, स्कूलों, धर्मशालाओं आदि में दान दिया जाने वालों की सूची को देखिये और फिर उनके परिवार जनों की जानकारी लीजिये वे लोग दूसरे लोगों की वनिस्पत ज्यादा जिन्दादिली और खुशी से जीवन व्यतीत करते नजर आयेगें। अतः हम चाहते है कि आप जो भी दान देवे व प्राणियों की सुख-सुविधा के लिए दान होना चाहिये।
दान देने का संकल्प करके कभी पीछे नहीं हटिये यदि आपने दान दे दिया तो आप उस दान के लिए शंक समाधान करने लग गये या किसी दुष्ट के कहने से शंकर करने लग गये तो वह आपको नुकसान देगा। आपको चाहिये दान देने के बाद किसी भी अन्य को दान के देने के बारे में मत बताईये आप खुद ही मन में विचार कीजिये कि हमारे द्वारा दिया जाने वाला दान कौन-कौन से कार्यो में खर्च होगा अब वह धन जितने अच्छे कामों में खर्च होगा उतना ही आपको अच्च्छा फल मिलता रहेगा या यह समझिये कि किसी ने एक या कई पेड़ उगा रखा है/रखें है और अब वह उनकी सार-सम्भार करने में असमर्थ है और आपने ऐसे समय में उन पेड़ों को पानी सुरक्षा आदि करने में धन खर्च दान स्वरूप कर दिया तो अब आप निश्चित मानो कि उन पेड़ों का विकास जारी रहेगा ओर साथ आपके दिये गये दान का प्रतिफल विकास भी जारी रहेगा। अतः हमारा कहने का मतलब मात्र इतना ही है कि दान का महत्व गूढ और प्रभावशाली है दान आपके जीवन के कष्टों को मिटाकर सुख वैभव प्रदान करता है और जो दान पर्यावरण की रक्षा के लिए दिया जाता है वह दान बेशकीमती होता है।
अब एक गूढ रहस्य और जो है वह भी हम बता देते हैं कि देवाल्यों में जो पशु वध होते हैं वह दान की श्रेणी में नहीं आयेगा इसको आप अनिष्ठ सूचक ही मानो परनतु यह जो पशुवध होते है उसका जो विरोध करते है उन्होंने दया का दान किया उन्होंने पर्यावरण की रक्षा के लिए समय और विचारों का दान किया ऐसा दान जिन्होंने किया है वे अन्ततः लाभान्वित ही होगें। ओर ऐसे दान आपको भी करते रहने चाहिये यह हिंसा को रोकने और अहिंसा को बढ़ाने के दान कहलाता है।
जो सुख, शान्ति वैभव ही प्रदान करता है। इस प्रकार अच्छेे कामों में दिया जाना वाले दान से सुख-शान्ति वैभव मिलता ही है परन्तु पर्यावरण की रक्षा में अहम भूमिका निभाने वाला गौ वंश है और गौ वंश की रक्षा में दिया जाने वाला दान महान दान है। साथ ही प्रकृति को सन्तुलित बनाने के लिए पेड़-पौधों आदि लगाने में पर्यावरण सुधार के कार्यो में जो दान दिया जाता है वह ब्रह्माण्ड का सर्वश्रेष्ठ दान है।
- प्रजापति

kejada express ank 21dinak 24-6-14
पाक्षिक खेजड़ा एक्सप्रेस -पाक्षिक खेजड़ा एक्सप्रेस ---पाक्षिक खेजड़ा एक्सप्रेस
दिनांक24-6-14 वर्ष 26 अंक 21
वार्षिक 36-रुपये-मूल्य - 1.50

पो. पजि. स. बीकानेर025/2012-14.
पर्यावरण, आध्यात्मिक एवं समसामयिक विचारों एवं स्वास्थ्य रक्षा विषयक धरती से जुड़ा विश्व का अग्रणी शास्त्र
पाक्षिक खेजड़ा एक्सप्रेस
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तुलसी पौध से स्वस्थ रहे-
- आर्य संस्कृति, माता-पिता- गुरु, प्रकृति
वनस्पति, तुलसी और पर्यावरण से जोड़ने का हमारा महायज्ञ सफलता की ओर अग्रसर है। आप आज ही शामिल होवे। -प्रजापति
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हमारा ध्येय ब्रह्माण्डिय पर्यावरण सुरक्षा व विश्व शान्ति
एवं प्राणियों की स्वास्थ्य रक्षा करनी ही है।
आप स्वस्थ रहेंगे तो धर्म-कर्म विद्यौपार्जन,धनोपार्जन
करेंगे। घर में तुलसी पौध लगाने से सुख-शान्ति मिलती है।
प्रकृति शक्ति पीठ, खेजड़ा एक्सप्रेस से तुलसी, पीपल
- पौध निःशुल्क ले जावें।

माननीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को खुला पत्र नं. 2
सेवामें,
माननीय
श्री नरेन्द्र मोदी
प्रधानमंत्री, भारत

विषय - कमजोर मानसून में भी अच्छी वर्षा हो जायेगी।

महोदय,
हमारी इस शोध का तो इतिहास बहुत लम्बा है। वेदों में भी यज्ञ द्वारा वर्षा होना बताया। गीता में भी यज्ञ से वर्षा होना बताया है।
आमजन समुदाय अग्नि में वनस्पति पदार्थों को घी, शक्कर के साथ मन्त्रों द्वारा आहुति देने को ही यज्ञ कहते है समझते है।
जबकि गूढ़ बात यह है कि - यज्ञ के प्रकार अनेक है - महिमा अपार है।
यज्ञ देश-काल-समय के अनुसार किया जाता है। कौनसा यज्ञ कौनसी सामग्री। कौनसे समय में कौन-कौन करेगा।
वर्तमान की परिस्थितियों में वृष्टि यज्ञ-मौसम विज्ञान के वैज्ञानिक करेंगे। उन्हें यज्ञ से पूर्व की तैयारी के सूत्र बतायेंगे। हमने पहले ही कह दिया कि अग्नि यज्ञ को ही यज्ञ नहीं कहा जाता है। अतः इस वृष्टि यज्ञ को हमारे वैज्ञानिक हमारे योग के एक सुत्र को समझते ही वैज्ञानिक पद्धति को अपने आप कमजोर मानसून में अच्छी वर्षा करने का रहस्य जान जायेंगे जो संसार के लिए अद्भुत होगा।
हम पुनः विनम्र प्रार्थना करते हैं कि इस यज्ञ को कराने के लिए हमारी वैज्ञानिकों से वार्ता करावे।
एक बात ओर इस यज्ञ में देश के किसी भी प्रकार का विशेष आर्थिक बोझ नहीं उठाना पड़ेगा।
नोट: हमारे शोध के अनय सूत्र संलग्न है। जांच करें।
विशेष: कृपया आप अपने अमूल्य समय में ‘प्रकृति शक्ति पीठ’ के दर्शन करने पधारने का कष्ट करें। यह क्षण आपके जीवन के अद्भुत विशेष क्षण होंगे। ओम शान्ति भगवान प्रजापति
प्रकृति शक्ति पीठ, बीकानेर
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गीतों से संगीत से वाहन दुर्घटनाओं की शोध की धज्जियां देखिये पुलिस थाना नयाशहर का चैराहा टैक्सी और चाय खोखों के टेपों आदि से कबुतर खाना
भारत वर्ष में वास्तविक वैदिक योग की जानकारी के लोगों को सहयोग नहीं मिलता। जबकि योग के क ख की भी जानकारी नहीं रखने वाले आडम्बरी तथाकथित योगी जनों को सरकार पूरा-पूरा सहयोग करती है।
देखिये! हमने एक सुत्र गीतों और संगीत से वाहन दुर्घटनाएं की खोज 20 अप्रैल 2008 में की और यहां के पुलिस अधीक्षक को लिखा तथा उनकी मार्फत सरकार को भेजने का पत्र भी दिया कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई। जबकि 2011 में अमेरिका ने स्वीकारा की गीतों और संगीत से वाहन दुर्घटना होती है। (23 अप्रैल 2008 पुलिस अधीक्षक, बीकानेर कार्यालय की प्राप्ति रसीद हमारे कार्यालय में आकर देख सकते हैं)
दिनांक 20 अप्रैल 2008 को माँ प्रकृति की असीम अनुकम्पा से खेजड़ा के कर्मस्थल, कार्यालय, खचाखच भरे प्रकृति शक्ति पीठ में लम्बे समय से दुर्घटनाएं क्यों हो रही है इस शोध को उजागर भगवान प्रजापति ने किया था।
जिसमें प्रजापति ने कहा कि जैसे फुटपाथ पर पैदल चलता राहगीर, दुपहिया सवार सड़कर पर चलते है और जब वे दुकानों पर चलने वाले गानो या टैक्सी, कार, घरों आदि के गाने सुनते है तो गानों की धुन में उनके चित्रों में तल्लीन हो जाते है ओर दुर्घटना के चपेट में आ जाते है। टैक्सी जीप-कार ट्रक आदि को चालक अपने वाहनों में लगे टेप मोबाइल के गानों में तल्लीन हो जाते है ये लोग भीड़-भड़ाके में तो कुछ सावधान जरूर रहते है परन्तु जब इन्हें थोड़ी सी भी खुली सड़क मिलती है तो बस गानों की धुन में खो जाते है और दुर्धअना की चपेट में आ जाते है।
दुकानों व वाहनों के गाने ही नहीं बल्कि जब लोग मन्दिर-मस्जिद-गुरुद्वारा आदि में जाते है ओर वहां भी जो टेप बजते है उन्हें सुनते है और अपने वाहन में टेप न होने पर उस सुने हुवे टेप की धुन में खो जाते है। ये ही नहीं राष्ट्रीय मार्गो पर बड़े-बड़े होटल-ढाबे बने हुवे है वहां भी टेप बजते है वे उन गानों की धुन सुनते है और वाहन चलाते है ये वाहन का टेप सुनते है तो इनकी एकाग्रता पर प्रभाव पड़ता है।
इस प्रकार जब कोई टैक्सी कार आदि का सवार लगे हुवे टेप को सुनते-सुनते नीचे उतरता है ओर मार्ग के दूसरे किनारे जाता है तो वह उस गाने की धुन में खोया हुआ ही मार्ग को पार करता है।
इस प्रकार प्रजापति ने कहा कि आज वाहनों व दुकानों के स्पीकरों को तो तुरन्त प्रभाव से हटा लिये जावे यदि टेप रहेगेे तो जरुर बजायेगे। उन्हें धर्म के अनुसार आचरण करने के लिए स्पीकरों को न बजाने के लिए बाध्य करे। आप मानो या न मानो ये शोध दुर्घटनाओं को रोकने में पूर्णतः सक्षम होगी, खाली सुप्रीम कोर्ट सरकार पुलिस को उलाहना देने और खस्ता हालत सड़कों का बताने से कुछ नहीं होगा। - भगवान प्रजापति
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त्ंेीजतपलं ैूंलंउेमअंा ैंदही रू त्ैै ने थ्ंबमठववा पर सन्देश भेजा था का उत्तर
ब्रह्माण्डगुरु- भगवान-वनौषधीय चिकित्सक व अधिष्ठाता - -प्रकृति शक्ति पीठ - का सन्देश त्ंेीजतपलं ैूंलंउेमअंा ैंदही रू त्ैै - के सन्देश के उत्तर के साथ ---
त्ंेीजतपलं ैूंलंउेमअंा ैंदही रू त्ैै हिंदू शब्द वैदिक साहित्य में प्रयुक्त सिंधु का तदभव रूप है....... (पूरा सन्देश पेज 3 पर देखे) के सन्देश का उत्तर आपने जो सबूत दिए हैं-वह सब हमने अच्छी तरह से पढे हैं समझे है । आपसे भी आशा करते है कि आप हम जो उतर भेज रहें इन्हें अच्छी तरह से पढेगे ।
.आपने जो सबूत दिए हैं-वे ९९७ ईस्वी के बाद के अप्रमाणित पुस्तकों से हैं ।
.हमारे प्रमाणित ग्रंथआर्य संस्कृति- सनातन धर्म के धर्मग्रंथ चार वेद (ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद व अथर्ववेद) है तथा वेद प्रणीत चार उपवेद छः दर्शन शास्त्र, 11 उपनिशद व चार ब्राह्मण ग्रंथ व मनुस्मृति और संसार का सर्वोतम प्रमाणित मान्य ग्रंथ गीता है। १८ अप्रमाणित पुराणों भी हिन्दू शब्द नही है ।
वैदिक साहित्य में हिन्दू शब्द नहीं है ।
वैदिक साहित्य में हिन्दू शब्द का कहना होना बताना-
- वेदों का -वैदिक साहित्य का घोर आपमान है ।
चीनी यात्री हवेसांग ने भारतीयों के अच्छे व्यवहार और दूसरों का हित करने के विशेष गुण के कारण ही हितु कहा था न कि हिन्दू। हितू और हिन्दू में असमानता को आंका नहीं जा सकता।
हिन्दू शब्द -जब महमूद गजनवी ने भारत में २७ डाके डाले थे , प्रथम डाका ९९७ ईस्वी में डाला था , के बाद हिन्दू शब्द भारत में आया है । बाद में कई विदेशी मुसलमान, लुटेरों ने, आक्रमणकारियों ने भारत के आर्यों पर प्रहार किये । बाबर भी लुटेरा ही था बाद में भारत की दयनीय- कमजोर -पोल्पट्टी देखकर शासन करने का मन बना लिया था ।
-‘हिन्दू’ शब्द को विदेशी मुसलमान, लुटेरों ने, आक्रमणकारियों ने भारत के आर्यों को मुसलमान और हिन्दू बनाया। जिन आर्यों ने धर्म परिवर्तन कर लिया उन्हें मुसलमान बनाया (1. ये मुसलमान, भारतीय भु-भाग पर बहुसंख्या में है परन्तु इन्हें फारस के आक्रमणकारी व आज भी फारस के मूल मुसलमान इन्हें अपने से भिन्न समझते हैं। 2. जिन आर्यों ने धर्म परिवर्तन नहीं किया उन्हें हिन्दु यानी गुलाम बना दिया और कालान्तर में सदियों की गुलामी में मुगलों तक के सफर तक हिन्दू व हिन्दूस्तान बनाया जिन्हें आप गौरवमय बता रहे हो। यानी गुलाम व गुलामीस्तान) अतः विदेशी आक्रमणकारी मुसलमानी अधीनता के समय हिन्दू शब्द जबरदस्ती थोपा था। यह ऐतिहासिक सत्य है। अतः दोनों ही अपने-अपने धर्म में वापिस आ जावे क्योंकि अब किसी को भी जोर-जबरदस्ती नहीं है। अब हम स्वतन्त्र है।
महमूद गजनवी ने, प्रथम डाका ९९७ ईस्वी में डाला था , के बाद हस्तिनापुर के अंतिम वंशज पृथ्वी राज चैहान तक तो आर्यों की पहचान थी ।
आप कहते हो १००० वर्षों का हिन्दुओं का गौरवमय इतिहास है । जरा सोचो -यह हिन्दुओं का गौरवमय इतिहास है - या
आर्य संस्कृति- सनातन धर्म के रक्षकों -आर्यों का शर्मनाक सफर है ।
आप १००० वर्ष के हिन्दुओं के इतिहास को गौरवमय बताकर -सतयुग से चले आ रहे युगों- युगों के - आर्य - आर्य संस्कृति -सनातन धर्म-आर्यावर्त को हिन्दुओं के इतिहास के नीचे दबाने का प्रयास कर रहे हो - तो आप किस राममंदिर कि बात करते हो ।
किस रामजन्म भूमि पर आक्रमणकारी बाबर की मस्जिद बनी हुई है ।?
ऐसे ही आक्रमणकारियों के साथ फारस से हिदू शब्द भारत आया। ( जिसका अर्थ -गुलाम -चोर आदि है -जिसे आपने हिन्दू धर्म -हिन्दू संस्कृति बना दी है इसी के नीचे -सतयुग से चले आ रहे युगों युगों के - आर्य - आर्य संस्कृति -सनातन धर्म-आर्यावर्त को दबाने का आप प्रयास कर रहे हो । ऐसा घोर पाप अब हम नहीं होने देंगे । आपके साथ जो संत है वे अज्ञानी है -डरपोक है उनपर हिन्दू शब्द का प्रभाव जो है । परन्तु संसार में -आर्य - आर्य संस्कृति -सनातन धर्म-का ज्ञान रखने वालें संत भी है !-जो आप की कुटिल राजनीति को समझ रहें हैं। वे भारतियों को विश्व शांति के लिए आर्य रूप में- आर्यगुणों में देखना चाहते हैं ! (-क्योंकि - शब्द ही ब्रह्म है। शब्द से संस्कार बनते हैं। ये सनातन सत्य है !) सोचो - सोचो - सोचो !!! सत्य को
पहचानो ।
-विश्वामित्र, राम-लक्ष्मण को आर्य संस्कृति- सनातन धर्म की रक्षा के लिए ही ले गए थे! नानकदेव राम के वंशज है।
-चाणक्य -चन्द्रगुप्त -पृथ्वीराज चैहान आदि आदि ने आर्य संस्कृति- सनातन धर्म की रक्षा -की है !
सिख आर्य है -आर्यों -आर्य संस्कृति- सनातन धर्म की रक्षा के लिए ही सिख बने हैं ! जब गुलामी ही पसंद थी तो आजादी के लिए संघर्ष क्यों किया ?
आज हम शरीर से आजाद हैं
- हम शरीर से आजाद हैं ?-परन्तु संस्कृति से आज भी विदेशी (मुसलमानी और अंग्रेजी)
संस्कृति के गुलाम है ।इन्ही के जबरदस्ती थोपे हुवे नाम -हिन्द’, ‘हिन्दी’, ‘हिन्दू’ और ‘हिन्दुस्तान’-और इंडिया जैसे घ्रणित नामों के जाल में फसे हुवे है । विदेशियों द्वारा जबरदस्ती थोपे गए शब्द हमे प्यारे लगते हैं। इन शब्दों ने भारत के विकास को अवरुद्ध करके देश और संसार को अशांत किया है -क्योंकि -शब्द ही ब्रह्म हैं। शब्द से संस्कार बनते है । यह सनातन सत्य है। इस गूढ तत्व ज्ञान से आपको अन्धेरे में रखा है। आपके गुरुओं ने -
सोचो हम भारतीय दुनिया के लिए आशा की ज्योति हैं अगर हम आर्यों से सम्बंधित नहीं हैं तो हम किस राम के मंदिर की बात करते हैं,क्या राम आर्य नहीं थे ?
राम आर्य थे !राम और कृष्ण आर्य थे। गुरुनानक देव राम के वंशज है।
हमे गर्व से आर्य कहने में शर्म क्यों आती है?
जिस प्रकार बाबरी मस्जिद के नीचे राम जन्म भूमि दबी हुई है । -ठीक उसी प्रकार आपका आर्यत्व हिन्दुत्व के नीचे दबा हुवा है।
भारत का मूल स्वाभिमान आर्य संस्कृति- सनातन धर्म विदेशी धर्म संस्कृति-यानि विदेेशी आक्रमणकारी मुसलमानी और आक्रमणकारी अंग्रेजी धर्म संस्कृति के नीचे दबा हुवा है -इसे स्वतंत्र कराओ और -देखो राम का चमत्कार !
आप श्रेष्ठता का एक बार आत्म बोध कर के तो देखो - और देखो चमत्कार -
यदा यदा ही धर्मस्य....
हिन्दू होने - हिन्दू संस्कृति होने- हिन्दू धर्म होने- यानि मुसलमानी संस्कृति और अंग्रेजी संस्कृति और देश के हालत पर ग्लानी महसूस कर के तो देखो -आपका आर्यत्व अपने आप बाहर आ जायेगा।
यह सत्य है कि हमारी भाषा का नाम -संस्कृत -देवनागरी है !
-सत्युग युग से -त्रेता युग, त्रेता युग से -द्वापर युग -द्वापर युगसे -कलियुग के ९९७ ई. तक -संस्कृत -देवनागरी भाषा (उस समय तक हिंदी का तो अस्तित्व ही नहीं था )में ‘हिन्दू’ शब्द ही नहीं है तो हिन्दू धर्म कैसा ?
-नदियों के नाम से किसी समुदाय का नाम नहीं रखा जा सकता - यह ऐतिहासिक सत्य है हां प्राणियों के नाम तो रखे जा सकते है।
-लाला लाजपत राय ने अपने परिचय में - महर्षि दयानन्द के लाहौर 1898 के परिचय के बारे में कहा - हमारे व फारस के लेखकों के अनुसार कुछ लोग कहते है कि हिन्दू है जो कि सिन्धु का बिगड़ा हुआ नाम है लेकिन यह गलत है। परन्तु सिन्धु एक नदी का नाम है। किसी समुदाय का नाम नहीं है । यह सही है कि यह नाम असली आर्य जाति को दिया गया है जो कि इस क्षेत्र में मुस्लिम आक्रान्ताओं द्वारा अपमानित करने के लिए इस नाम से पुकारी जाती थी।
फारस में लेखक, हमारे लेखक कहते है इस षब्द का तात्पर्य ‘दास’ है और इस्लाम के अनुसार वो सारे लोग जिन्होंने इस्लाम को नहीं अपनाया था उनको दास बना दिया गया।
आगे ‘काला’ और ‘दास’ संकलन में फारसी और उर्दू भाषा के शब्द कोश यह वर्णन करते है कि यह अर्थहीन और घ्रणित ‘हिन्दू’ शब्द का अर्थ है--देखिये
( फारसी भाषा- उर्दू भाशा के शब्दकोश)-पढिए ल्युजत-ए-किषवारी, लखनऊ 1964में ‘हिन्दू’ शब्द का अर्थ है- --, चोर, डाकू, राहजन, गुलाम, दास।- उर्दू फिरोजउल लजत-प्रथम भाग पृ. 615,में- ‘हिन्दू’ शब्द का अर्थ है- - तुर्की में - चोर, राहजन, लूटेरा और फारसी में -गुलाम, दास, बारदा (आज्ञाकारी नौकर), शियाकाम (काला)- पेज 376 भार्गव शब्द कोश बारवां संकलन 1965 भी देखे)-
परसियन - पंजाबी (डिक्सनरी) शब्द कोश (पंजाबी यूनिवर्सिटी, पटियाला) में- ‘हिन्दू’ शब्द का अर्थ है- .भारतीय उपमहाद्वीप के निवासी, डाकू, राहजन, चोर, दास, काला, आलसी। --
जबकि आर्य का अर्थ है-- श्रेष्ठ !
अब भी आप हिन्दू देश बनाने -हिन्दू धर्म पर आडिग हो तो ये मुसलमानी देश होगा । मुसलमानी धर्म होगा क्योंकि ‘हिन्दू’ शब्द मुसलमानी ही है । आप कहते हैं कि स को ह बोलते थे। तो सिकन्दर को हिकन्दर व सलीम को हलीम हुसैन को हुहैन क्यांे नहीं बालते । सिन्ध प्रदेश को हिन्ध प्रदेश बोलना चाहिए था सिन्धु से हिन्धु बोलना था - हिन्दू क्यों?
शर्म करो स्वतन्त्रता के बाद भी गुलामी की संस्कृति का भार ढो रहे हैं।
हिंदी शब्द भी फारसी है- जिसे आप हिंदी कहते हैं ।
हिंदी शब्द कोश में -हिन्द-हिन्दी-हिन्दू-हिन्दुस्थान - ये सब फारसी नाम है !!!
-‘हिन्दू’ शब्द को विदेशी मुसलमान, लुटेरों ने , आक्रमणकारियों ने भारत के आर्यों पर सदियों की गुलामी के समय जबरदस्ती थोपा था।यह ऐतिहासिक सत्य है।
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आर्य संस्कृति -सनातन धर्म - आर्य समाज
स आर्य संस्कृति और सनातन धर्म (प्राणी धर्म) का सृजन त्रिगुणात्मक शक्ति (?) ओंकर ने सृष्टि रचना के समय ही की है। स आर्य संस्कृति सनातन धर्म प्रत्येक प्राणी को प्राकृतिक नियम से कार्य करने का अधिकार देता है। स आर्य संस्कृति व सनातन धर्म विश्व को अपना परिवार मानता हैं। स आर्य संस्कृति-सनातन धर्म सत्युग, त्रेतायुग, द्वापरयुग व कलियुग तक एक लम्बा विशालतम न समाप्त होने वाला सफर किया है। स आर्य समाज का गठन कलियुग में स्वामी दयानन्द सरस्वती ने किया है।
स आर्यसमाज के अनुयायी अपने को उच्च कोटि के आर्य समझते है और किसी की भी आलोचना करने में सक्षम है। स आर्यसमाज इस्लामिक धर्म के मूर्ति पूजा सुत्र के विरोध से प्रभावित हैं इसलिए आर्यसमाजी कभी भी किसी भी तीर्थ या मन्दिर की आलोचना करने में हिचकिचाते नहीं है। स्वामी दयानन्द सरस्वती ने राम के वंशज गुरूनानक देव की भी आलोचना की थी।
लेकिन स्वामी दयानन्द सरस्वती , उच्च कोटि के विद्वान, सन्त, देश भक्त, समाज सुधारक, भारतीय संस्कृति, आर्य संस्कृति व सनातन धर्म के अनुयायी व रक्षक थे। पोषक थे। स आर्य समाज के अनुयायी अपने श्रेष्ठता के अहंकार से प्रभावित होने के कारण सिमटता ही जा रहा है। स आर्य समाज सेे जो युवक-युवतियां भाग कर विवाह करती है वे विवाह होने तक ही सम्बन्ध रखते है। स आर्यसमाज की रिति-रिवाज से वास्तविक विवाह तो गिनती के ही हो रहे है। स उपरोक्त तथ्यों में यदि कहीं हमसे त्रुटि हो गई है, भूलवश भी ओर किसी के मन को अशानत किया है या अच्छा नहीं लगा है तो हम उनसे करबध क्षमा मांगते है और उनसे निवेदन करते है कि वे हमारा मार्गदर्शन करे क्योंकि वे श्रेष्ठ है स वे आर्य है। वे हमें क्षमा करेंगे।
गीता प्रेस, आरएसएस, भाजपा आदि ने तो विदेशी इस्लामिक आक्रान्ताओं के दिये हुवे नाम हिन्द, हिन्दू, हिन्दूधर्म और हिन्दू संस्कृति को बढ़ावा देने में एडी-चोटी का जोर लगाकर आर्य संस्कृति और सनातन धर्म को लुप्त करने की कोशिश की है ओर इनकी सहयोगी संस्थाओं ने तो विदेशी इस्लामिक आक्रान्ताओं के दिये हुवे नाम से संस्थाएं तक बना रखी है ओर तो ओर स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा गठित आर्य समाज भी इस्लामिक धर्म के मूर्ति पूजा के विरोध के सुत्र से प्रभावित है जबकि असल आर्यसंस्कृति में ऐसा नहीं है।
आज आर्य संस्कृति की बात करते है तो तुरन्त बोलते है आर्यसमाज के हो क्या, जो हमारे सनातन धर्म की देवी-देवताओं की, मूर्तियों की पूजा करने का विरोध करते है। अब उन्हें समझ लेना चाहिये कि आर्य संस्कृति तो सतयुग से चली आ रही है जिसका सृजनकर्ता त्रिगुणात्मक शक्ति ओंकार है। जबकि आर्यसमाज का गठन कलियुग में स्वामी दयानन्द सरस्वती ने किया है।

kkejada express ank 19-20 dinak 9-6-14
पाक्षिक खेजड़ा एक्सप्रेस -पाक्षिक खेजड़ा एक्सप्रेस ---पाक्षिक खेजड़ा एक्सप्रेस
दिनांक9-6-14 वर्ष 26 अंक 19-20
वार्षिक 36-रुपये-मूल्य - 1.50

पो. पजि. स. बीकानेर025/2012-14.
पर्यावरण, आध्यात्मिक एवं समसामयिक विचारों एवं स्वास्थ्य रक्षा विषयक धरती से जुड़ा विश्व का अग्रणी शास्त्र
पाक्षिक खेजड़ा एक्सप्रेस
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तुलसी पौध से स्वस्थ रहे-
- आर्य संस्कृति, माता-पिता- गुरु, प्रकृति
वनस्पति, तुलसी और पर्यावरण से जोड़ने का हमारा महायज्ञ सफलता की ओर अग्रसर है। आप आज ही शामिल होवे। -प्रजापति
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हमारा ध्येय ब्रह्माण्डिय पर्यावरण सुरक्षा व विश्व शान्ति
एवं प्राणियों की स्वास्थ्य रक्षा करनी ही है।
आप स्वस्थ रहेंगे तो धर्म-कर्म विद्यौपार्जन,धनोपार्जन
करेंगे। घर में तुलसी पौध लगाने से सुख-शान्ति मिलती है।
प्रकृति शक्ति पीठ, खेजड़ा एक्सप्रेस से तुलसी, पीपल
- पौध निःशुल्क ले जावें।

माननीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को खुला पत्र
सेवामें, महोदय श्री नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री, भारत
अत्रकुशलम् तत्राश्तु अपरच् आपने मुख्यमंत्री काल में हमें पत्र लिखे उनमें आपने चाणक्य का श्लोक भेजा था। एक दूसरे पत्र में आपने हमारी खोज ‘‘सत्य से सत्य की खोज’’ 6 अरब में.... के पत्र पर भी सकारात्मक प्रतिक्रिया व्यक्त की थी। अतः हम आशा करते है कि आप चाणक्य के श्लोक का अनुशरण करेंगे तथा साथ ही चाणक्य ने आर्य संस्कृति सनातन धर्म की अक्षुणता का कार्य किया था। हमने भी ‘सत्य से सत्य की खोज’ में आर्य संस्कृति सनातन धर्म की अक्षुणता के बारे में गूढ़ तथ्य दिये है। अतः आपसे हमारी विनम्र प्रार्थना है कि आप अब पुनः ‘सत्य से सत्य की खोज’ को अपना बेशकीमती समय देकर पुनः पढ़ने की कृपा करेंगे। ओम शान्ति!
महोदय वैसे तो जटिल समस्याओं पर हम आपको पत्र भेजते रहेंगे परन्तु इस पत्र में अभी दो आवश्यक बातें भेज रहे हैं।
1. संविधान में साकारात्मक ऊर्जा व नकारात्मक ऊर्जा के शब्दों की खोज करने के लिए शब्द विशेषज्ञ योगीजनों का चयन करके उनकी समिति का गठन किया जावे।
2. 60 वर्ष के ऊपर के बुजुर्गो को कर्ज दिलाया जावे। जिनके पास अपनी खेती व रिहायशी सम्पति है। वर्तमान में बैंक 60 वर्ष के ऊपर के महानुभावों को कर्ज तो देती है पर उनका बिचैलिया पुत्र या पुत्री होती है। जबकि वर्तमान में पुत्र-पुत्रियां बुजुर्गों से दूरी बनाये रखती है या दूर रहती है या है ही नहीं आदि-आदि ऐसे बुजुर्गों का क्या अपराध है जो बैंक कर्ज नहीं देती, रही बात मर जाने की तो 25 वर्ष का भी कर्ज लेकर मर जाता है उसका कर्ज बैंक उनकी सम्पति से ही तो वसूल करती है फिर 60 वर्ष के ऊपर के लोगों के पास अपनी सष्म्पति होने पर भी भरण-पोषण की सुविधा के लिए बैंक कर्ज क्यों नहीं देती?
कृपया गम्भीरता से चिन्तन-मनन करके हमारे पत्र को सकारात्मक सोच की प्रतिक्रिया में शामिल करने की कृपा करें।
ओम शान्ति
भगवान प्रजापति
प्रकृति शक्ति पीठ, बीकानेर
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ईश्वर की अद्भुत कृपा ! आश्चर्यचकित चमत्कार !!
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आयुष्मति सुश्री दया प्रजापति का शुभ विवाह आयुष्मान् डेनिन्द्र प्रताप के साथ सभी देवी-देवताओं की साक्षात् उपस्थिति में सम्पन्न हुआ।
आपको उपरोक्त टिप्पणी अजीब तो लगती है पर यह सत्य है कि सुश्री दया प्रजापति की जब चि. डेनिन्द्र प्रताप से सगाई की बात हुई। उस दिन वर्षा हुई। जिस दिन सगाई हुई उस दिन वर्षा हुई। जिस दिन विवाह की निश्चित तारीख का दिन तय हुवा। वर्षा हुई। जिस दिन पीले चावल करवाये। वर्षा हुई। जिस दिन कूकू पत्रिका छपकर आई। वर्षा हुई। जिस दिन हाथकाम लिया वर्षा हुई।
ये ही नहीं सुश्री दया के विवाह की तैयारी में जो भी कार्य किया उन सभी विशेष कार्यों में वर्षा हुई। चाहे वह घर में निर्माण कार्य हो या विशेष जगह पीले चावल देने गये जैसे बीठनोक ननिहाल (सुश्री दया के पिता का ननिहाल) या गांव ढाणी गये तो वर्षा हुई।
इतना ही नहीं जब दुल्हा बारात लेकर घर पहुंचा तो वर्षा हुई। विवाह के समय वर्षा हुई तथा विदाई के समय भी वर्षा हुई। ओर तो ओर मेहंदी की रात जब संगीत कार्यक्रम चल रहा था तो रात को जोरदार बिजली गर्जना के साथ चमकी ऐसी तेज आवाज शायद ही पहले सुनी हो। हाँ जब बिजली गिरती है तो जोरदार गर्जना होती है पर वह नीचे से ऊपर की ओर होते हुए कड़कती है। जबकि इस गर्जना में भय नहीं था शान्ति थी। इस प्रका सुश्री दया प्रजापति का विवाह चि. डेनिन्द्र प्रताप के साथ हंसी-खुशी सब देवी-देवताओं की उपस्थिति में सम्पन्न हुवा ही साथ ही विवाह का खर्च भी कई भाग्यशाली महानुभावों ने मिलकर किया।
सुश्री दयाप्रजापति के विवाह में अनेकानेक गणमान्य नागरिक, समाजसेवी, पत्रकार आदि उपस्थित हुवे। साथ ही नगर विधायक श्री गोपाल जोशी ने गोकुल जोशी के साथ आकर वर-वधु को आशीर्वाद दिया तथा कईयों ने पत्रों द्वारा शुभाशीष भेजे पूर्व मंत्री देवीसिंह भाटी ने भी आशीर्वाद पत्र द्वारा प्रेषित किया है।
अतः इस प्रकार सुश्री दया प्रजापति का विवाह चि. डेनिन्द्र प्रताप के साथ हंसी-खुशी से सभी देवी-देवताओं की उपस्थिति में सम्पन्न हुवा और इसमें कई विलक्षण ईश्वरीय चमत्कारी घटनाएं भी हुई है। ये सब माँ प्रकृति व पूज्य गुरुदेव की कृपा का ही फल है। ओम शान्ति
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पर्यावरण सुरक्षा पुलिस, पर्यावरण मन्त्रालय के अधीन पर्यावरण की सुरक्षा के लिए अलग से होना आवश्यक ही नहीं बल्कि अतिआवश्यक है। -प्रजापति
केन्द्र व राज्य सरकार के पर्यावरण मन्त्रालय पर्यावरण की सुरक्षा के लिए परम्परागत पुलिस के भरोसे ही पर्यावरण की सुरक्षा कराने की कोशिश कर रहे है। परम्परागत पुलिस के पास इतने कार्य है कि उनका ध्यान इस ओर जाता ही नहीं हैं। पेड़ कटकर आ रहे हो। गोचर अभ्यारण आदि पर कब्जे हो रहे हो। नदियों आदि में गन्दगी डाली जा रही हो। ध्यान नहीं देंगें ओर भलेही पुलिस थानों के पास पड़ोस में रात्रि 10 बजे बाद धार्मिक कृत्य के नाम से स्पीकर में तेज आवाज में अरड़ाते हो उसे रोकने में लापरवाह रहेगे या पाप हो जायेगा। सोच लेगे!
आवश्यकता उसे कहते है जो प्राणी हित में हो यानि कोई सभा, गोष्ठा प्राणियों के हित में हो रही है तो स्पीकर बजाने की उतनी ही छूट दी जावे जितने लोग पण्डाल में बैठे है और उनहें सुगमता से सुनाई दे जावे। पण्डाल के बाहर आवाज न जावे।
धार्मिक स्थलों के स्पीकरों पर पुर्णतः पाबन्दी लगे वे किसी भी तरह से न बजावे क्येांकि धार्मिक स्थल पर लोग शान्ति के लिए आते हैं और वहां के स्पीकर उनके दिमाग को दुषित किरणों से प्रभावित करके उन्हें अन्दर ही अन्दर अशान्त कर देते है।
स्पीकरों से दूषित किरणे निकलती है जो सुनने में भले ही मृदु लगे परन्तु दिमाग के कमजोर तन्तुओं को विचलित कर देती है। ऐसी हालातों में गर्भ में पल रहे बच्चे पर बहुत ही कुप्रभाव पड़ता है वह गर्भ से पुर्व ही दिमागी तौर से पागल, शारीरिक तौर से विकलांग होकर कमजोर पैदा हो जाते है और बड़ा होने पर वह और शोर के चंगुल में आता रहता है और अशान्त होता जाता है ऐसी हालातों में वह शान्ति चाहता है ओर शान्ति के लिए वह नशे की ओर अग्रसर हो जाता है। ये सत्य ही नहीं परम सत्य है इसे कोई वैज्ञानिक यदि झूठा साबित कर दे तो हम पर्यावरण के विषय में शोध करनी बन्द कर देगे तथा पर्यावरण का कार्य करना बन्द कर देगे ये प्रजापति का शोध है जो लोग इस विषय पर विश्व का पर्यावरण विद् आकर हमसे शास्त्रार्थ करे तो हम करने को तैयार हैं। ये ध्वनि प्रदूषण है जिसे शोर भी कहते है। शोर क्या नहीं कर सकता। जब सरकार अभी तक अपने बनाये कानून की पालना नहीं करा सकती तो क्यों आदेश देता है सुप्रीम कोर्ट?
यहाँ स्थानीय स्तर पर जब हमने थाने में जाकर इस बारे में राित्र 10 बजे के बाद स्पीकर बजने को बंद करने का और सुप्रीम कोर्ट के आदेश का हवाला दिया ओर पाक्षिक खेजड़ा में छपे 18-7-05 के फैसले का हवाला दिया तो कहने लगे वो रहा सुप्रीम कोर्ट जाओ उसके पास यहां तो हम ही सुप्रीम कोर्ट है नशे के आदि पुलिस वालों ने स्पीकर को इसलिए बन्द नहीं किया कि पाप लगेगा और हमारी अर्जी फाड़कर कुड़े के डिब्बे में फेंक दिया ओर हम वहां से प्रार्थना पत्र के टुकड़े-टुकड़े लेकर अपनी जान बचाकर भाग आये। ऐसी हालातों का कई बार हमने सामना किया है ओर हम इस निर्णय पर पहुंचे है कि पर्यावरण की सुरक्षा का मामला बहुत ही महत्त्वपूर्ण है इसके लिए अलग से सुरक्षा फोर्स बननी चाहिये जो पर्यावरण को नुकसान पहुंचाते है उन्हें रोकने को कठोर कदम उठावे। हालांकि ऐसे विभाग बने हुवे है परन्तु वे सक्रिय नहीं है उनके पास फोर्स नहीं है वे विभाग अनजान स्थिति में है वे सब अपने स्वहित के कार्य करते है, वे उद्योग धन्धों, होटलों आदि की लगाम कसने में ज्यादा रुचि लेते है क्योंकि वहां से उन्हें प्राप्त जो होना है इसीलिए सभी उद्योग धन्धे अपनी मनमानी करते है और खूब जमकर पर्यावरण की धज्जियां उड़ाते है। किसी भी कारखाने मंे पर्यावरण की सुरक्षा का ईमानदारी से ध्यान नहीं दिया है ये तो उस कारखाने के पास जाते ही पता लग जायेगा क्योंकि वहां उसके गन्दे कचरे के ढेर से लगे है।
ये रही कारखानों की बात तो इसी प्रकार अन्य कार्यो जैसे गोचर, अभयारण्य तालाब, नाडिये, आगौर, पेड़-पौधेे आदि को ले लेवे ओर जानकारी प्राप्त करना चाहे तो यहाँ भी इतनी घोर लापरवाही हो रही है कि कई तालाब, नाडिये, आगौर, गोचर, अभयारण्य, पेड़-पौधे प्रदूषकों की भेंट चढ़ गये है।
ओर तो ओर वन विभाग की भूमि के भी ये प्रदूषक निगलने को तत्पर रहते है।
एक ज्वलन्त उदाहरण जो अभी हमारे सामने है जिसका अभी कोई पूर्णतः समाधान नहीं हुवा है जिसकी भूमि भूमाफिया के गिरोह की नजर में आ चुकी है। वे हर हालात में इस भूमि को हड़पना चाहते है और आनन-फानन कोशिश में भी ये भूमि है बीकानेर के पूर्व में सागर गंाव के दो तालाबों की लगभग 27-28 मुरब्बा जमीन जो 1993 में जिला कलेक्टर ने इन तालाबों के आगौर व बीकानेर के जन्तुआलय के विकास, हमारे प्रयास से वन विभाग को सौंपी थी वनविभाग ने उसका कब्जा भी ले लिया। उस पर पेड़ भी लगा दिये इस भूमि पर न्यास पट्टे काटना चाहती थी अब देखिये क्या ऐसा सम्भव है कि वन विभाग की भूमि पर मकान बनाये जाये। ऐसा होेने लगा तो ऐसी बहुत सी जगह है जो वन विभाग की है ओर उस जमीन की कीमत बढ़ गई है लोग मकान बनाने के लिए करोड़ो रुपये देने को तैयार है। उसे भी बेच दी जाये। जिसमें बीकानेर का वन मण्डल कार्यालय, जन्तुआलय, तो है ही क्यों न पब्लिक पार्क को ही बेच दिया जावे ओर भी नगरो-महानगरेां के पार्को को बेच दिया जावे खूब धन आ जायेगा। धन ही सब कुछ नहीं है स्वास्थ्य कुछ नहीं तो जो चाहे करो स्वास्थ्य चाहते हो तो पर्यावरण की सुरक्षा जरुरी है।
अतः तुरन्त प्रभाव से पर्यावरण मन्त्रालय अपने आधीन छोटे विभागें को सार्वजनिक लाभ के लिए उस का विस्तार व सुरक्षा फोर्स बढ़ावे ओर पर्यावरण सुरक्षा के स्थानीय कार्यालय को क्रियाशील बनाकर जनता में उसे लोकप्रिय बनावे, स्थानीय लोगों की समितियों से कार्यालय को जोड़े, पर्यावरण सुरक्षा के कार्यालय की जिम्मेदारी होनी चाहिए कि आज तक जो भी कानून, अध्यादेश लागू हुवे है उन्हें वे पालन करावे ओर अवहेलना करने वालों पर कठोर कार्यवाही करे। ध्वनि प्रदूषण की रोकथाम सुगमता से हो सकती है और लाभ अत्यधिक होगा अतः वाहनों, व्यापारिक स्थलों के स्पीकर बजाने वालों पर कार्यवाही सख्त होवे। यदि नशे की प्रवृति को रोकना है तो ध्वनि प्रदूषण रोके।
- प्रजापति
रेलवे बाई पास से असंख्य-मूक-जीव-जन्तुओं पेड़-पौधों का विनाश होगा।
सदियों से रह रहे मूक-प्राणियों के घर-उजड़ेगे और वे दर-दर भटकेंगे, असंख्य प्राणी मृत्यु के ग्रास बनेंगे और पर्यावरण को भारी खतरा होगा- साथ ही बेवजह मेहनतकशों की गाढ़ी कमाई का अपार धन बाईपास में खर्च हो जायेगा। इस जघन्य पापकर्म का जिम्मेदार कौन होगा? बाईपास बनाने का शोर करने वाले जनता यानि की सरकार!!!
जनता तो नहीं होगी जिम्मेदार हाँ सरकार में कुछ प्रदूषण के अधीन लोग समर्थन कर सकते हैं।
जिन्हें पर्यावरण के फायदे से ज्यादा धन लाभ से प्रेम हैं।
लेकिन हम स्पष्ट कह सकते है पर्यावरण शुद्ध होगा तभी आपके विचार शुद्ध होंगे, आप स्वस्थ होंगे।
पर्यावरण दुषित होगा तो आपके विचार भी अशुद्ध होंगे और आप अस्वस्थ होंगे और जो धन संचय किया है वह धन भी आपको स्वस्थ नहीं रख पायेगा। यह प्रकृति का अटल सत्य है।
दो पुल बन चुके है। तीसरा निमार्णाधीन है। चैधा पुल बनते ही बाई पास की आवश्यकता कहां रह जायेगी।
पाँच देवों (पृथ्वी, आकाश, अग्नि, वायु, जल) की प्रसन्नता के लिए दिया जाने वाला दान सर्वश्रेष्ठ दान है पर्यावरण शुद्धि के कामों से पाँच देव प्रसन्न होते हैं। - प्रकृति शक्ति पीठ
दान के बारे में धर्मगुरुओं ने बहुत ही विस्तृत रूप से जानकारी दी है। अनेकानेक शास्त्रों में दान के बारे में लिखा हुवा है अनेक श्लोक, दोहे, कविताएं, कहानियां आदि दान के बारे में हमें पढ़ने को मिलती हैै।
अब हम भी दान के बारे में कुछ बताने जा रहे हैं जिसकी जानकारी से आप निश्चय ही लाभान्वित होगें। दान देना चाहिये ये आवश्यक ही नहीं अति आवश्यक है क्योंकि दान से विकास होता है। दान को देते समय दान लेने वाले पात्र स्थान, प्रयोजन समय आदि का विशेष ध्यान रखना होता है। दान में किसान धरती को अनाज देता है। जब दान जब धरती को दिया जाता है तो किसान को समय-स्थान-प्रयोजन का ध्यान रखना होता है। जब वह धरती को जिस अनाज का दान कर रहा है वह अनाज दोष मुक्त होना चाहिये। धरती भी दान लेने में सक्षम होनी चाहिये। धरती को अनाज देते समय-समय का भी ध्यान रखना होता है। यदि किसान जुलाई-अगस्त में कणक का दान करेगा तो वह निरर्थक जायेगा और अक्टुबर-नवम्बर में ग्वार-मोठ का धरती को दान करेगा तो वह निरर्थक जायेगा।
इसी प्रकार वह धरती जहां किसान अनाज का दान करता है वह उपयुक्त है या नहीं है वह दान पचा सकेगी या नहीं ये सब बातें देश-काल समय के अनुसार परिवर्तित हो जाती है। अब दान के भावों का भी महत्व होता है। मन-कर्म-वचन का विशेष ध्यान रखना चाहिये। मन कर्म वचन का सन्तुलन बनाकर दिया गया दान निरर्थक नहीं जाता बशर्ते जिसको दान दिया जाने वाला दान मन-कर्म-वचन के पवित्र भाव किया जाता हैै तो निश्चय मानो दिया जाने वाला अनाज हजार गुणा फल देता है।
दान धार्मिक स्थलों के लिए भी दिया जाता है पारिवारिक अभावग्रस्तों के लिए भी दान दिया जाता है। अभावग्रस्त पड़ोसियों, मित्रों आदि को भी दान दिया जाता है। अभावग्रस्त धूमन्तु लोगों को भी दिया जाता है इस प्रकार दान, औषधालयों, धर्मशालाओं, स्कूलों आदि के अलावा कई संस्थाओं को दिया जाता है।
जहां भी दान दिया जा रहा है उसके लिए कुछ विशेष जरूरी बातें ध्यान रखनी जरूरी होती है क्योंकि सही जगह सही पात्र सही प्रयोजन के लिए दिया जाने वाला दान हजार गुणा बढ़ोतरी करता है। सबसे पहले जो दान प्राणियों के कल्याण के लिए दिया जाना चाहिये जहां अनेकानेक प्राणी उस किये गये दान से लाभान्वित होने चाहिये। ऐसे दान में प्राथमिकता उसे देनी चाहिये जो समय मांग कर रहा है।
आज समय की पहली मांग है पवित्र कृत्यों की। क्योकि वर्तमान में धार्मिक कृत्यों में आडम्बर की चकाचैंध बढ़ती जा रही है और इस चकाचैंध में दानवीर प्रभावित होकर खींचा चला जाता है और न चाहता हुआ भी आडम्बर की चकाचैंध में दान कर देता है जबकि वहां पहले से असंख्य दानवीरों के दान के ढेर पेड़ हुवे हैं।
उदाहरण (किसान जहां अनाज का दान करता है वहां वह दूसरे दिन भी करे और तीसरे दिन भी और अन्य परिवारजन भी वहीं जाकर उसी धरती पर अनाज का दान करे जहां उसके अन्य परिवारजनों ने किया तो आप समझ सकते हैं कि वह अनाज क्या उगा पायेगा? वह अनाज कदापि नहीं उगेगा और वहीं सड़-गल जायेगा।) इसी प्रकार जहां पहले से दानवीरों ने दान की भरपाई कर रखी है जहां अपार धन सम्पदा है जो वर्षो तक खर्च करे तब भी खर्च होने का नाम नहीं लेगी। वहां दान करने से लाभ होगा या वहां लाभ समय की मांग के अनुसार उस देशकाल स्थान में काम हो रहा है। देखने सुनने में आया है जहां अत्यधिक दान की बढ़ोतरी हुई वहां पर उसका दुरूपयोग होने लगा वहां के कार्यकर्ता भोग-विलास में लिप्त होने लगे है।
यदि दान देना है तो सोच समझ कर दिया जाना चाहिये। आज दान से करोड़ो रुपये सन्तों के प्रवचनों पर खर्च होते हैं। सन्त लोग बड़ी मेहनत करके शिक्षाप्रद बाते बताते हैं। अब समझना यह है कि जो सन्त प्रवचन दे रहे हैं वे सन्त उस प्रवचनों के सही पात्र है या नहीं उनमें त्याग व तपस्या की शक्ति है या नहीं। मात्र थोथे प्रवचनों से कुछ भी बनना नहीं है क्योंकि यह हमारी दृष्टि से वैचारिक असन्तुलन हो गया यानि विचार तो हमने दे दिये परन्तु जिन्हें देने है और जो दे रहे है उन्हें पर्यावरण की जानकारी होनी जरूरी है।
वर्तमान में पर्यावरण की जानकारी तो हो ही साथ ही पर्यावरण शुद्धि करने की भी लालसा तन-मन-धन, मन-कर्म-वचन से होनी चाहिये। अभी समय की मांग है पर्यावरण की शुद्धि में दान दिया जाये। यह बात सत्य ही नहीं परन्तु कटु सत्य से ही सत्य है। वर्तमान में पेड़ पौधों व अन्य प्राणियों का धरती के अनुपात से जितनी संख्या होनी चाहिए उससे बहुत कम है दूसरी ओर मन्दिरों की संख्या बढ़ती जा रही है जहां ध्वनि प्रदूषण विस्तारक यन्त्र लगे हुवे हैं।
ऐसे समय में यदि दान देकर वास्तविक लाभ लेना है तो पर्यावरण की शुद्धि के प्रयास में दिया जाने वाला दान आज हजारों नहीं लाखों गुणा बढ़ोतरी करेगा। हमारे वचन ईश्वरीयकृत है जो प्रकृति शक्ति पीठ से कहे हैं। दान हमेशा जरूरतमन्द को देना चाहिये और जिसे दान दिया जाता है उसे उस दान से सन्तोष आ जाना चाहिये। दान सामथ्र्यनुसार देना चाहिये। आपने दान अपनी सामथ्यानुसार चाहे वह 25 पैसे ही हो दिये चाहे आपने एक हजार दस हजार या इससे भी अधिक।
हमारे कहने का मतलब है आप जितना भी दान करें वह मन-कर्म-वचन से होना चाहिये और दान लेने वालों के भाव भी मन-कर्म-वचन के होने चाहिये। ये नहीं कि आप पहले तो देना ही नहीं चाहते और फिर दे रहें तो अनमने मन से। अब जब दान दे ही रहे हैं तो मन से वचन से देना चाहिये और देने की प्रक्रिया को हम कर्म कहेंगे। दान लेने वालों के भाव भी मन-वचन-कर्म से साथ थे यानि उसके भाव मन से वचन से सन्तुष्टि के होने चाहिये। ये ही नहीं कि आपने उसे जो दिया है जैसे एक दो पांच या दस रुपये या इससे अधिक और लेने वाला कह रहा है नहीं साहब ये तो कम है आप इतने दे दो आदि आदि इतने दोगे तो आपका ईश्वर भला करेगा।
दान लेने वाले की संतुष्टि के भाव होने नितान्त ही आवश्यक है यदि दान लेने वाले के सन्तुष्टि के भाव नहीं है और आपने उसे करोड़ों रुपये दे दिये और उसे सन्तुष्टि नहंी हुई तो वह दान व फल नहीं देगा जो उस दान से मिलना चाहिये था। वैसे तो दान में सकाम भाव न हो तो वह बड़ा ही लाभकारी होता है परन्तु कोई भी कृत्य करने से पहले सकाम भाव तो पहले आ जाता है इसलिए निष्काम भाव के दानी तो बहुत ही कम ही होते है और उनके द्वारा दान दिया जाना, लेने वाले के प्रयोजन के कई गुना ज्यादा लाभ देता है तो देने वाले के प्रयोजन का पहुंचा हुवा परमहंस ही होता है।
सबसे अहम बात दान देते समय ध्यान रखने की यह है कि आपने ईश्वर कृत्य के लिए दान देने का संकल्प किया और सकाम भाव से और वह मनोरथ पूरा भी हो गया और आप संकलप किया गया दान नहीं देते तो आने वाले समय में बहुत बड़ा नुकसान का कारण बनेगा यदि आप संकल्प किया गया दान देना भूल जाते हो तो याद आने पर कुछ हिस्सा और जोड़कर क्षमा याचना के साथ दान दे दीजिये। ये आपका भाग्य का सूचक बनेगा।
कुछ लोग दान देने का संकल्प की तो डींग हांक देते है परन्तु बाद में उस पर अमल को क्या याद करना भी उचित नहीं समझते याद दिलाये जाने पर भी अनसुनी करते है अब ऐसे लोगों को आप देख लीजिये जीवन स्तर स्थिर होकर चलता है। दान मनुष्य को गति प्रदान करता है दान से मनुष्य को दूसरे के आशीर्वाद की शक्ति मिलती है और यही दान असंख्य प्राणियों के सुखी जीवन के लिए दिया जाता है तो दान देने वाले को उन सभी प्राणियों को शुभाशीर्वाद की शक्ति मिलती है।
आप अपने आस-पास के औषधालयों, स्कूलों, धर्मशालाओं आदि में दान दिया जाने वालों की सूची को देखिये और फिर उनके परिवार जनों की जानकारी लीजिये वे लोग दूसरे लोगों की वनिस्पत ज्यादा जिन्दादिली और खुशी से जीवन व्यतीत करते नजर आयेगें। अतः हम चाहते है कि आप जो भी दान देवे व प्राणियों की सुख-सुविधा के लिए दान होना चाहिये।
दान देने का संकल्प करके कभी पीछे नहीं हटिये यदि आपने दान दे दिया तो आप उस दान के लिए शंक समाधान करने लग गये या किसी दुष्ट के कहने से शंकर करने लग गये तो वह आपको नुकसान देगा। आपको चाहिये दान देने के बाद किसी भी अन्य को दान के देने के बारे में मत बताईये आप खुद ही मन में विचार कीजिये कि हमारे द्वारा दिया जाने वाला दान कौन-कौन से कार्यो में खर्च होगा अब वह धन जितने अच्छे कामों में खर्च होगा उतना ही आपको अच्च्छा फल मिलता रहेगा या यह समझिये कि किसी ने एक या कई पेड़ उगा रखा है/रखें है और अब वह उनकी सार-सम्भार करने में असमर्थ है और आपने ऐसे समय में उन पेड़ों को पानी सुरक्षा आदि करने में धन खर्च दान स्वरूप कर दिया तो अब आप निश्चित मानो कि उन पेड़ों का विकास जारी रहेगा ओर साथ आपके दिये गये दान का प्रतिफल विकास भी जारी रहेगा। अतः हमारा कहने का मतलब मात्र इतना ही है कि दान का महत्व गूढ और प्रभावशाली है दान आपके जीवन के कष्टों को मिटाकर सुख वैभव प्रदान करता है और जो दान पर्यावरण की रक्षा के लिए दिया जाता है वह दान बेशकीमती होता है।
अब एक गूढ रहस्य और जो है वह भी हम बता देते हैं कि देवाल्यों में जो पशु वध होते हैं वह दान की श्रेणी में नहीं आयेगा इसको आप अनिष्ठ सूचक ही मानो परन्तु यह जो पशुवध होते है उसका जो विरोध करते है उन्होंने दया का दान किया उन्होंने पर्यावरण की रक्षा के लिए समय और विचारों का दान किया ऐसा दान जिन्होंने किया है वे अन्ततः लाभान्वित ही होगें। ओर ऐसे दान आपको भी करते रहने चाहिये यह हिंसा को रोकने और अहिंसा को बढ़ाने के दान कहलाता है।
जो सुख, शान्ति वैभव ही प्रदान करता है। इस प्रकार अच्छेे कामों में दिया जाना वाले दान से सुख-शान्ति वैभव मिलता ही है परन्तु पर्यावरण की रक्षा में अहम भूमिका निभाने वाला गौ वंश है और गौ वंश की रक्षा में दिया जाने वाला दान महान दान है। साथ ही प्रकृति को सन्तुलित बनाने के लिए पेड़-पौधों आदि लगाने में पर्यावरण सुधार के कार्यो में जो दान दिया जाता है वह ब्रह्माण्ड का सर्वश्रेष्ठ दान है।
- प्रजापति
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आर्य संस्कृति-सनातनधर्मेव जयते।
ब्रह्माण्डगुरु भगवान प्रजापति
अधिष्ठाता प्रकृति शक्ति पीठ
मो. 7737957772
। 
24-april 2014
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शुभ विवाह का सुमन्त्रण।।
सौ. कां. दया प्रजापति, सम्पादक, खेजड़ा एक्सप्रेस, प्रकृति शक्ति पीठ का शुभविवाह दिनांक 24 मई 2014 वार शनिवार गोधूली की शुभ बेला- प्रकृति
शक्ति पीठ में ईश्वर की असीम कृपा से सम्पन्न होगा।

सुश्री दया प्रजापति के अथक सहयोग से खेजड़ा एक्सप्रेस, प्रकृति शक्ति पीठ ने विलक्षण कार्य किये हैं जिसे हम साधनों के अभाव में संसार को सही रूप में नहीं बता सके! इसी कारण संसार को इन विलक्षण कार्यों का लाभ नहीं मिल सका है। इसके लिए हम क्षमा मांगते हैं। -भगवान प्रजापति
।। ò प्रजापतये नमः।। ।। ò प्रकृत्यै नमः।।
ò
।। श्री गणेशाय नमः।।
विघ्न हरण मंगल करण, गणनायक गणराज ।
रिद्धि सिद्धि सहित पधारज्यो, पूरण करज्यो काज ।।
शुभचिंतक गेधर एवं खेजड़ा एक्सप्रेस परिवार आपका हार्दिक स्वागत करता है।
मायरा
ज्येष्ठ बदी 11
24 मई 2014
शनिवार, सुबह 11 बजे
हाथकाम
ज्येष्ठ बदी 6
20 मई 2014
मंगलवार, सांय 5 बजे
महँदी, संगीत कार्यक्रम
ज्येष्ठ बदी 10
23 मई 2014
शुक्रवार, रात्रि 8 बजे
मायरा
ज्येष्ठ बदी 11
24 मई 2014
शनिवार, सुबह 11 बजे
स्वागतकर्ताः
खेजड़ा एक्सप्रेस संचालन समिति, प्रकृति शक्ति पीठ
ब्ीकानेर
प्रीतिभोज स्थल
नृसिंह भवन
बी.के. स्कूल, ईदगाह बारी रोड़, बीकानेर

पाणिग्रहण संस्कार
स्थल
प्रकृति शक्ति पीठ
बीकानेर
।। श्री गणेशाय नमः।। ।। ò प्रजापतये नमः।।
मंगलम् भगवान विष्णु मंगलम् गरूड ध्वज। मंगलम् पुण्डरीकाक्ष मंगलायतनो हरिः।।
परमपिता परमेश्वर की असीम अनुकम्पा से व पूज्य गुरुदेव श्री गोपाल भारती (श्रीधारा, त्रिवेणी) के शुभाशीष से
स्व. श्रीमती केशर देवी (बीठनोक) एवं स्व. श्री गणपतरामजी (नाथजी), कुम्हारों की ढाणी बड़ी, कानासर की सुपौत्री, भगवानाराम गेधर (ढाणी) की सुपुत्री
सौ. कां. दया प्रजापति
(सुपुत्री श्री भगवाना राम गेधर) चि. डेनिन्द्र प्रताप
(सुपौत्र श्री रतनाराम जी मानणिया एवं
सुपुत्र श्री भंवरलाल जी मानणिया
पटेलनगर, नागौर)
का पाणिग्रहण संस्कार
संवत् 2071 ज्येष्ठ बदी 11, शनिवार, 24 मार्च 2014 को पाक्षिक खेजड़ा एक्सप्रेस के कर्मस्थल व कार्यालय प्रकृति शक्ति पीठ की यज्ञशाला में गोधूलि की शुभ बेला में सम्पन्न होगा। आपसे सविनय प्रार्थना है कि सपरिवार पधारकर वर-वधू को शुभाशीष प्रदान कर हमें अनुगृहीत करें।
मायरेदार:
श्रीमती भंवरीदेवी-श्री हरिकिशन बिस्सा बाल मनुहार: जंवाई पक्षः
श्रीमती ज्योति - श्री अशोक संवाल
श्रीमती रेणु- श्री मनमोहन
श्रीमती शोभा - श्री महेश
आशीष, आयुषी, रिया
श्रीमती मंगनी देवी- श्री बद्रीनारायण
श्रीमती भगवती देवी - श्री नरेन्द्र कुमार
श्रीमती संजू देवी - श्री सत्यनारायण मधुर मुस्कान:
अभि कम्प्यूटर, इन्दु प्रिन्टर्स
हिमांशु, दिवांशु, राधिका, गौरव,
दीक्षा, चारुल
उत्तराकांक्षी: भगवानाराम गेधर (ढाणी) स्नेही भ्राता: ओमप्रकाश गेधर, मांगीलाल गेधर, विजयशंकर गेधर, सत्यनारायण पुरोहित, महावीर माहर, जयप्रकाश विश्नोई,
गिरधर जोशी, हरलाल जाखड़ा
प्रजापति घर, खेजड़ा एक्सप्रेस,
प्रकृति शक्ति पीठ, विश्वकर्मा गेट,
बीकानेर (राज.) मो. 7737957772 विशेष आग्रह
श्रीमति लक्ष्मी देवी (बुआ)
- स्व. श्री जेसाराम जी माहर (गजनेर) दर्शनाभिलाषी:
समस्त शुभचिन्तक
गेधर परिवारजन

चंहम ...3
माँ ! प्रकृति की असीम अनुकम्पा से एक ओर यज्ञ को तीव्र करने की कृपा!
वैशाख में पीपल, ज्येष्ठ में वट वृक्ष सीचने से पूण्य होता है तथा खेजड़ा (खेजड़ी), को सींचने से अथाह पूण्य होता है। पीपल के खेजड़े भी लगावे। पीपल के पेड़ जहां लगा सके लगावे। पीपल के पेड़ लगाते समय कंकड़ पुराना चुना, पुरानी ईटों के टुकड़ों को काम में लेवे। श्मसानों की भुमि पर पीपल के पेड़ लगवाये जायें, ताकि आने वाले समय में पीपल बड़े होने पर इनकी शाखाएं काटकर शवो का अन्तिम दाह संस्कार किया जा सके । दाह संस्कार में वर्षा व सर्दी में नीम व गर्मियों में बेरी की लकड़ी साथ में लेने से पूण्य लाभ होता हैं। श्मशानो की भूमि पर पीपल के पेड़ लगने से पर्यावरण को अत्यधिक लाभ होगा और अन्तिम दाह संस्कार के लिए वनों पर पेड़ कटाई का भार कम होगा ।
श्मशानांे की भूमि पर पेड़ लगावाने के लिए सरकार, स्वयंसेवी संस्थाओं, पर्यावरण प्रेमियों को आगे आकर राष्ट्रीय अभियान अविलम्ब छेड़ देना चाहिये । श्मशानो की भूमि व अन्य जगहांे पर लगने वाले पीपल के पेड़ पाक्षिक खेजड़ा एक्सप्रेस, प्रकृति शक्तिपीठ से निःशुल्क वितरण कर रहा हैं ।
साथ ही राष्ट्रीय मार्गों, उधानों, गोचरो अभयारण्यांे, तलाबों के आगौर आदि में उगे हुवे पेड़ो की सर्दियों में शाखाएं काटी जाये जिससे वनो पर कम दबाव पड़े।
ग्रामीण क्षेत्रो में वनांे में पेड़ो की तने सहित काटने की प्रथा को रोकने के लिए सभी पेड़ों की शाखाएं प्रतिवर्ष सर्दियों में काटने के लिए प्रोत्साहन देने के लिए सरकार, स्वयं सेवी, संस्थाआंे, पर्यावरण पे्रमियो को युद्ध स्तर पर अभियान शुरू अविलम्ब करना चाहिये। न्यास, नगर परिषद, पंचायत आदि संस्थाएं प्रति वर्ष पेड़ोे की शाखाए कटवाने का प्रबन्ध करें ओर लकडि़यों को सुनियिोजित करें।
उपयुक्त सभी कार्यो का पाक्षिक खेजड़ा, एक्सप्रेस, प्रकृति शक्तिपीठ तो वर्षों से कर रहा हैं। आप भी इस महायज्ञ में शामिल होकर पर्यावरण की सुरक्षा करने में भागीदार बने, सहयोग करे । - प्रजापति
माँ प्रकृति की असीम अनुकम्पा से आवाज हुई कि ‘‘वत्स यहां पीपल के पेड़ ऊगे हैं! ये यहां ही रहने को नहीं आये हैं! ये यहां से आगे जाकर सेवा करने को आये हैं! ये आवाज प्रायः आती है यदा कदा जब हम एकान्त में प्रकृति शक्ति पीठ में बैठे होते है।
‘‘मन ही मन विचार किया ‘‘मै इन्हे माँ कहां भेजू’’
इन पीपल के पेड़ांे को श्मशान भूमि पर लगाओ। सबको जगा दो ’’!
‘‘एक प्रकाश, एक आवाज और यज्ञ स्थल में एक दम से असीम शान्ति ’’
तुरन्त आंखो में चमक हुई, कानों के पर्दे खुले और एक विशाल भारत महाद्वीप का नक्शा दिमाग में तैरने लगा। श्मशान भूमि पर मुर्दो को जलते देखा , वनो की कटाई देखी , पेड़ों को लादकर गावों कस्बों, शहरों में जाते देखा , शमशानो में दाह संस्कार की लकड़ी के खर्च का हिसाब समझा ओर समझा कि इसी प्रकार वनो पर अन्तिम दाह संस्कार में लकड़ी कटती रहेगी ओर इसकी भरपाई की समुचित व्यवस्था नहीं की गई तो वनों की भूमि तो दाह संस्कार में काम आने वाले पेड़ों कि कटाई से ही वीरान हो जायेगी।
माँ ने सही समय पर सही दिशा निर्देश दिया है उसी के बारे में माँ प्रकृति की असीम अनुकम्पा से ये लिखा जा रहा हैं। कि आज जो श्मशान हैं वहाॅ खाली जगह हैं। अतः पीपल के पेड़ तुरत - फुरत लगा दिये जावे ।
श्मशानों की भुमि पर पीपल के पेड़ लगाने की मुहिम छोटे रूप में तो वर्षों से चल रही हैं । प्रायः कई श्मशानों में पीपल खेजड़ों आदि के पेड़ लगे हुवे हैं ।
पाक्षिक खेजड़ा एक्सप्रेस ने प्रकृति शक्तिपीठ से प्रतिवर्ष इन्ने - गिन्ने पीपल के पेड़ श्मशानों की भूमि पर लगने जाते हैं। अन इन पेड़ों की संख्या बढ़ रही है अभी तक हजारों पीपल के पेड़ निःशुल्क वितरित हो गये है। कुछ श्मसानों में भी लगे है।
ये पीपल के पेड़ कुछ ही वर्षो में बड़े हो जायेगें ओर बड़े होने पर इनकी शाखाए प्रतिवर्ष सर्दियों में पतझड़ से पूर्व ही काट ली जाये । साथ ही श्मशान भूमि के पास में, बाहर भी पेड़ लगाये जाये । ओर जो वर्तमान में बाहर आस - पास खड़े है उन पेड़ो की शाखाएं प्रतिवर्ष काटकर शमशान भूमि पर इकट्ठी कर ली जावे।
हमारा कहने का मतलब मात्र इतना ही है कि अन्तिम दाह संस्कार के लिए काम आने वाली लकडि़यों का वनों पर दबाव कम पड़े । वनो से कटकर आने वाली लकड़ी पूरे पेड़ की लकड़ी होती हैं। प्राय: पेड़ो को कत्ल करके लकड़ी लाई जाती हैं ये घोर पाप कर्म हैं ।
अतः आस - पास लगे हुवे पेड़ो की शाखाओ को काटने का प्रचार - प्रसार सरकार , स्वंय सेवी संस्थाओ पर्यावरण प्रेमियो कांे अबिलम्ब शुरू कर देना चाहिये ।
इस पुनीत महायज्ञ में हम जितना विलम्ब करेंगे हम हमारा व हमारी भावीपीढ़ी का अत्यधिक नुकसान करेंगे।
हम सभी जानते है कि पेड़ो की अन्धा-धुन्ध कटाई हो रही हैं । इससे पर्यावरण का सन्तुलन चरम सीमा तक बिगड़ गया हैं । ओर वर्षा तन्त्र विचलित हो गया हैं ।
प्राकृतिक आपदाओ में अकाल, अतिवृष्टि भूकम्प तुफान आदि का वर्चस्व बढ़ गया हैं।
नोट - प्रजापति की अकाल पर शोध पूरी हुवे दस वर्षो हो गये हैं ।
प्रजापति बार - बार लिख रहे हैं सरकार को लिखा, महामहिम को लिखा कि यदि हमारी शोध पर कार्य करें तो कमजोर मानसून में भी अच्छा वर्षा ली जा सकती हैं ।
प्रजापति का दावा हैं कि ये शोध अन्य कोई सरकार का चहेता सम्पन्न वैज्ञानिक करना चाहे तो कम से कम मौसम की जानकारी सही देने की पद्धति पहले खोजे ’’ फिर हमने जो 30 वर्ष के कठिन परिश्रम से शोध की हैं वह वैज्ञानिक भी अवश्य ही वर्षा तन्त्र के सुचारू की शोध कर लेगा।
प्रंसग याद आ गया तो हमने बीच में लिख दिया । हमारे लिखने का मतलब इतना ही हैं कि पर्यावरण की सूरक्षा के लिए हर सम्भव प्रयास किये जावे अन्यथा बहुत बड़ी विकट समस्याओं से प्राणी जगत को जूझना पड़ेगा ।
वैज्ञानिक कह रहे है पृथ्वी को बुखार आ गया
जरा सोचो, एक खुले मैदान में आग जल रही हैं ओर दूसरी ओर चारो ओर पेड़ो के बीच में आग जल रही है अब इस आग का प्रभाव कौनसे प्राणियो को कष्ट होगा । ये सोचने की बात हैं ।
यानि पेड़ांे की आत्यधिक कटाई से, ओद्योगिक व परमाणु भट्टियांे से, आयुद्ध परीक्षणों से, आतंकवादियो के बार - बार के बम्ब प्रहारो आदि से दिन - प्रतिदिन व पृथवी का तापमान बढ़ रहा हैं इन्हे रोकने के लिए राष्ट्रीय ही नहीं अन्त राष्ट्रीय स्तर में युद्ध स्तर पर कार्य किया जाना चाहिये ।
जिनमें पेड़ांे की कटाई करने वालों पर सख्त कार्यवाही यानि पेड़ो के कत्ल करने वालो को अंग-भंग, मृत्यु का दण्ड देने का प्रावधान रखेगे तभी ये पेड़ भक्षी पेड़ो का कत्ल करना बन्द करेगें तथा पेड़ भक्षियों को सरकार, अन्य स्वयं सेवी संस्थाओ, पर्यावरण प्रमियो को साथ लेकर इन्हे प्रतिवर्ष प्रत्येक पेड़ की शाखाऐ सर्दी में काटने के लिए पे्ररित करें।
ये अभियान विश्व व्यापी हो । आज से अब से कोई भी पेड़ नहीं काटे । बल्कि पेड़ांे की शाखाए कटे ताकि अगले वर्ष वे फिर से बढ़ जावे।
इसके लिए इस कार्य को दो भागों में करे। आधे पेड़ों की पहले वर्ष, आधे पेड़ांे की कटाई अगले वर्ष शाखाए काटी जावे ।
इसमें बागों में, मार्गो में, गोचरांे, अभयारण्यों, तलाबो आदि के सभी पेडांे को शामिल किया जावे । और सतर्कता ये ही बरती जावे की अब से कोई पेड़ कटेगा नहीं बस पेड़ लगाने को ही मुहिम शुरू होगी ओर हर खाली जगह में पेड़ लगवाने के लिए सरकार प्रचार - प्रसार करे ।
ये पेड़ों की शाखाओं की कटाई न्याय, नगर परिषद, पंचायते ठेके पर करके अपनी आमदनी भी बढा सकते हैं कोई वनो पर दबाव भी कम करेंगे।
नोट - हमारे पत्र में पहले पृष्ठ में मत्स्य पुराण का एक स्लोगन में साफ लिखा हैं । कि पेड़ लगाने से बड़ा कोई पुण्य है ही नहीं ।
जितने भी पूजा कार्य, दान कर्म, सेवा कार्य आदि हैं । उन सब में यदि श्रेष्ठ हैं तो पेड़-पौधे लगाना ही श्रेष्ठ से श्रेष्ठ कार्य है जो विकट से विकट परिस्थिति में भी व्यक्ति को ऊर्जा प्रदान करते रहते हैं। अतः पेड़-पौधो लगाने के लिए जो दान दिया जाता है वह सर्वश्रेष्ठ दान है। यदि कोई दान है तो संसार के संतगण बुद्धि वर्ग के महानुभाव बताये या हमारी (प्रजापति) बात को स्वीकार करते हुये प्रचारित करे।
उदाहरण आपके सामने हैं जो लोग यहां आते हैं और समझने की कोशीश करते हैं (आते तो बहुत है आकर पौधे ले जाते है ) लेकिन इस बारे में सोचे कि ऐसी विकट परिस्थितियो में यहां पेड़ पौधे उगकर निःशुल्क तुलसी -पीपल कैसे बंट रहे है तो समझ में आवे ।
यहां अर्थ का सहयोग देने वाले इन्ने - गिन्ने महानुभाव हैं जिनके नाम पाक्षिक खेजड़ा में प्रकाशित हो रहे है उनका सहयोग जो आता हैं वह बहुत ही कम हैं।
यहां उच्च कोटि के सन्त, महात्मा, महानुभाव आये उन्हे श्मशानिया वैराग हुवे, सहयोग देने का कहा फिर भूल गये। फिर भी यह कार्य निरन्तर अविचल , अविरल, सुचारू रूप से चल रहा हैं ओर अब पीपल भी तुलसी पौध की तरह भारी तादाद में निःशुल्क बांटने का अभियान शुरूकर दिया है। पहले प्रतिवर्ष लगभग 100 के आस - पास ही पीपल जाते थे अब ज्यादा वितरण करने शुरू किये हैं। आप इस महापुनीत, महायज्ञ में अभी से शामिल होईये ओर तन मन धन से सहयोग देकर भारत के प्रत्येक शमसान में पीपल के पेड़ भारी तादाद में लगाने का राष्ट्रीय स्तर के महापवित्र आन्दोलन को सफल बनाने में भागीदार बनें। ताकि आने वाले समय में प्रत्येक शव का संस्कार पीपल के पेड़ों की लकडि़यों से होने लगे। - प्रजापति

च्ंहम 10
प्रिय एवं प्रियतम मित्रों व मित्रों के प्रिय एवं प्रियतम मित्रों - ऊँ शान्ति- हम प्रार्थना करते हैं कि आपकी ईश्वर बुद्धि और कर्म उत्तम करे।
आपकी महर्षि दयानन्द सरस्वती व महामहिम लाला लाजपतराय के प्रति श्रद्धा है। उन महापुरुषों के सम्मान के लिए इसे पढि़ये - समझिये और विदेशी, इस्लामिक, मुसलमानी, हिन्दू संस्कृति की गुलामी से मुक्त होईये। शब्द की शक्ति पहचानिये। शब्द ही ब्रह्म है। शब्द से संस्कार बनते हैं शब्द हिन्दु का प्रभाव सर्वत्र फैल गया है। कृपया पुनः आर्य बनिये श्रेष्ठ बनिये और भ्रष्टाचार से मुक्त होईये। आर्य संस्कृति-सनातन धर्र्मेव जयते!
हिन्द-हिन्दी-हिन्दू और हिन्दूस्तान - ये सब फारसी नाम है।
प्रश्न: हिन्दू शब्द का अर्थ क्या है?
उत्तर: हिन्दू का अर्थ है लाजपत राय ने अपने परिचय में - महर्षि दयानन्द के लाहौर 1898 के परिचय के बारे में कहा: लेखक के अनुसार कुछ लोग कहते है कि हिन्दू है जो कि सिन्ध का बिगड़ा हुआ नाम है लेकिन यह गलत है। परन्तु सिन्धू एक नदी का नाम है। किसी समुदाय का नाम नहीं है । यह सही है कि यह नाम असली आर्यन जाति को दिया गया है जो कि इस क्षेत्र में मुस्लिम आक्रान्ताओं द्वारा अपमानित करने के लिए इस नाम से पुकारी जाती थी। फारस में लेखक हमारे लेखक कहते है इस शब्द का तात्पर्य ‘दास’ है और इस्लाम के अनुसार वो सारे लोग जिन्होंने इस्लाम को नहीं अपनाया था उनको दास बना दिया गया।
आगे ‘काला’ और ‘दास’ संकलन में फारसी और उर्दू भाषा के शब्द कोष यह वर्णन करते है कि यह अर्थहीन और घ्रणित ‘हिन्दू’ शब्द का अर्थ है- फारसी भाषा का शब्दकोष - ल्युजत-ए-किशवारी, लखनऊ 1964, चोर, डाकू, राहजन, गुलाम, दास। उर्दू फिरोजउल लजत-प्रथम भाग पृ. 615, तुर्की चोर, राहजन, लूटेरा: फारसी गुलाम, दास, बारदा (आज्ञाकारी नौकर), शियाकाम (काला) पेज 376 भार्गव शब्द कोष बारवां संकलन 1965 भी देखे)परसियन - पंजाबी (डिक्सनरी) शब्द कोश (पंजाबी यूनिवर्सिटी, पटियाला) भारतीय उपमहाद्वीप के निवासी, डाकू, राहजन, चोर, दास, काला, आलसी। (हिन्दुकुश - यानि भ्पदकन ज्ञपससमतए ैसंनहीजंतद्ध
फण् ॅींज पे उमंदपदह व िभ्पदकनण्
।देण्रू स्ंसं स्ंरचंज त्ंप म्क पद ीपे पदजतवकनबजपवद व िडंींतपेीप ैीतप क्ंलंदंदक ैंतेूंजप ।नत न्दां ज्ञंउ स्ंीवतम 1898 ेंपक रू. ैवउम चमवचसम ंबबवतकपदह जव जीम ंनजीवत ेंल जींज जीपे ूवतक भ्पदकन पे ं बवततनचज तिवउ ैीपदकीन इनज जीपे पे ूतवदह इमबंनेम ैीपदकन ूंे जीम दंउम व िजीम तपअमत ंदक दवज जीम दंउम व िजीम बवउउनदपजल उवतमवअमतए पज पे बवततमबज जींज जीपे दंउम ींे इममद हपअमद जव जीम वतपहपदंस ।तलंद तंबम व िजीम तमहपवद इल उनेसपउ पदअंकमते जव ीनउपसपजंजम जीमउण् प्द चमतेपंदए ेंल वनत ंनजीवतए जीम ूवतक उमंदे ेसंअम ंदक ंबबवतकपदह जव पेसंउए ंसस जीवेम ूीव कपक दवज मउइतंबम पेसंउ ूमतम जमतउमक ंे ेसंअमेण्
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च्मतेपंद कपबजपवदंतल . सनहीमज . म. ापेीूंतप सनबादवू 1964ण् बीवतम ;जीपमद्धि कंावव ;कंबवपजद्ध तंी्रंद ;ूंलसंलमतद्ध ंदक हनसंउ ;ेसंअमद्ध
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तुलसी पौध से स्वस्थ रहे-
ळववहसम में - छपेीनसा ज्नसंेप च्ंनकी ूपजंतंद लिखे क्लिक करें।
थ्ंबमइववा च्ंहम ज्ञीमरतं म्गचतमेे
- आर्य संस्कृति, माता-पिता- गुरु, प्रकृति
वनस्पति, तुलसी और पर्यावरण से जोड़ने का हमारा महायज्ञ सफलता की ओर अग्रसर है। आप आज ही शामिल होवे।
-प्रजापति
चंहम 10
आर्य बोलने व लिखने में शर्म आती है तो भारतीय या श्रेष्ठ लिखना, बोलना शुरु करो परन्तु हिन्दु-मुस्लिम का चैगा उतार फेंको क्योंकि यह विदेशी आक्रान्ताओं द्वारा भारतवर्ष के आर्यो को जबरदस्ती दिये हुवे नाम है - भगवान
गीता में श्री कृष्ण ने अर्जुन को कहा अनार्य मत बनो, आर्य बनो।
कुतस्त्व कश्मलमिदं विषमे समुपस्थित्।
अनार्यजुष्टमस्वग्यमकीर्तिकरमर्जुन।।2-2।। गीता
हे अर्जुन! तुम आर्य हो और अनार्यो की भाषा बोल रहे हो। यह तुम्हें शोभा नहीं देता आर्य तो विषम परिस्थितियों में भी अपने धर्म के लिए लड़ता है। यानि श्रेष्ठ पुरुषों का दायित्व बनता है कि वे अपने कर्तव्य का पालन करते हुवे चाहे कैसी भी परिस्थिति हो धर्म के लिए संघर्ष करता ही है।
तुम बोल रहे हो कि ये हमारे अपने है हमारे पुजनीय है, हमारे प्रिय है हमारे सम्बन्धी है। हे आर्य श्रेष्ठ ये लोग अभी बुराई का साथ दे रहे हैं ये अधर्म का साथ दे रहे हैं और अधर्म का साथ देने वाले अनार्यों की श्रेणी में आते हैं यानि एक तरह से ये अनार्य ही है ऐसे समझो। अनार्यों का कोई धर्म-कर्तव्य नहीं होता है। वे तो मात्र हिंसा, चोरी, अपहरण, हत्या आदि में ही लिप्त रहते है और ऐसे कर्म करने वालों का जो साथ देते है वे चाहे आर्य हो, धर्मी हो, अनार्य ही कहलायेंगे, अधर्मी कहलायेंगे ऐसे लोगों को मारना आर्यो का धर्म है।
जो आर्य ऐसा नहीं करते वे श्रेष्ठ नहीं है सकते, वे स्वर्ग के अधिकारी भी नहीं हो सकते और नहीं उनकी प्रतिष्ठा हो सकती।
विशेष - चोरी करने वाले चोर का साथ देता है और चोरी का सामान खरीदता है वही भी गुनहगार ही होता हैं अतः हे आर्यो, जागो, उठो और हिन्दु, मुस्लिम का चोगा उतार फेंको श्रेष्ठ बनो, आर्य बनो।

24-april 2014
 पाक्षिक खेजड़ा एक्सप्रेस -पाक्षिक खेजड़ा एक्सप्रेस ---पाक्षिक खेजड़ा एक्सप्रेस 
दिनांक:9-4-14 वर्ष 26 अंक 16
वार्षिक 36-रुपये-मूल्य - 1.50

पो. पजि. स. बीकानेर025/2012-14.
पर्यावरण, आध्यात्मिक एवं समसामयिक विचारों एवं स्वास्थ्य रक्षा विषयक धरती से जुड़ा विश्व का अग्रणी शास्त्र
पाक्षिक खेजड़ा एक्सप्रेस 
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तुलसी पौध से स्वस्थ रहे-
- आर्य संस्कृति, माता-पिता- गुरु, प्रकृति
वनस्पति, तुलसी और पर्यावरण से जोड़ने का हमारा महायज्ञ सफलता की ओर अग्रसर है। आप आज ही शामिल होवे। -प्रजापति
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हमारा ध्येय ब्रह्माण्डिय पर्यावरण सुरक्षा व विश्व शान्ति
एवं प्राणियों की स्वास्थ्य रक्षा करनी ही है।
आप स्वस्थ रहेंगे तो धर्म-कर्म विद्यौपार्जन,धनोपार्जन
करेंगे। घर में तुलसी पौध लगाने से सुख-शान्ति मिलती है।
प्रकृति शक्ति पीठ, खेजड़ा एक्सप्रेस से तुलसी, पीपल
- पौध निःशुल्क ले जावें।

!!! सुमंत्रण!!!
प्रकृति शक्ति पीठ से यज्ञ की ज्योति की महायात्रा का 
शुभारम्भ अतिशीघ्र होगा
हे महामानवों, विश्व शांति और प्राणियों के स्वास्थ्य लाभ की वसुधैव कुटुंबकम शांति महायज्ञ की महायात्रा प्रकृति शक्ति पीठ, खेजड़ा एक्सप्रेस, बीकानेर से दिनांक .... अतिशीघ्र वार........-अतिशीघ्र ....... समय- अतिशीघ्र को रवाना होकर नगर के विभिन्न मार्गों से चलते हुवे ग्रामों-महानगरों अनवरत चलेगी आप इस यज्ञ ज्योति में आहुति के साथ बुरे कर्मों को छोड़े - सत्कर्मों को बढ़ावें प्रकृति शक्ति पीठ का तुलसी पौध का प्रसाद लेवें। (उपरोक्त सभी जानकारियां फेस बुक पेज खेजड़ा एक्सप्रेस व इंटरनेट पर पूरी जानकारियों मिल जायेगी)
यज्ञ से समस्त प्रकार के असाध्य रोग नष्ट हो सकते है। जिस रोग का इलाज करना होता है - उस रोग के अनुसार हवन सामग्री-समिधा व मन्त्र है। इन सब से विशेष प्रक्रिया से हवन किया जाता है तो रोगी निश्चय ही स्वस्थ हो सकता है।
नोट: किसी भी प्रकार का भौतिक चढ़ावा-दान आदि यज्ञ ज्योति में न चढ़ावे। 
जैसे- क्षय रोग नाशक हवन प्रक्रिया - तुलसी के सूखे पत्ते, मण्डूक पर्णी, ब्रह्मी, शतावर, असगन्ध, विधारा, शालपर्णी मकोय, अडूसा, गुलाब के फूल, गोखरु, हरड़बड़ी गुल्ली सहित आवला, पुनर्नवा, गिलोय, गूगल, शक्कर घी, नीम व पीपल की समिधा यज्ञ के चारों ओर तुलसी पौधे होने चाहिये।
तुलसी पौध से स्वस्थ रहे-

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- आर्य संस्कृति, माता-पिता- गुरु, प्रकृति
वनस्पति, तुलसी और पर्यावरण से जोड़ने का हमारा महायज्ञ सफलता की ओर अग्रसर है। आप आज ही शामिल होवे। -प्रजापति
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रिहायशी जमीन का क्रय-विक्रय सरकार के ही अधीन हो बिचैलियो, काॅलोनी बनाने वालों के अधिकार निरस्त किये जावे - क्योंकि ये लोग गरीबों-किसानों-मुसीबत में फंसे लोगों की जमीनों को कौडि़यों के भाव खरीदकर अनाप-शनाप भावों से जमीनों को बेचते हैं।
- रिहायशी भूखण्डों के मालिकों को अधिकार मिले। नगर विकास न्यास जैसी संस्थाओं की मान्यता खत्म करके सीधे सरकार के नियन्त्रण में ही हो।
- बीकानेर नगर विकास न्यास की प्रदूषण तन्त्र-अनियमितता की तुरन्त प्रभाव से जांच करके दोषी कर्मचारियों पर सख्त कार्यवाही की जावे क्योंकि प्रायः प्रायः सभी जगह दबी जुबान में चर्चा है कि नगर विकास न्यास में यदि भुखण्ड को नियमित कराने या खरीदने की कीमत मान लो एक लाख रुपये है तो उसे पट्टा बनाने तक की प्रक्रिया में कम से कम एक लाख से ज्यादा ओर धन खर्च करना पड़ता है।
- आम जनता तो भागम भाग की जिन्दगी में चुल्हा चैकी के लिए ही परेशान रहते है वे बेचारे क्या शिकायत करें उन्हें तो अपने कार्य को कराने के लिए खुद शिकारी के अधीन रहकर कार्य करवाना पड़ता है।
- पत्रकार यदि इसलिए नहीं बोलते कि उन्हें सस्ते दामों में प्लाॅट आदि कई सुविधा दे दी व दे दी जाती है।
- छुट भैये नेताओं ने प्रायः प्रायः नगर विकास न्यास से भूखण्ड ले रखे है। कईयों ने कब्जे कर रखे। कई भूमाफियों है। ऐसे लोग नगर विकास न्यास के खिलाफ नहीं बोलते।
- हां ठेेकेदारों के आपसी झगड़े में न्यास द्वारा कराये जाने वाले कार्यों में घटिया सामग्री टूट फूट सड़कों नलियों आदि की खबरें तो छपती है उसका असर क्या पड़ता है ये तो सही जांच से पता चलेगा और सही जांच कौन करे?
- बड़े नेताओं को वैसे तो क्षेत्र में कार्य करने का समय नहीं मिलता ओर दूसरे में वे लोग भी कहीं-न-कहीं नगर विकास न्यास के सम्बन्धी है उन्होंने भी तो प्लाट ले ही रखे है उन प्लाटों पर परिवर्तन करने की प्रक्रिया न्यास से सम्बन्ध रखती है इसलिए वो भी इसमें हस्तक्षेप नहीं करते।
इसलिए जनता को सोचना है कि उन्हें प्लाॅट खरीदने के बाद शान्ति से रहने का अधिकार मिले तो सम्पति के अधिकार का कानून बने और न्यास जैसी संस्थाओं की मान्यता समाप्त कर स्वतन्त्रता के पूर्व जैसे राजाशाही पट्टे मिलते थे वैसे पट्टे मिले की आवाज उठानी चाहिये।
अन्यथा बीकानेर नगर विकास न्यास की प्रदूषणतन्त्र की अनियमितता को जनता को झेलना ही होगा जैसे कि 
उदाहरण स्वरूप दिनांक 1973 में जस्सूसर गेट बाहर प्लाॅट नं. 6 बोली पर खरीदा जाता है पहले बात तो बोली में भी श्री गणेश अधिकारों ने अपनी शक्ति का किया-खैर। मौके पर चैथाई रकम भर दी और भुखण्ड 3673 वर्ग फुट बताया। फिर सारी रकम भर दी। तत्पश्चात 227 वर्ग फुट क्षेत्रफल बढ़ जाने के नोटिस की रकम भी भर दी। इस सब प्रकरण में वर्षो लग गये। मौके पर 1981 में एक अधिकारी ने जांच की तो पता चला कि प्लाॅट 6 के पीछे प्लाॅट 5 है दोनों प्लाट की जमीन की लम्बाई 100 फुट है और बेच दी 110 यानि 5 नं. 80 ग 50 बेच दी और 6. नं. को 80 ग 60 बेच दी क्योंकि प्लाॅट 5 रिश्तेदार कर्मचारी से साठगांठ करके कब्जा व लीज लाईसेन्स ले लिया था और चार दीवार भी बना ली थी।
जबकि 6 नं. की खुली जमीन पर भूमाफियों की नजर पड़ने लगी 6 नं. की जमीन भी 3100 वर्ग के करीब रह गई।
री प्लान किया- रीप्लान की प्रक्रिया में वर्षो लग गये और फाइल का भी अता-पता नहीं रहा। री-प्लान हो गया बढ़े हुवे भूखण्ड की राशि भी निर्धारित हो गई परन्तु भुखण्ड मालिक को इसकी सूचना ही नहीं दी वर्षों चक्कर - पे चक्कर निकालते-निकालते न तो फाईल की नकल दी न ही री-प्लान का नक्शा फाईल में। भुखण्ड मालिक पर यह दबाव है कि तुमने 300 वर्ग फुट न्यास की जमीन को हड़फा है न्यास को भुखण्ड के रुपये तो लेने है नहीं बस भूखण्ड मालिक को परेशान करने के लिए बाॅल की तरह इधर से उधर परेशान करते करते आखिर दया करके भुखण्ड मालिक को 3900 वर्ग का ही पट्टा दिया- पहले प्लाॅट चतुर्भुज नहीं था री-प्लान के बाद चतुर्भुज हो गया यानि 84 ग 50 पट्टा दिया। 78 ग 50 शेष 6 फुट को अब 10 फुट बना दिया है कागजों में ओर पश्चिम की सड़क को 40 फीट थी वह अब रह गई लगभग 15 फुट बाकी सब जमीन को बेच दिया न्यास ने और आरोप है कि ये सब 6 ने किया है तो पीछे जो 5 नं. प्लाॅट है उसने भी तो कुछ किया ही होगा खांचा तो जरूर बनना चाहिये था। अब क्या इसकी जांच कोई दूसरे ग्रहों के अधिकारी करेंगे।
ऐसे कई लोग है जो इन सब परेशानियों से गुजर रहे है वे इतने परेशान है। दुःखी है। उनका आर्थिक, मानसिक, शारीरिक नुकसान हो रहा है प्लाॅट नं. 6 की तरह। उसकी कीमत की भरपाई कौन करेंगे? उन्हें कौन राहत देंगे?
क्या कोई इसका उत्तर देंगें?
इसीलिए कहते है कि पर्यावरण में प्रदूषण रूपी राक्षस भयानक हो गया है। नगर विकास न्यास में प्रदूषण तन्त्र अनियमितता रूपी राक्षस भयानक हो गया आईये इसे समाप्त करें।
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योगेश्वर भगवान श्री कृष्ण का खून खौल गया!
भगवान योगेश्वर श्री कृष्ण भगवान को जब बाल्यावस्था में पता चला कि नन्दबाबा व जसौदा माँ उसके जन्मदाता माता-पिता नहीं है। अपितु जन्मदाता माता-पिता तो वासुदेव व माँ देवकी है और वे कंश मामा की कैद में है। उनका खून खौल गया और बाल्यावस्था में ही अपने बड़े भाई बलराम के साथ मथुरा आकर कंश मामा का वध करके अपने जन्मदाता माता-पिता वसुदेव-देवकी को जेल से मुक्त करवाकर उन्हीं की सेवा में लगे रहे।
जब हमें पता लग गया है कि हिन्दु हम नहीं है हम आर्य है हमारा धर्म सनातन है और हमारी संस्कृति और स्वाभिमान हिन्दुत्व के आगोश में लुप्त हो रहा है तो हमें आर्यत्व ही अपनाना चाहिए। इसकी रक्षा करनी चाहिए।
भारत की मूल संस्कृति/आर्यावर्त का मूल स्वाभिमान
प्राचीन से अति प्राचीन है! सनातन धर्म है!! सनातन धर्म है!!!
सनातन धर्म यानि प्राणी धर्म को ईश्वर ने प्रगट होते ही रचना की। तत्पश्चात् वेदों की रचना की। यह खोज आर्यों के साथ द्रविड़ों ने भी की। कालान्तर में सभी मानवों ने वेदों की महत्ता स्वीकार करके अंगीकार किया।
ईश्वर ने प्राणियों को उत्पत्ति में मानव को श्रेष्ठ बना दिया। मानव विकास की गति/धूरी की ओर अग्रसर होता गया। कर्म नाम के अनुसार जातियों, उपजातियों में बंटता गया। अपने-अपने वर्चस्व की होड़ भी होने लगी, अधीन-पराधीन का भी वर्चस्व भी बढ़ने लगा।
इस प्रकार की प्रक्रिया के साथ-साथ मानव ने वेदों के ज्ञान विज्ञान से कई आविष्कार करके विकास को चरम सीमा तक पहुंचा, जिसमें पर्यावरण को भारी नुकसान पहुंचाया। प्रकृति का संतुलन बिगड़ा। प्रकृति ने करवट ली। सब कुछ स्वाहा। शहरी सभ्यता पूर्णतः समाप्त हुई। 
घुमक्कड़, आदिवासी, ग्रामीण बचे। पुनः विकास की धुरी का प्रारम्भ होना, वेदों की खोज, ज्ञान-विज्ञान का उत्थान। कर्म-नाम-के अनुसार जाति, उपजाति, वर्चस्व, अधीन-पराधीन का सफर। यह चक्र चलते चलते हम यहां तक आ पहुंचे हैं।
हम मानते है कि आज जो कुछ हो रहा है वह निश्चय ही बदल जायेगा। परन्तु जीवित मक्खी को तो निगला नहीं जा सकता।
हम पिछले 25 वर्षों से सनातन धर्म और हिन्दुत्व पर शोध कर रहे हैं।
जब शब्द कोषों में हिन्दू का अर्थ चोर-डाकू, लूटेरा, गुलाम आदि बताया है तो फिर हिन्दू धर्म कैसा?
सनातन धर्म में असीम शान्ति है और आओ हिन्दू, हिन्दी, हिन्दू और, हिन्दूस्थान का परित्याग करे।
शब्द से संस्कार बनते है शब्द हिन्दू से सभी चोर, डाकू, लूटेरे बन रहे हैं। वर्तमान ज्वलन्त उदाहरण है।
गायत्री मंत्र व अन्य मंत्रों के जाप से फल अच्छा ही आता है चाहे जप कर्ता को इसका अर्थ भले ही नहीं आवे।
इसी प्रकार हिन्दूत्व से भारत का मूल स्वाभीमान विलुप्त हो रहा है।
अतः भारत के स्वाभिमान को बचाने के लिए हमें सोच बदलनी होगी। यानि हमें ऊँ ब्रह्माण्ड ओंम शान्ति के व्यवस्था सोच परिवर्तन चेतना महायज्ञ का जन-जागृति अभियान तीव्र गति से चलाना होगा। भारत वर्ष का मूल स्वाभीमान बचाना होगा। इस महायज्ञ की सफलता से भारत विश्व की अग्रणी शक्ति बनेगा और विश्व में असीम सुख, शान्ति समृद्धि आयेगी। यह सत्य ही नहीं परम सत्य है और यही ईश्वर की इच्छा है।
        अधिष्ठाता      प्रकृति शक्ति पीठ
page -10
शब्द ही ब्रह्म है
शब्द ही ब्रह्म है। शब्द से संस्कार बनते हैं। गायत्री मंत्र का अर्थ भले ही न आवे जाप से लाभ ही होता है। सभी मंत्रों में अपार शक्ति है। कौन-कौनसा मंत्र कब और कैसे जपा जाये यह सद्गुरु, ज्ञानी, बता सकते हैं या प्रकृति शक्ति पीठ। 
अधिष्ठाता -
किसी पवित्र स्थल का निर्माण, सृजन करके विकास की गति देते हैं तथा वहां प्राणियों के कल्याण व ब्रह्माण्ड में शान्ति के लिए कार्य करते हैं। उस पवित्र स्थल के सृजनकर्ता को ही अधिष्ठाता कहा जाता है। 
मंत्र शक्ति -
जप-मंत्र-मानसिक जाप से, जीभ हिलाकर, होठ हिलाकर, धीमी आवाज में बुदबुदाकर, तेज आवाज में जाप कब और कैसे लाभ आदि की जानकारी जपकर्ता के उद्देश्य, परियोजन, शारीरिक क्षमता, स्थान आदि को मध्य नजर रखकर दी जाती है। जपकर्ता को सही जानकारी नहीं होने के कारण वह लक्ष्य से भटक जाता है और सही सफलता प्राप्त नहीं होती है। 
जीवात्मा को परमात्मा बनावे -
यदि शरीर बीमार है तो पाप कर्म के कारण है और जीवात्मा जो शरीर पापी है। रुग्णावस्था में है। उसकी जीवात्मा भी पापी है। अतः शरीर को स्वस्थ करना व जीवात्मा को परमात्मा बनाने के लिए प्रयास साथ-साथ एक जटिल प्रकिया से सम्भव है यह ईश्वर कृपा, सद्गुरु व प्रकृति शक्ति पीठ ही बता सकते हैं।
प्रकृति शक्ति पीठ
page 12 
Search of truth from the truth — 6 billions people! ! !
(All nations in the world are descended from the same race. How in the Bharat were the descendants of the Aryan Hindus?- Why or How Know..
Truth comes out from the dust and stones of the centuries.
(1)Our great warriors Guru Gobind Singh , Great Maratha Chhatrapati Shivaji and so many Raja-Maharajas ,have saved the Hindus it is the absolute fact, But those who were Hindu ? Where from they come in existence? What they were doing? Which language the word Hindu relates? What is the real literal meaning of Hindu?
(2) The fact is that the Dev-sur Aarayan were living on Bharteey soil .It was  Aryon ‘s empire, It is the Vedic Sanatan historical truths . What happened to the Aryans? Where have gone the Aryans? They have gone, from where they had come or they had been buried here? Or Hindus drove them?  On Bharteey soil the living peoples are not Aaryans  n related to “ Aryan culture”. The only a institution of Aaryasamaj, these people say themselves aaryans who have rejected the ritual system of traditional living persons who were called Hindu, they have bad comments over Descendants of Rama is revered Guru Nanak Dev Ji -
(3) It is a historical truth that foreigners, Islamic invaders attacked over Bharteey land, had converted  the Aryans, Dravidians in Muslim.
(4) It is also a historical fact that those Aryans who were weak and could not endure the torture of Islamic rulers accepted Islam and become Muslim but the warriors who accepted the rules, servant ship of Muslim rulers, became Hindu (slaves) , but did not convert religion.
(5) It is also true that when Muslims and the Islamic rulers also tried to force the Hindus to accept Islam, Our warriors Mahamanvon have saved our remaining Hindus. It means that if they did not protect Hindus and Bharat have to become in real meaning Hindustan. Our research is based on this Truth “Search of truth from the Truth” please read it, we are inviting all.
(6) –  - God is creator of Srishti (Cosmos), Ohm (God) is creator of Cosmos.Oldest form of eternal knowledge are Vedas and Sanatana Dharma, there is word ‘’ Hindu ‘’ is not found in such certified in scripture of Vedas.
(7) 4 - four Vedas - there is no where words ‘ Hindu ‘ is found.
1 – Rigveda, 2 – Yajurveda, 3 - Samaveda, 4 -Atharved
(8) 4 - four Upvedas—there is not words ‘ Hindus’
1 - Ayurveda 2 - Dnurved 3 - Gndharwved 4 - Arthved
(9) 6 - six Darshan (philosophy) Shastron –the words ‘ Hindu ‘ not found .
1 - Mimansha Darshan - Gemini 2 - Sankhya Darshan – Kapila Darshan
3 – Nyaay (justice) Darshan – Gautam Darshan 4 - Viseshik -Vad
5 - Patanjali Yoga Darshan — 6 – Vedanta Darshan — Vedavyas
 (10) 6 - six - Anga - the words ‘ Hindu ‘ not found. 
1 - Shiksha, 2 – Kalp, 3 –Vyakaran, 4 - Sirukt 5 –Chhand, 6 – Jyotis. 
(11) 4 - four Brahmin texts— the words ‘ Hindu ‘ not found
Aitareya Brahman, Brahman Satpath, Gopath Brahmin, Tanday Brahmin. 
(12) 103 - Upnishdon -only thirteen are reliable and important are eleven.  Two of rests are also important — the words ‘ Hindu ‘ is not found.
1 - Isopnishd 2 - Kenopnishad 3 - Kthopnishad 4 - Prashnopnishad 
5 - Mundkopnishd 6 - Atreyopnishd 7 - Mandukyopnishd 
8 - Chhandogyopnishd 9 - Tatiriyopnishd 10 - Vrihdopnishd 
11 - Matraayani  Akhyopnishad 12 - Shvetashvr 13 Koshitk 
(13) Gita - Manusmrti are considered valid Shastron (Text) - the words ‘ Hindu ‘ is not found.
Conti.....


आर्य संस्कृति-सनातनधर्मेव जयते।
ब्रह्माण्डगुरु भगवान प्रजापति
अधिष्ठाता प्रकृति शक्ति पीठ
मो. 7737957772 
देखे . http://bhagwanprajapati.webs.com/--
https://www.facebook.com/KhejaraExpress


संसार को एक नया शब्द !!!!
सप्रेम भेंट !
सुमंत्रण-सुमन्त्रण
ये शब्द -!
आमंत्रण -निमंत्रण के समान ही है !!-
पर इसमें( सुमंत्रण-सुमन्त्रण) सकारात्मक ऊर्जा अधिक है !
ॐ तत्सत
-ब्रह्मांडगुरु भगवान प्रजापति ,अधिष्ठाता प्रकृति शक्ति पीठ -बीकानेर -४
A new word to the world!!!!
A complimentary gift!
Sumntrn - Sumntrn words -!
Invitation - Invitation is the same!! -
On the (Sumntrn - Sumntrn) is more positive energy!
Ttst
- Brhmmandguru bhagwan prajapati, adhishthata prikriti shakti pith -
Bikaner -4-m-917737957772

 


24-march2014 पो. पजि. सं. बीकानेर/025/12-1124
दिनांक:24-3-14 वर्ष 26 अंक 15
वार्षिक 36-रुपये-मूल्य - 1.50
दिनांक: 24-03-2014, वर्ष 26 अंक 15
पो. पजि. स. बीकानेर025/2012-14
बीकानेर से प्रकाशित व प्रसारित भारत सरकार द्वारा रजिस्टर्ड सं. 5619488 .हमारा ध्येय प्राणियों की स्वास्थ्य रक्षा करनी ही है
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पर्यावरण, आध्यात्मिक एवं समसामयिक विचारों एवं स्वास्थ्य रक्षा विषयक धरती से जुड़ा विश्व का अग्रणी शास्त्र
पाक्षिक खेजड़ा एक्सप्रेस
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तुलसी पौध से स्वस्थ रहे-
- आर्य संस्कृति, माता-पिता- गुरु, प्रकृति
वनस्पति, तुलसी और पर्यावरण से जोड़ने का हमारा महायज्ञ सफलता की ओर अग्रसर है। आप आज ही शामिल होवे। -प्रजापति
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हमारा ध्येय ब्रह्माण्डिय पर्यावरण सुरक्षा व विश्व शान्ति
एवं प्राणियों की स्वास्थ्य रक्षा करनी ही है।
आप स्वस्थ रहेंगे तो धर्म-कर्म विद्यौपार्जन,धनोपार्जन
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प्रकृति शक्ति पीठ, खेजड़ा एक्सप्रेस से तुलसी, पीपल
- पौध निःशुल्क ले जावें।
(संयोजक - सुश्री दया प्रजापति lLL.m.net) (राष्ट्रपति अवार्ड से विभूषित)
सत्य से सत्य की खोज
क्रमांक:शानित+प्रेम=ऊर्जा--------संसार को एक नया शब्द सुमंत्रण सप्रेम भेंट
इसमें सकारात्मक ऊर्जा आमंत्रण -निमत्रण से अधिक है
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(संसार में सभी जातियों के वंशज उसी जाति के हैं। भारत में आर्यों के वंशज हिन्दू क्यों?कैसे?जानिये!)
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सेवामें, महोदय जी, संसार को सुसंस्कारित करने व नकारात्मक ऊर्जा के शब्दों पर प्रतिबन्ध लगाने की प्रक्रिया शुरु करें।



....सत्य -सदियों-धूल-पत्थरों से दबा रहकर भी बाहर आ जाता है।
.............................................................................
(1) पूज्य गुरू गोविन्द सिंह, पूज्य छत्रपति शिवाजी महान आदि कई राजा-महाराजाआ, महामानवों ने हिन्दूओं को बचाया यह परम सत्य है। परन्तु वो हिन्दू कौन थे? कहां से आये? क्या करते थे? हिन्दू शब्द किस भाषा का है? हिन्दू का शाब्दिक अर्थ क्या है?
(2) जबकि सत्य यह है कि भारतीय भू-भाग में तो देव-सुर आर्य रहते थे। आर्यो का साम्राज्य था। यह वैदिक सनातन, ऐतिहासिक सत्य हैं। उन आर्यों का क्या हुआ? वो आर्य कहां गये? वो जहां से आये वहां चले गये या यही मर खप गये? या हिन्दूओं ने उन्हें खदेड़ दिया? अब भारतीय भू-भाग पर ‘आर्य संस्कृति’ के आर्य नहीं है। बल्कि ‘आर्य समाज’ नाम की 179 वर्ष पुरानी एक संस्था है जिसके सदस्य स्वयंभू अहंकारी है जो अपने आप को आर्य कहते हैं परन्तु इस्लाम से प्रभावित है तथा हिन्दुत्व का काम करते हैं और जब चाहे तब आर्य संस्कृति-सनातन धर्म के तीर्थ स्थलों व पूजा - पद्धति की निन्दा कर देते है। राम के वंशज पूज्य गुरु नानक देवजी की भी निन्दा की है -
(3) यह भी ऐतिहासिक सत्य है कि विदेशी, इस्लामी, आक्रांताओं ने भारतीय भू-भाग के आर्यों को, द्रविड़ों को मुसलमान व हिन्दू बनाया।
(4) यह भी ऐतिहासिक सत्य है जो आर्य कमजोर थे। वे इस्लामी शासकों के अत्याचार सह नहीं सके और उन्होंने इस्लाम धर्म स्वीकार किया व मुसलमान बन गये। जो बहादूर शासक थे वे इस्लामी शासकों के हिन्दू बने, नौकर बने यानि गुलाम बने, परन्तु धर्म परिवर्तन नहीं किया।
(5) यह भी सत्य है कि बचे हुए हिन्दूओं को भी जब इस्लामी शासकों ने मुसलमान बनाने का जबरदस्ती प्रयास किया तो हमारे पूर्वज महामानवों ने हिन्दूओं को बचाया। यानि उस समय वे हिन्दूओं को नहीं बचाते तो आज सभी मुसलमान हो जाते और भारतवर्ष वास्तव में हिन्दुस्तान हो जाता। इसी पर आधारित है ये हमारा सत्य से सत्य की खोज का प्रार्थना पत्र है - कृपया इसे पढ़ने का तो अवश्य ही कष्ट करें।
(6) ॐ-ईश्वर रचित सृश्टि उत्पति से, ॐ-ईश्वर रचित -
सतयुग से सनातन के- ईष्वर रचित वेदों व सनातन धर्म के किसी भी प्रमाणित शास्त्र में ‘‘हिदू’’ शब्द नहीं है !
(7) ४ -चारों वेदों -में -नहीं है - शब्दहिन्दू’ !!
१-ऋग्वेद २-यजुर्वेद ३- सामवेद ४- अथर्ववेद
(8) ४-चारों उपवेदों -में -नहीं है -शब्द ‘हिन्दूू’
१- आयुर्वेद २- धनुर्वेद ३- गन्धर्ववेद ४-अर्थवेद
(9) ६ - छ: दर्षन शास्त्रों-में -नहीं है -शब्द ‘हिन्दू ’।
१-मीमांसा दर्षन - जैमिनी २-साख्य दर्षन - कपिल
३-न्याय दर्षन - गौतम ४-विषेशिक -वाद
५-योग दर्षन ---पतंजलि ६-वेदांत दर्षन ---वेदव्यास
(10) ६- छ -अंग में -में -नहीं है शब्द ‘हिन्दू’!
१- षिक्षा २- कल्प ३-व्याकरण ४- सिरुक्त ५-छंद ६-ज्योतिश
(11) ४- चार ब्राह्मण ग्रंथों में नहीं है -शब्दहिन्दू’-!!!
१ षतपथ ब्राह्मण २ऐतरेय ब्राह्मण ३ ताण्डय ब्राह्मण ४ गोपथ ब्राह्मण
(12) १०३- उपनिशदों में से- तेरह -का महत्त्व है पर ग्यारह ही ज्यादा महत्त्व रखते है।-बाकी के दो का भी विषेश स्थान है में -नहीं है -शब्द ‘हिन्दू ’-!!!
१-ईसोपनिशद २-केनोपनिशद ३- कठपनिशद ४-प्रष्नोपनिशद
५-मुण्डकोपनिशद ६-एतरेयोपनिशद ७- मांडूक्योपनिशद
८- छान्दोग्योपनिशद ९- तैतिरीयोपनिशद १०-वृहदोपनिशद
११-मैत्रायणी -आख्योपनिशद १२-ष्वेताष्वर १३ कोशीतकि
(13)गीता - मनुस्मृति को मान्य शास्त्रों में माना हैं -नहीं है -शब्दहिन्दू’!
(14) वाल्मीकी रामायण में नहीं है शब्द‘हिन्दू’!!!
(15) महाभारत - तुलसी -रामायण में नहीं है -शब्द ‘हिन्दू ’-!!!
(16) हमारी देव भाशा संस्कृत व देवनागरी में नहीं है -शब्द ‘हिन्दू ’!!!
(17) हम यदि पुराणों की बात भी करे तो उसमें भी हिन्दू शब्द नहीं है। परन्तु पुराणों में वैज्ञानिक रहस्य छुपा हुआ है उसको हमने समझा है।
(18) आप -हम साहित्य, पुस्तकें -उपन्यास -कहानिया में जो लिखेंगे वे आपके- हमारे विचार है - उसको सनातन धर्म आर्य-संस्कृति मान्यता नहीं देती । सही और गलत का फैसला तथाकथित हर किसी के लिखने से नहीं -अपितु हमारे मान्य वेद-उपनिशद् आदि षास्त्रों से होता है।
(19) वैसे आप लाला लाजपतराय से बड़े हो तो और बात है -उन्होंने भी १८९८ में कहा था कि -हिन्दू षब्द भारतीय आर्यों को इस्लामिक आक्रंताओ ने जबरदस्ती थोपा है । जिसका अर्थ -गुलाम -चोर आदि ही है ।
(20)हिन्दू षब्द -९९७ ईं में महमूद गजनवीने पहला डाका डाला था। गजनवी ने २७ डाकेभारत में डाले थे -के साथ व बाद के आक्रान्ताओ ने भारतीय भू -भाग के सनातन आर्यों को- जैनों -बोद्धो को गाजर -मूली की तरह काटा था और हिन्दू / गुलाम, मुसलमान बनाये। ये ही सत्य है ।
(21) सदियों वर्शों की इस्लामी गुलामी में हमारे पूर्वज अपनी पहचान भूल गए - फिर इंग्लिष गुलामी में रहते 2 तो सब कुछ-बदल गया, क्योंकि हिन्दू -मुस्लिम एक्ट अंग्रेजों ने जो बना दिया । इस प्रकार हिन्दू -शब्द हमारे गले में रह ही गया । लेकिन अब स्वतन्त्र है। हिन्दू -मुस्लिम एक्ट की जगह ‘आर्य एक्ट’ लिखा जावे।
(22) स्वतंत्रता के बाद किसी ने ‘- शब्द कोश व भारतीय संस्कृति को संभालने की कोषिष ही नहीं की - शब्द कोशों में साफ लिखा है कि -हिन्द -हिंदी -हिन्दू -हिन्दुस्थान आदि फारसी -शब्द है ।
शब्दकोषों में रामकृष्ण वर्मा 1950 के शब्द कोष के पेज 1193 । डाॅ. हरदेव बाहरी के शब्द संस्करण 2008 के पेज 878-879 देखे।
-
हिंदुस्तान -पुं ० [फा ० हिन्दोस्तान ]१.
भारतवर्ष ।२.दिल्ली से पटने तक का
भारत का उतरीय और मध्य भाग ।
हिन्दू -पुं ० [फा०] [भाव० हिन्दूपन ,हिंदुत्व ]
भारतीय आर्यों के वर्तमान भारतीय
वंशज जो वेदों ,स्मृति ,पुराण आदि को
अपने धर्म-ग्रन्थ मानते हैं |

(22) फारसी -उर्दू शब्द कोशों में हिन्दू का अर्थ बताया है -गुलाम -आज्ञाकारी नौकर-डाकू -चोर -राहजन आदि आदि।
(23)आगे ‘काला’ और ‘दास’ संकलन में फारसी और उर्दू भाशा के षब्द कोश यह वर्णन करते है । भारत के आर्यों को गुलाम व मुसलमान बना लिया। 1.फारसी भाशा का शब्द कोश - ल्युजत-ए-किषवारी, लखनऊ 1964 में चोर, डाकू, राहजन, गुलाम, दास। 2.उर्दू फिरोजउल लजत-प्रथम भाग पृ. 615, तुर्की में चोर, राहजन, लूटेरा, फारसी गुलाम, दास, बारदा (आज्ञाकारी नौकर),3. षियाकाम में (काला) 4. परसियन - पंजाबी (डिक्सनरी) षब्द कोष (पंजाबी यूनिवर्सिटी, पटियाला) में भारतीय उपमहाद्वीप के निवासी, डाकू, राहजन, चोर, दास, काला, आलसी। 5. पेज 376 भार्गव शब्द कोश बारवां संकलन 1965 भी देखे)
(24) हिन्दू न ही हमारा -शब्द है न ही हमारी जाति है न ही हमारा धर्म है । यह सत्य है।
(25) हमारा धर्म है -सनातन !-जो प्राचीन से प्राचीन है -जिससे बाद के सभी धर्म प्रेरित-प्रभावित हुए है ।
(26) जब पवित्र काम की पूजा के समय में अपनी पहचान देने का संकल्प भरते है - शुभ मुहुर्ते जम्बूद्वीपे भरतखण्डे आर्यावर्त देशान्तरर्गते....प्रान्त...आदि.... की। जबकि भारत-आर्यावर्त नहीं हिन्दु, हिन्दुस्तान और इण्डिया बोलते है। यानि हम ईश्वर को भी गलत पहचान देते है। धोखा देते है और घोर पाप करते है।
(27) संसार के सभी देशों के मूल नाम को ही अन्य भाषाओं में बोला जाता है। भारत वर्श के चार (4 ) नाम क्यों है
(28) (1) आर्यावर्त - हे महामानवों - भारत का मूल स्वाभीमान व संस्कृति है - आर्य संस्कृति व सनातन धर्म जो सत्तयुग से चली आ रही है। भारतीय भू भाग में अफगानिस्तान से नेपाल तक आर्य व द्रविड़ रहते थे इस लिए इस भू भाग को आर्यावर्त कहा जाता था।
29. (2) भारतवर्श -षकुन्तला के पुत्र भरत के नाम से भारतवर्श कहा जाने लगा। षकुन्तला पुत्र भारत तो षेर के नाम से जाना जाता है ।
शेर के नाम से याद आया कि - षेर के बच्चे को गुलाम बनाकर आप कुत्ता......... आदि .............. कह सकते हो। हम सबूत देकर कह रहें हैं कि सतयुग से कलियुग तक किसी भी प्रमाणित षास्त्र में हिन्दू षब्द नहीं है - ब्रह्मा -विश्णु -राम- कृश्ण आदि हमारे पूर्वज देव हैं, सुर हैं, आर्य हैं । शिव द्रविड़ है। शिव पत्नियां आर्य है। (दक्ष पुत्री सत्ती व हिमालय पुत्री पार्वती।)
अब हम स्वतन्त्र है। अपने पूर्वजों की पहचान ग्रहण करे।
(30) (3) हिन्दुस्तान-तत्पष्चात् 997 ई. के बाद विदेषी इस्लामी आंतकियों ने भारत के आर्यों पर अत्याचार किया। जिन आर्यों ने इस्लाम स्वीकारा उन्हें मुसलमान, जो आर्य बने रहे उन्हें हिन्दू, गुलाम आदि षब्दों से कहा जाने लगा और फिर हिन्दू से हिन्दुस्तान बना दिया - (हिन्दुस्तान - शब्द कोष में पटना-दिल्ली व मध्य भाग को ही हिन्दुस्तान कहा है)
(31) (4) इण्डिया - बाद में अंग्रेज आंतकियों ने भारत के पिछड़े पन, आदिवासी स्तर को देखकर इण्डियन कहा और इण्डिया बना दिया।

(32)- जब अंग्रेज आक्रान्ता भारत में आये थे -अषिक्षा का अन्धकार व पिछड़ेपन को देख कर हमें गंवार, आदिवासी की श्रेणी में रखकर कहा था- इंडियन। जिसका अर्थ पिछड़ा, आदिवासी आदि है और इंडिया बना दिया

(33) गुरुकुल कहां है ?
वैदिक शास्त्रों से ज्ञात होता है कि आर्य संस्कृति सनातन धर्म में सत्युग से कलियुग की 10वीं सदि तक गुरुकुल थे। गुरुकुल चाणक्य के काल में थे। 7 वीं सदि में हवेन्संग चीनी यात्री आया तब भी थे। इसी काल के आस -पास (788-820)आदि जगद्गुरु शंकराचार्य ने अपनी विद्वता का डंका चारों ओर बजाया था तथा आर्य संस्कृति सनातन धर्म की रक्षा के लिये चार धाम बनाए । यानि 10वीं शताब्दी तक गुरुकुल थे।
(34) अब सोचने की बात यह है कि 10वीं शताब्दी से पहले की कई सदियों का इतिहास स्पष्ट नहीं है और अस्पष्ट सदियों में इस्लाम तलवार के बल पर फल- फूल रहा था।
(35) स्पष्ट इतिहास ७997 ईस्वी से विदेशी इस्लामिक आक्रान्ताओं से शुरू होता है। इन्होने कंधार (अफगानिस्थान )में लगभग एक लाख चालीस हजार (1,40,000)आर्यों -जैनों- बोद्धों को गाजर -मुली की तरह काटा था -जबदस्ती मुस्लमान बनाये -गुलाम (हिन्दू ) बनाये। लड़के-लड़कियों को गुलाम -दास-बनाकर ले गए।
(36) ये क्रम ही चलता रहा। बाद में मैदानी इलाकों में आये और चक्रवर्ती राजा के अभाव में इन्होने यहाँ भी ऐसा ही किया। मैदानी इलाकों में पहाड़ों की एक कन्दरा से आना होता है यहाँ प्राय-भारतीय डाकुओं की भी लूटपाट होती थी -ये व्यापारियों को लूटते थे । इसी कन्दरा से एक बार इस्लामिक लूटेरे -लड़के -लड़कियों को ले जा रहे थे - तेज सर्दी पड़ी -सभी बच्चे मर गए । इसलिए इस जगह का नाम ‘‘हिदुंकुष’’ पड़ा यानि मार -काट की जगह -यह अरबी लोगों का ग्रामीण भाषा का नाम है ।
(37) विदेशी इस्लामिक लूटेरे -लड़के -लड़कियों को अधिक पसंद करते थे -ये लड़के -लड़कियां इन्हें गुरुकुल से सहज ही मिल जाते थे इसलिये गुरूकुलों को लूटते-नष्ट करते थे।
(38) अब हस्तिनापुर कहो या इन्द्रप्रस्थ इसका अंतिम वारिश पृथ्वी राज चैहान भी मोहम्मद गोरी को मारकर मर गया -बाद में कोई शक्ति शाली राजा नहीं था और इस्लाम ने अपने पैर जमा लिए -हमारे गुरुकुल नष्ट हो गए । हमने हमारे गुरुकुल तो खोये -हमारे ग्रंथों को भी इन्होने जला दिए चुन चुन कर -
(39) लेकिन हमारे बुजुर्गों ने ग्रंथों के ज्ञान को दूसरे तरीके से बचाया जो आज भी जीवित है। दन्त कथाओं में -लोक कथाओं में इस बात का ईस्लाम व अंग्रेजों को पता हो गया तो इन्होने -इन्हें अंधविष्वास-ढोंगी - अप्रमाणित जैसे शब्दों से प्रचार प्रसार किया। इस षडयंत्र को सफल बनाया हमारे अपनो ने जो अंग्रेजों के पीठु थे और आज भी यह क्रम चल रहा है।
(40) जरा सोचे - आप जिन्हे अन्धविश्वास कहते है उन का तो विश्वास है। आप जिसे विश्वास कहते है। उन के लिए अन्धविश्वास है। इस पर भी गम्भीरता से सोचना है कि अन्धविश्वास के खिलाफ कानून पारित करना है या शोध करनी है। हमने शोध की है।
(41) प्रायः प्रायः बुजुर्ग मर गए है परन्तु आज भी हमारे शास्त्रों का ज्ञान हमें ग्रामीणों में मिल ही जायेगा -बस थोड़ी मेहनत करनी होगी ।
(42) शब्द हिन्दू फारसी है। यह इस्लामिक गुलामी व अंग्रेजी गुलामी तक तो ठीक था -और हमारे पूर्वज शान से कहते थे कि हम हिन्दू है -यानि गुलाम है पर - मुसलमान तो नहीं है -हम सनातनी है। हमारा धर्म सनातन है। हम आर्य ही है।
(43) विदेषी इस्लामिक लुटेरों ने भारत को गुलाम बनाया -मार-काट की और हमारे कमजोर पूर्वज मुसलमान बन गए -बाकी गुलाम/हिन्दू बन गए । इस प्रकार कुछ-कुछ अन्तराल में क्रूर मुस्लिम शासक, जो गुलाम या हिन्दू थे उन्हें भी मुसलमान बनाने के लिए कुचक्र चलाते थे तो इन कुचक्रों को असफल करने के लिए इन्ही बहादूर आर्यों सनातनियों को बचाने के लिए -हमारे योद्धाओं -महापुरुषों -महामानवों -ऋषि मुनियों ने अपना सर्वस्व बलिदान न्यौछावर कर दिया -लेकिन हिन्दुओं को बहादूर आर्यों -सनातनियों को मुसलमान नहीं बनने दिया -जो बन गए वे आज भी मुसलमान ही है
(44) मुस्लिम शासकों ने कई ऐसे घृणित कार्य भी किये जो यहां पर हम उजागर करना नहीं चाहते।
(45) यदि सभी उस समय मुसलमान बन जाते तो आज आर्य संस्कृति- सनातन धर्म का नामो निषान मिट जाता ! गन्धार की तरह। जो आज अफगानिस्तान कहलाता है। इसी प्रकार भारत भी आज सही रूप में हिन्दुस्तान बन जाता।
(46)शब्द ‘हिन्दू’ का प्रभाव देखें । अब हम स्वतंत्र है -फिर भी शब्द हिन्दू के प्रभाव में है। आज देष के कर्णधार -अग्रणी -संत -षंकराचार्य आदि शब्द हिन्दू हिन्दू से ही ग्रसित है ? गुलामी के भाव प्रबल है इसलिए ये लोग आज भी हिंदुस्थान-इंडिया -हिन्द हिंदी में जी रहे है वरना अब क्या आवष्यकता है अंग्रेजों की नकल के संविधान की। कानून की। क्योंकि शब्द हिन्दू का प्रभाव जो है इसी कारण सभी के मन में चोर डाकुत्व के भाव प्रबल है।
पहले ब्रह्मचर्य की शिक्षा दी जाती थी। तो वातावरण ब्रह्मचर्य का था अब यौन शिक्षा का प्रचार हो रहा है। इस लिए यौन ही यौन का प्रभाव है। यह शब्द की शक्ति और प्रभाव है। अतः हिन्दू शब्द से भ्रष्टाचार रुपी राक्षस का देष में तांडव हो रहा है । शब्द संघर्ष कराते हंै। शब्द शान्ति कराते हैं। शब्द प्रेम कराते हैं!
अत: नकारात्मक ऊर्जा के शब्दों को छोड़े सकारात्मक ऊर्जा के शब्दों को बोले व लिखें।
अतः शब्द हिन्दू के प्रभाव से मुक्त होवो । आर्य संस्कृति- सनातन धर्म के आर्य बनो।
-देखो चमत्कार ! आर्य का अर्थ है -श्रेष्ठ !-श्रेष्ठ ! -श्रेष्ठ !-श्रेष्ठ ! तभी हम कहते हैं -शब्द ही ब्रह्म है। शब्द में शक्ति है। शब्द से संस्कार बनते हैं। ये ही सनातन सत्य है ! ं
एक बात ओर - शब्द भारतीय मुद्रा का चिन्ह् अशुभ है। इस में र को काटा है।
इसमें नकारात्मक ऊर्जा है इसी कारण भारत के धुरन्धर अर्थशासित्रयों की छत्रछाया में भी भारत की अर्थव्यवस्था अस्त-व्यस्त है।
ॐतत्सत! ॐशान्ति ! जय भारत -!! आर्य संस्कृति सनातन धर्मेव जयते !
(47) हम वर्षों से सनातन धर्म-हिन्दू धर्म का विश्लेषण कर रहे थे 1979 में जगद्गुरु शंकराचार्य निरंजन देव ने हमसे हिन्दू धर्म की बात की थी। तो हमारे शरीर में अजीब सी हलचल हुई थी। चलते-चलते 1988 में दूरदर्शन ने अमरनाथ यात्रा को हिन्दू धर्म का बताया तो हमारे में चेतना आयी और दूरदर्शन को पत्र लिखा अमरनाथ सनातन धर्म का है।
(48) दिसम्बर 1992 में बुद्धिजीवी वर्ग व पत्रकारों की गोष्ठी में हमने पूछा था कि एक दैनिक पत्र को सम्बोधित करके कि बताओ हिन्दू धर्म का प्रवर्तक कौन है? हो हल्ला हो गया। शोर हो गया। फिर चलते चलते हिन्दू पर शोध करके 21 मई 2011 को खेजड़ा एक्सप्रेस के कर्मस्थल-कार्यालय प्रकृति शक्ति पीठ में हिन्दू शब्द पर गोष्ठी रखी। जो पांच घंटे चली -24 मई 2011 से हिन्दुत्व की सच्चाई पर विधिवत- खेजड़ा एक्सप्रेस में प्रकाशन शुरु किया- दिनांक 9- 8- 2011 को खेजड़ा एक्सप्रेस में हिन्दुत्व को सच्चाई और सबूतों के साथ छाप कर विधिवत हिन्दुत्व पर प्रथम भाग ‘‘भारत छोड़ो’’ आन्दोलन के दिन से ‘‘हिन्दुत्व छोड़ो’’ का महाअभियान का महायज्ञ शुरु किया जो अनवरत चलते-चलते खेजड़ा ऐक्सप्रेस 9-8-2013 को ‘‘सम्पूर्ण स्वतन्त्रता’’ के लिए पूर्णतया सच्चाई को उजागर करते हुए आगे बढ़ रहा है। आओ हमारे साथ आर्य संस्कृति के आर्य बनो, श्रेष्ठ बनो! संकल्प लो कि हम आज से आर्य संस्कृति सनातन धर्म के आर्य है। सनातन है। सुर हैं-देव हैं-आर्य हंै। तन-मन से सनातन धर्म की आर्य संस्कृति की रक्षा करेंगे तथा भारत ही लिखेगे, बोलेगे।
तथा नकारात्मक ऊर्जा देने वाले शब्दों का बहिष्कार करेंगे।
हिन्दी का नाम देवनागरी घोषित करायेगे। दिल्ली को इन्द्रप्रस्थ के साथ सभी ऐतिहासिक स्थलों की पहचान कर के उनके मूल नामो में परिवर्तन करायेंगे।
(49) यह कटु सत्य है कि आर्य संस्कृति सनातन धर्म में सत्युग से सुर-असुर, देव-दानव, आर्य-अनार्य वर्णित है- अतः न हम हिन्दू है। न हम मुसलमान है। हम सब भारतीय है। हम सुर है! हम देव है! हम आर्य ही है। हम श्रेष्ठ है। अतः आओ हम हमारे पूर्वजों की पहचान में प्रवेश करे। जिससे भारत में शान्ति होगी! भारत का सही विकास होगा। भारत विश्व गुरु बनेगा और भारत विश्व में शान्ति स्थापित करेगा। इस सुकृत्य से पर्यावरण में प्रदूषण रूपी राक्षस समाप्त हो जायेगा। हमारे पूर्वजों की आत्मा को असीम शीतल शान्ति मिलेगी। वे हमें वरदान देंगे।
आर्यावर्त भारतीय आर्य संस्कृति ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’, पर विश्वास रखती है। अतः आर्य सनातन धर्म, ईसाई धर्म, इस्लाम धर्म, बौद्ध धर्म, जैन धर्म, आदि किसी भी धर्म की पद्धति से पूजा-अर्चना विवाह आदि करने में विश्वास रखते है।
(50) यह सृष्टि कुम्हार सृष्टि है। प्रजापति ब्रह्मा कुम्हार है। सभी कामों में दक्ष होने के कारण ‘प्रजापति’ की उपाधि से विभुषित है। प्रजापति कालचक्र से विभिन्न प्रकार के प्राणी पैदा करते है। बच्चा मिट्टी होता है। कुम्हार होता है। उसे ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शुद्र, सन्त, चोर आदि कुछ भी बनाया जा सकता है। जैसे ब्रह्मा के वंशज कुम्हार मिट्टी को चक्र से घड़ा, मटकी आदि बनाता है।
अतः जाति का अहंकार मत करो। इतिहास साक्षी है। उच्च वर्ण के लोगों ने जो ध्रणित कार्य किये है उतने निम्न वर्ण के लोगों ने नहीं किये। अतः बच्चे का गर्भधारण करने से पूर्व सुसंस्कारित करने कि प्रक्रिया करना शुरू करें।
(51) शब्द ही ब्रह्म है। शब्द में शक्ति है। शब्द से संस्कार बनते हैं। ये ही सनातन सत्य है ! ं
जब कर्इ देशों ने अपनी संस्कृति की अक्षुण्ता के लिए नकारात्मक ऊर्जा के शब्दों पर प्रतिबन्ध लगाया है।
अत: भारत भी नकारात्मक ऊर्जा के शब्दों पर प्रतिबन्ध लगाने की प्रक्रिया तुरन्त प्रभाव से शुरु करें तथा भारत ही नहीं विश्व को भी सुंस्कारित करने में भी अपनी भूमिका निभाने की प्रक्रिया तुरन्त प्रभाव से प्रारम्भ करें।
ॐतत्सत! ॐशान्ति !ॐ प्रेम! जय भारत !!
आर्य संस्कृति सनातन धर्मेव जयते !
ब्रह्माण्डगुरु भगवान प्रजापति-अधिष्ठाता प्रकृति शक्ति पीठ, खेजड़ा एक्सप्रेस
विशेष जानकारी के लिए हमसे मिले/सम्पर्क करे। मो. 7737957772
देखे http://bhagwanprajapati.webs.com/-- खेजड़ा एक्सप्रेस पढ़े।
मिलावटी घी-दूध, खाद्यान्न से जनता बीमार, कमजोर हो रही है। मिलावट खोरां को देशद्रोही घोषित किया जावे। कानून का आदर करें, पालन करें, देश में सुख शान्ति होगी। ॐशान्ति! —
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वर्तमान में प्रतिवर्ष लगभग 20,000 की तादाद में तुलसी पौध ऊगाकर नि:शुल्क वितरण करने का कार्य अनवरत चल रहा है। अब तक 3 लाख से अधिक तुलसी पौध व हजारों पीपल पौध नि:शुल्क वितरित हो चुके हैं। इस पत्र को अपने प्रियजनों को भेजे। महामानवों को भेजे।
कृपया भूल न करें। हमें सूचित करें।
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:: सुमंत्रण :: दक्ष पुत्री व शंकर पत्नी सती व शंकर का सुक्ष्म अंशावतार हो चुका है तथा इनका मिलन भी हो चुका है। अतिशीघ्र विवाह में आपको 'सुमंत्रण दिया जा रहा है।
ऊँ तत्सत

अब ये शक्ति प्रदुषित विचारों की शक्ति का विध्वंस करेगी!
ऊँ तत्सत!!
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:: सुमंत्रण ::
आर्य संस्कृति, माता-पिता- गुरु, प्रकृति
वनस्पति, तुलसी और पर्यावरण से जोड़ने का हमारा महायज्ञ सफलता की ओर अग्रसर है। आप आज ही शामिल होवे।
ब्रह्माण्डगुरु भगवान प्रजापति-अधिष्ठाता प्रकृति शक्ति पीठ
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स्वात्वाèािकारी संपादक, प्रकाशक, मुद्रक भगवाना राम प्रजापति के लिए ऊँ श्री प्रिटिंग प्रेस के लिए इन्दु प्रिन्टर्स में मुदि्रत।
पाक्षिक खेजड़ा एक्सप्रेस कार्यालय विश्वकर्मा गेट के बाहर, प्रजापति घर, बीकानेर से प्रकाशित (सम्पादक : दया प्रजापति)


9-march2014 पो. पजि. सं. बीकानेर/025/12-1124
दिनांक:9-3-14 वर्ष 26 अंक 14
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पर्यावरण, आध्यात्मिक एवं समसामयिक विचारों एवं स्वास्थ्य रक्षा विषयक धरती से जुड़ा विश्व का अग्रणी शास्त्र
पाक्षिक खेजड़ा एक्सप्रेस
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तुलसी पौध से स्वस्थ रहे-
- आर्य संस्कृति, माता-पिता- गुरु, प्रकृति
वनस्पति, तुलसी और पर्यावरण से जोड़ने का हमारा महायज्ञ सफलता की ओर अग्रसर है। आप आज ही शामिल होवे। -प्रजापति
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हमारा ध्येय ब्रह्माण्डिय पर्यावरण सुरक्षा व विश्व शान्ति
एवं प्राणियों की स्वास्थ्य रक्षा करनी ही है।
आप स्वस्थ रहेंगे तो धर्म-कर्म विद्यौपार्जन,धनोपार्जन
करेंगे। घर में तुलसी पौध लगाने से सुख-शान्ति मिलती है।
प्रकृति शक्ति पीठ, खेजड़ा एक्सप्रेस से तुलसी, पीपल
- पौध निःशुल्क ले जावें।
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Bhagwan Prajapati Brahmandguru-adhishthata
 Khejara Express 

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!! सुमंत्रण !!!
हे महामानवों,

आर्य संस्कृति, माता-पिता- गुरु, प्रकृति वनस्पति, तुलसी और पर्यावरण से जोड़ने व् प्राणियों के स्वास्थ्य रक्षा का हमारा महायज्ञ सफलता की ओर अग्रसर है। आप आज ही शामिल होवे।

अत्त; दैवीशक्ति की ऊर्जा बढ़ाने के लिए ,सृष्टि उत्पति के समय से अनवरत चला आ रहा आर्य संस्कृति सनातन धर्म को शक्तिशाली बनाने के लिए आर्य संस्कृति सनातन धर्म के विभिन्न संप्रदायों -धड़ों को एक समय समान पूजा पद्धति से ओंकार -ॐ में एकाकार करने कि प्रक्रिया अपनाने को प्रेरित करने के लिए वसुधैव कुटुंबकम् शांति महायज्ञ की महायात्रा का शुभारम्भ किया जा रहा है इसमें आप इस यज्ञ ज्योति में आहुति देवें आपका आर्यत्व बढ़ेगा ,आपका श्रेष्ठत्व बढ़ेगा ,आपकी ऊर्जा बढ़ेगी आपकी जटिल समस्याओं का समाधान हो जायेगा विश्व में राक्षसी शक्ति का सम्राज्य समाप्त होकर दैवीशक्ति का साम्राज्य स्थापित होगा।
हे महामानवों ,विश्व शांति और प्राणियों के स्वास्थ्य लाभ की वसुधैव कुटुंबकम् शांति महायज्ञ की महायात्रा प्रकृति शक्ति पीठ ,खेजड़ा एक्सप्रेस ,बीकानेर से दिनाक --------अतिशीघ्र --- वार-------अतिशीघ्र --------समय ---अतिशीघ्र ---को रवाना होकर नगर के विभिन्न मार्गों से चलते हुवे ग्रामों -महानगरों तक अनवरत चलेगी।
आप इस यज्ञ ज्योति में आहुति के साथ बुरे कर्मों को छोड़ें -सत्कर्मों को बढ़ावें, प्रकृति शक्ति पीठ का ' तुलसी पौध' का प्रसाद लेवें।
(उपरोक्त सभी जानकारियां फेस बुक पेज खेजड़ा एक्सप्रेस व् इंटरनेट पर पूरी जानकारियां मिल जयेगी। )
नोट -किसी भी प्रकार का भौतिक चढ़ावा -दान आदि यज्ञ ज्योति में न चढ़ावे।
नीचे के पत्र को -राष्ट्रपति ,प्रधानमंत्री ,सुप्रीम कोर्ट व् आप अपने प्रियतम प्रियों को भी पत्र प्रेषित करें तथा स्वतंत्रता के बाद भी ,सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय भाषा देवनागरी को आपने कार्य में प्राथमिकता न देकर विदेशी भाषा को दे राखी है अत विदेशी भाषा का पत्र है-page 10 par hai उसे भेजे तथा दूसरी तरफ देवनागरी का भी पत्र भेज दे.|

सेवा में,
श्री /श्रीमत्ती/सुश्री -----------------------------------------------------
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विषय ---1. शब्द में शक्ति है। शब्द से संस्कार बनते हैं। ये ही सनातन सत्य है !
2-संविधान में सकारात्मक ऊर्जा के शब्द स्थापित करें।
3.राष्ट्र को सुसंस्कारित करने की प्रक्रिया शुरु करें।
महोदय आज भारत ही नहीं विश्व संस्कारहीन होता जा रहा है । अशांति फैलती जा रही है -क्योंकि सकारात्मक ऊर्जा के शब्दों की जगह नकारत्मक ऊर्जा के शब्दों का प्रचलन बढता ही जा रहा है ।
उदहारण स्वरूप -- जैसे-यौन शिक्षा -----इससे यौनाचार बढता जा रहा है ।
जबकि -ब्रह्मचर्य शिक्षा के शब्द से सकारात्मक ऊर्जा बनती है !
जब से भारतीय रुपया का चिन्ह र को काटकर र बनाया है तब से धुरंधर अर्थशास्त्रियों कि छत्रछाया में भारत कि अर्थवयवस्था अस्त व्यस्त हो रही है।
. र के चिन्ह में नकारात्मक ऊर्जा है
राज शब्द फ़ारसी है ।इसने हिन्दू। हिन्द। सरकार। सरकारी आदि फ़ारसी शब्दों में मिल कर अपना वर्चस्व बढ़ा लिया है। इसी कारण राजनीति प्रदूषित हुई है। राज का अर्थ ही रहस्य ,गुप्त ,यानि गुप्तनिति,रहस्यनीति। इसकी जगह होना चाहिए सत्तानीति।
सत्य से ,सत्य के लिए ,सत्य की सत्ता ,सत्तासीन ,शासकीय ,राज्य आदि शब्दों में सकारात्मक ऊर्जा है। जबकि राज व् राजनीति में नकारात्मक ऊर्जा है।
राष्ट्रपति ,प्रधानमंत्री ,विधायक ,सांसद आदि ये पद है। इसमे महिला को भी इसी पद से बोला - लिखा जायेगा।
यदि विधायक महिला को विधायिका बोला या लिखा जाता है तो इससे बड़ी बेईज्जती महिला विधायक कि क्या होगी और क्या होगी विधायिका की।
मीडिया को जो लिखकर भेजते है वे तो मूढ़ है पर मीडिया भी मूढ़ है जो विधायिका लिखती है।
इसी प्रकार नेता शब्द सकारात्मक ऊर्जा देता है पर यदि महिला नेता को नेती,-नेत्री बोलेंगे -लिखेंगे तो नकारात्मक ऊर्जा बनेगी।
सम्राट शब्द में सकारात्मक ऊर्जा है पर राज से राजा शब्द में नकारात्मक ऊर्जा बनती है। इसी राजपूत शब्द से भी सकारात्मक ऊर्जा नहीं बनती जबकि क्षत्रियपूत में सकारात्मक ऊर्जा भरपूर है।
- माता-पिता- संस्कारित होने से संतान भी संस्कारित होगी। संस्कारित सन्तान से गुरुजन संस्कारित होंगे। गुरुजन संस्कारित होने से राष्ट्र संस्कारित होगा।
भ्रष्टाचार प्रवर्ती पर अंकुश लगना शुरू हो जायेगा।
अत: माता-पिता संस्कारित हो व गुरुजन समुदाय को वह सब सुविधा दी जावे जो वे खुद संस्कारित होकर विधार्थियों को भी संस्कारित कर सकें।
- गुरुजन समुदाय का शोषण बन्द किया जावे विशेषतौर से निजि शिक्षण संस्थाओं में होता है।
- सभी जाति-धर्म- समुदाय के बच्चों को समान शिक्षा देने की प्रक्रिया शुरु की जावे ताकि प्रतिभाशाली पिछड़े समुदाय के छात्र अपनी प्रतिभा दिखा सके।
- शिक्षा व नौकरियों में आरक्षण बन्द कर दिया जावे। इससे पिछड़े समुदाय की प्रतिभाओं का विकास अवरूद्ध होता जा रहा है। ये लोग आरक्षण के बोझ से अपनी प्रतिभा को उजागर करने की योग्यता खोते जा रहे है।
अन्य पिछड़े वर्ग को विधानसभा व लोकसभा में आरक्षण दे दिया जावे।
राष्ट्र के अग्रणी महामानवों व सन्तों को सकारात्मक सोच की ऊर्जा बढ़ाने की प्रक्रिया सीखनी चाहिए।
पाक्षिक खेजड़ा एक्सप्रेस 9-8-11 व 9-8-13 तथा 24 .५.१३ के अंक व् ''सत्य की खोज सत्य से 6 अरब लोगों में' नकारात्मक ऊर्जा के शब्दों का विवरण दिया है। परम सत्य है।
अत: सत्य ही नहीं ये परम सत्य है इन्हें संविधान से हटाकर इनकी जगह सकारात्मक ऊर्जा के शब्द लगाने की प्रक्रिया से देश का समुचित विकास होगा।
भारत विश्व की अग्रणी शä बिनेगा-विश्व में शानित स्थापित करेगा।
शब्द ही ब्रह्म है। शब्द में शक्ति है। शब्द से संस्कार बनते हैं। ये ही सनातन सत्य है !

ॐ शांति - आर्य संस्कृति सनातन धर्मेव जयते !!!!ॐ तत्सत !!!!
page -10
To,
Mr /
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Subject ---Words have power. Words are formed by the rites. This is the eternal truth! Am
- Install the words in the Constitution for positive energy .
Start the process of culture for the nation, susnskarit .
Sir / Today, India is becoming not only impudent world. Peace less (snskarhin ) is spreading continue - the words Negative energy is only increasing not only in Bharat but throughout the world and positive energy is decreasing.
For Examples------ sex education has grown –so that sexual crime is increasing more than past . Instead of it, the celibacy ( Brahmacharya ) education, this is the only education will create positive energy !
n the shelter of gretest economist the indian currency is falling since cut r in symble of rupee.the r word has negative energy.
The Farsi ( parsian ) word ‘ Hindu’ is spreading influence everywhere according to it’s means.
The word ‘Raj’ is Persian .It’s has increased its existence by joining farsi word like ‘Hind’ ‘Hindu’ ‘sarkar’ ‘sarkari’ hindusthan.etc. Result, Rajneeti is polluted . ‘Raj’ means secret , Gupt , ie Guptniti , Rahasyaniti . secret policy , it must be replaced with the word “Sattaneeti”.
Truth ,for truth , to power of truth , power (Satta) , Sattaseen,( Shaskiya) state (Rajya), etc. In terms of positive energy . Raj and Rajneeti word has Negative energy.
President , Prime Minister , MLA , MP etc these are terms. It spoke to the woman at the same position - would be written .
The most insulted part of the legislative assemblies and women that, Our Female MLA are known as vidhayika in our legislature
They are foolish who is sent this word. Are the media also foolish? That they write this word vidhayika .
Similarly, the leader (neta) gives positive energy. If female leader call and write with word Neti - Netri will be build the negative energy .
Aaryavart.Bharat.Emperor ( Samrate) term in positive energy but Raj into Raja word become negative energy Including India word also.
. Similarly, Rajpoot word does not build positive energy. The word Kshtriypoot have full positive energy .
So when Parents will follow this way the child will follow the same. The children will be conditioned by it they will be in the process become such type of teachers of the same culture.
Attitudes will begin to embark on a curb corruption.
Therefore, parents should be cultured (susnskarit) and teachers should be given such type of condition of comforts and their demands to educate the community and students should be also consecrated.
Teacher community deserves specially free from exploitation ,specially by private educational Institutions.
All Categories of religion’s children should be educated in equal system of the education, in order to consult initiated the process of educating talented students of backward communities can show their talent .
- Education and job reservations should be stopped otherwise It will ruin the talent of backward community. They are losing their talent and ability because of the burden of reservation.
Given OBC reservation in assembly and Lok Sabha is deserved.
The nation 's leading great men (Mahamanvon) and the Saints should learn the process of increasing the power of ( Susanskarit) positive thinking .
Express 9-8-11 and 9-8-13 Kejdha fortnightly and '' truth '' negative energy in discovering the truth of the words of the 6 billion people have details. It is Ultimate Truth .
So true is not the ultimate truth of such words in the Constitution should be removed which are creating negative energy and replacing the words of positive energy it will be develop in country.
Bharat will be the world's foremost power of positive energy and it will establish peace on earth.
Because that is truth---The term is brahma. Words have power. Words are formed by the rites. This is the eternal truth! Am
.
Om Shanti Aryan Sanskriti evm Sanatan Dharmev Jayte ! Om Ttsat ! ! ! !
page -3
होलिका - शक्ति सम्पन्न सती
हमारे महामानवों ने सभी तीज-त्यौहारों को पर्यावरण व स्वास्थ्य के लिए शुरू किए हैं। होलिका दहन में पर्यावरण, आध्यात्मिक का गूढ़ रहस्य छिपा हुवा है। होलिका दहन से पर्यावरण सुधार व शारीरिक स्वास्थ्य को लाभ होता है। होलिका दहन से शक्ति सम्पन्न की नीति अनिति अपनाने से भस्म हो जाने की शिक्षा मिलती है।
वर्तमान में कुड़ा-करकट इकट्ठा करके होलिका दहन करना नितान्त आवश्यक है। होलिका दहन के समय दुषविचारों, दुष्कर्मों को जलाने व सत्कर्मों को अपनाने की भावना रखनी चाहिये। होलिका दहन से विशेष तौर से महिलाओं को शिक्षा लेनी चाहिये कि शक्ति सम्पन्न सत्ती होलिका भी असत्य का साथ देने से जल जाती है। सत्य फिर भी जीवित रहता है।
हम वर्षों से पर्यावरण सन्तुलन व सुरक्षा का कार्य कर रहे हैं। जिसका गूढ रहस्य है प्राणियों के स्वास्थ्य की रक्षा करना। स्वस्थ प्राणियों से असीम शान्ति कायम हो सकेगी- प्रजापति
होली का दहन का प्रचलन कब से शुरू हुआ क्यों शुरू हुआ? इस बारे में अनेक तरह के विचार प्रकाशित हो रहे हैं कई किवदन्तियां प्रकाशित होती है कई ग्रन्थों में होलिका दहन के बारे में बहुत कुछ लिखा हुआ है साथ ही देश-काल के अनुसार भी होलिका दहन के तौर-तरीके अलग-अलग हैं। हम इन सब बातों की ओर न जाकर सीधे हमारे महामानवों द्वारा शुरू किये गये तीज-त्यौहारों का प्रचलन पर्यावरण व स्वास्थ्य सम्बन्धी लाभ के लिए शुरू किया है उसी ओर विशेष ध्यान दिलाना चाहेगें साथ ही आध्यात्मिक गूढ़ रहस्य के बारे में भी जानकारी देना चाहेगें। होलिका दहन-सर्दऋतु में कई कीटाणु पैदा हो जाते है जो पर्यावरण व स्वास्थ्य को भारी क्षति पहुंचातें है ऐसे में इन कीटाणुओं को नष्ट करने में ग्राम-नगर की सफाई को मध्यनजर रखते हुवे होलिका दहन करना नितान्त आवश्यक है। होलिका दहन में जो भी कूड़ा-करकट पड़ा होता है उसे जलाना चाहिये।
इस प्रकार शीत काल में जो कीटाणु पैदा होकर वनस्पति व प्राणियों को नुकसान पहुंचाते है वे अनावश्यक कीटाणु जल जाते है और वह ग्राम, नगर की एक तरह से सफाई पूर्णतः हो जाती है। लेकिन वर्तमान में इस प्रकार की कार्यशैली अपनायी नहीं जा रही है प्रशासन भी किसी भी तरह की सफाई की ओर विशेष ध्यान नहीं देता जबकि सरकार व प्रशासन को चाहिये कि प्रत्येक तीज-त्यौहार पर ग्राम-कस्बा-नगर आदि को एक बार तो पूर्णतः स्वस्छ करें। लोग घर की सफाई करके जो कुड़ा-करकट बाहर फैंकते है वह भी यूं ही बिखरा पड़ा रहता है। इस प्रकार वर्तमान में जो होलिका दहन हो रहे हैं वह आडम्बर के रूपक बन गये है।
होलिका दहन का आध्यामिक रहस्य
होलिका एक शक्तिसम्पन्न नारी थी जिसे वरदान प्राप्त था कि सत्य का साथ देते रहने से तुम आग में भी नहीं जलोगी। लेकिन होलिका मूल बात भूल गई और भूल गई यह भी कि भतीजा भी पुरूष की श्रेणी में ही आता है और इस प्रकार असत्य का साथ देकर जल गई और सत्य जीवित रह गया।
होलिका दहन से महिलाओं को शिक्षा
आज दहेज लोभी भेडि़ये अबोध कमजोर महिलाओं को निर्ममता से जला रहे हैं ऐसी परिस्थितियों में आज की महिलांए होलिका की तरह दृढ़ निष्ठावान चरित्र वाली होकर शक्ति सम्पन्न बनकर सत्य का साथ देती रहे तो उसे प्रताडि़त करने व जलाने का दुःसाहस करने वाले खुद जलकर भस्म हो सकते हैं।
होलिका की भस्मी से पिडोलिया पूजन
होलिका दहन की भस्म से दूसरे दिन बालिकांए पिण्डोलिया बनाकर सोलह दिन तक पूजती है इसका महज यही कारण है कि होलिका एक महान शक्तिसम्पन्न सत्ती थी और सत्ती की भस्मी का पूजन करते हुवे यह विचार करते रहना चाहिये कि होलिका की तरह हम भी महान शक्ति सम्पन्न बने और जो गलती सत्ती होलिका ने की थी वह गलती हम नही करें।
इस प्रकार के विचार होलिका दहन के समय भी अपनाने चाहिये।
ज्वारा बोने व पूजन करने के गूढ़ रहस्य
होलिका दहन से स्वाभाविक तौर से धुआं उठता है और अग्नि से कई कीटाणु-जीवाणु मरते है इस प्रकार वातावरण शुद्ध तो होता है परन्तु फिर भी दुषित धुएं का भी कुप्रभाव रहता है ऐसे समय में घर पर ज्वारा बोने से दुषित वायु का प्रभाव कम हो जाता है।
ज्वारा का विसर्जन
ज्वारा को पानी में विसर्जन करना चाहिये ताकि पानी की पौष्टिकता बढ़े या फिर ज्वारा को पीस कर रस निकाल कर पी लेना चाहिये।
प्राचीन काल में तो पानी में डालने की प्रथा थी परन्तु वर्तमान में ज्वारा को कुड़े करकट में फैंक दिया जाता है इस प्रकार बेशकीमती चीज को फैंककर पर्यावरण को नुकसार पहुंचाया जा रहा है। अतः इस प्राचीन परम्परा का महत्व समझते हुवे पर्यावरण पे्रमी वर्ग की महिलाओं पुरूषों को पहल करनी चाहिये।
अब जरा सोचिये कि जो महामानवों ने हमारे तीज-त्यौहारों में जो प्रथा शुरू की थी उनमें आज बढ़ते प्रदूषण में दोष आ जाने पर और अधिक प्रदूषण को बढावा मिल रहा है। अतः हमें अभी से पर्यावरण व स्वास्थ्य को लाभ में रखते हुवे तीज-त्यौहारों में जो खान-पान बनाने का महामानवों ने रिवाज शुरू किया था उन्ही पकवानों को मध्यनजर रखकर पकवान बनाने चाहिये। इस प्रकार कम खर्च में हम बढ़ते प्रदूषण को रोकने में पूर्णतः सक्षम होगें। अब हम चेतावनी भी देना चाहेगें कि आज प्रदूषण का साम्राज्य हर क्षेत्र में विकराल रूप धारण कर चुका है और जिसमें मानसिक प्रदूषकों की संख्या बढ़ती जा रही है जिस कारण आज चारों ओर अशान्ति ही अशान्ति व अन्धकार का भविष्य बन गया है इसे समाप्त करना है तो एक मात्र इसका उपाय है पाक्षिक खेजड़ा एक्सपे्रस, प्रकृति शक्ति पीठ द्वारा चलाये गये घर-घर तुलसी पौघ लगाओ अभियान को सफल बनाना।
अतः घर-घर तुलसी पौध लगाओ अभियान को सफल बनाईये और असीम, सुख- शान्ति वैभवशाली बनिये। तथा तुलसी पौध का दान करे तुलसी पौध दान से सभी प्रकार के कष्ट दूर होते है यह दान श्रेष्ठतम पवित्र दान है। -प्रजापति
भोजन मनोविज्ञान और स्वस्थ पर्यावरण
वर्जित भोज्य पदार्थ:-
-कुछ भोज्य पदार्थ ऐसे होते होते हैं जो अपनी विशिष्ठ अवस्था में उपयोग में नहीं लाने चाहिए क्योंकि उस अवस्था में वे स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकते है। इसी तरह कुछ शारीरिक अवस्था ऐसी होती है जिसमें भोजन नहीं करना चाहिए।
-सोकर उठने के तुरंत बाद कुछ भी खाना-पीना नहीं चाहिए केवल रात्रि में सोकर सुबह उठने पर पानी पीना चाहिए।
-सोने के लिए जाने से ठीक पहले भी होजन कभी नही करना चाहिए। ऐसा करने से कई तरह के उदर विकार हो सकते है।
- भोजन करने के तुंरत उपरान्त स्नान करना भी वर्जित है।
- बहुत थके हुए होने पर भी भोजन नहीं करना चाहिए। ऐसी अवस्था में हल्के गुनगुने एक गिलास पानी में दो चम्मच शहद मिलाकर पीकर पर्याप्त आराम करना चाहिए। आराम करने से कम से कम डेढ़-दो घंटे उपरान्त ही कुछ खाना चाहिए। अधिक थके होने पर भोजन करने से अपच हो सकती है।
- अति गर्म चावल और खिचड़ी खाना भी वर्जित है।
- गर्म भोज्य पदार्थों में दही, रायता व लस्सी मिलाकर खाना भी वर्जित है।
- दूध या उससे बने भोज्य पदार्थों के साथ कच्चा प्याज कभी नहीं खाना चाहिए।
- बासी कच्चा मांस भी खाना वर्जित है क्योंकि इसका पाचन दुखश्कर होता है।
- ज्वर की अवस्था में भोजन नहीं करना चाहिए। तापमान सामान्य होने पर भोजन ले लेना चाहिए। पर यह बहुत हल्का, मात्रा मंे थोड़ा और सुपाचय होना चाहिए।
- शीत काल में ठण्डे खाद्य पदार्थ वर्जित होते है।
- उष्ण और शीतल खाद्य पदार्थ साथ-साथ खाना वर्जित होता है। यह रोग को निमंत्रण देने के समान होता है।
व्रत में भोजन:-
भोजन मनोविज्ञान के दृष्टिकोण से व्रत शरीर और मन की एक विशिष्ठ अवस्था का द्योतक है। इसमें हम अपने मन में यह धारणा करते है कि हमें अपने शरीर को पाचन के कार्य से कुछ समय के लिए छुटकारा दिलाना है जिससे पाचन संस्थान निष्क्रिय सा रहकर आराम कर सके और शरीर में विजातीय पदार्थ शरीर उत्सर्जित कर सके। इससे पाचन क्रिया बलवती बनती है जो स्वास्थ्य के लिए उत्तम रहता है। व्रत वाले दिन तरल पदार्थ जैसे सादा पानी, फलों का रस, लस्सी, सूप, सब्जियों का रस, दूध आदि अन्य ठोस खाद्य पदार्थों से अधिक लेना चाहिए जिससे पाचन कार्य सरलता से हो और साथ ही पाचन संस्थान को कुछ आराम भी मिले। एक दिन व्रत करने का प्रभाव तीन दिन रहता है। व्रत से पहले दिन बहुत ही हल्का, सुपाच्य और मात्रा में कम भोजन ही लेना चाहिए। अगले दिन व्रत करना चाहिए। उस दिन भोजन में मुख्य रूप से तरल पदार्थ ही लिए जाने चाहिए। तीसरे दिन व्रत का उपसंहार होना चाहिए, उस दिन पुनः हल्का, सुपाच्य और अल्प मात्रा में भोजन लेकर व्रत की समाप्ति करें। ऐसी अवस्था में कब्ज न हो इसके लिए रात्रि के समय हल्के गुनगुने पानी में एक चैथाई नींबू का रस मिलाकर लेना चाहिए। अधिक नींबू नहीं लेना चाहिए अन्यथा सायनस की समस्या हो सकती हैं व्रत वाले दिन किसी तरह का भी गरिष्ठ भोजन वर्जित है। इसी तरह व्रत के तुरंत बाद भी भोजन नहीं करना चहिए।
अजीर्ण निवारण:-
भोजन सम्बन्धी समस्याओं में अजीर्ण होना एक सामान्य समस्या है। कई बार भोजन के समय कई कारणों से अधिक खाद्य पदार्थों का उपभोग कर लिया जाता है, परिणामतः अजीर्ण (अफारा अथवा पेट फूलना, गैस, दर्द व बैचेनी आदि) हो जाता है। यह पर्याप्त कष्टकर हो सकता है। इससे छुटकारा पाने के लिए अनेक साधारण व घरेलू उपाय हैं। इनके प्रयोग से इस समस्या का निदान हो सकता है। यदि इन उपायों से लाभ न हो तो चिकित्सकीय उपाय तुरन्त किया जाना चाहिए। व्यर्थ प्रतीक्षा करना अहितकर हो सकता है।
- अधिक घी खा लेने अथवा घी युक्त भोजन कर लेने या फिर अधिक तला-भुना भोजन खा लेने से आए अफारे को दूर करने के लिए गुनगुने पानी में नींबू का रस (अधिक से अधिक आधा नींबू) काली मिर्च का चूर्ण (5-8 काली मिर्च) और थोड़ा सा सेंधा नमक मिलाकर पीना चाहिए। तेज गर्म पानी (सादा) का सेवन भी लाभकारी हो सकता है। पूरी, कचैरी, समोसे, मट्ठी या इसी तरह घी में तले हुए खाद्य पदार्थ अधिक खा लेना अजीर्ण को स्वयं ही निमत्रण देने जैसा है। इसे दूर करने लिए खट्टा मट्ठा, काॅफी, तेज गर्म सादा पानी, अजवायन को उबाल कर उसके पानी मंे थोड़ा सा सेंधा नमक डालकर प्रयोग में लाना लाभकारी रहता है।
- मूली अधिक खा लेने पर उसके प्रभाव को दूर करने के लिए मूली के बीच के नर्म पत्ते लेने चाहिए अथवा थोड़ा सा गुड़ खाना चाहिए या फिर थोड़े से तिल चबा लेने चाहिए।
- नींबू अधिक खा लेने या नींबू का अचार अधिक खा लेने से होने वाली परेशानी को दूर करने के लिए थोड़ा सा नमक चाटना चाहिए अथवा गन्ने का रस ज्यादा पी लेने पर आया आफारा तीन-चार बेर खाकर दूर किया जा सकता ह। परन्तु यदि अधिक बेर खा लेने से अफारा आ जाए तो थोड़ा सा गन्ने का रस या गर्म पानी अथवा गुनगुने पानी में दो चम्मच सिरका डालकर सेवन करें।
- सेब या उससे बने पदार्थ अधिक खा लेने पर जो अजीर्ण होता है उसे दूर करने के लिए थोड़ी सी दाल चीनी का चूर्ण गुनगुने पानी से लेना चाहिए अथवा एक-दो चम्मच गुलकन्द खा लेना चाहिए।
- यदि जामुन अधिक खा लिया जाए या जामुन ठीक से पकी हुई नहीं है तो अजीर्ण हो जाता है। इसे दूर करने के लिए थोड़ा सा (एक-दो चुटकी) नमक चाट लेना चाहिए अथवा पके आम का चार चम्मच रस पीना चाहिए।
- अधपके चावल अधिक खा लेने अथवा अधिक खा लेने या खिचड़ी खा लेने पर अफारे को दूर करने के लिए नारियल गिरी, दही, नमकीन मट्ठा, अजवायन का चूर्ण, थोड़ा सा गर्म दूध या फिर जीरा, हींग, अजवायन, काला नमक दो चुटकी (आधा चम्मच) पिसा मिश्रण (चूर्ण) लेना चाहिए। इस चूर्ण का उपयोग सामान्यतया भी भोजन के साथ दही-मट्ठे में किया जा सकता है, यह पाचक होने के साथ गैस होने पर भी राहत देता है।
- यदि अफारा अधिक अमरूद खा लेने अथवा कच्चे अमरूद खाने से आया हो तो उसे दूर करने के लिए थोड़ी सौंफ चबा लेनी चाहिए।
- उड़द की दाल (काली धुली हुई) या साबुत उड़द अथवा ऐसी ही कोई अन्य वस्तु अधिक खा लेने से आए अफारे को दूर करने के लिए थोड़ा सा गुड़ खा लेना चाहिए।
- मटर खाने के कारण या उससे बने पदार्थ अधिक खा लेने के परिणाम स्वरूप आए अफारे का निवारण नमक-नींबू में रचाई गई अदरक खाने से हो सकता है। यह मिश्रण सामान्यतौर पर भी भोजन के साथ लेना लाभकारी होता है।
- चना, मूंग, उड़द और अन्य दालें अधिक खा लेने से उत्पन्न हुए अजीर्ण को दूर करने के लिए आधा गिलास गुनगुने पानी में एक चम्मच सिरका मिलाकर लेने से लाभ होता हैं।
- खीर, मलाई-रबड़ी या ऐसे ही अन्य खाद्य पदार्थ अधिक खा लेने पर अजीण्र होना स्वाभाविक होता है। इसे दूर करने के लिए चार-पांच काली मिर्च चबा लेनी चाहिए या फिर चूर्ण थोड़ा सा नमक मिला कर ले लें।
- मूंगफली या उससे बनी अन्य खाद्य वस्तुओं का सेवन अधिक कर लेने से उत्पन्न अजीर्ण दूर करने के लिए थोड़ा सा गुड़ या नमकीन मट्ठा (आधा गिलास) पी लेना चाहिए।
- किसी तरह के भी लड्डू अधिक खा लेने पर अजीर्ण अवश्य ही होगा इसे दूर करने के लिए पीपल का चूर्ण गुनगुने पानी से लेना चाहिए। इससे अजीर्ण का कष्ट दूर हो जाएगा।
अजीर्ण अधिकांश अवसरों पर हमारी ही गलतियों, असावधानियों या फिर आदतन अधिक खा लेने के कारण होता है। कई बार तो देखने में आया है कि निमंत्रित भोज के अवसर पर अधिकतर लोगों की सोच अधिक खाना भी होती है। यह अजीर्ण को भी घातक निमंत्रण होता है। थोड़ी सी सावधानी और समझदारी से हम सहज ही अजीर्ण से दूर रह सकते है। यही इससे बचे रने का सर्वश्रेष्ठ उपाया है। परन्तु यदि सावधानी के बाद भी अजीर्ण हो जाए तो तुरंत ही उपाय करना चाहिए।
भोजन सम्बन्धी चिकित्सकीय सुझाव:-
सामान्य स्वस्थ व्यक्ति के लिए भोजन जीवन और उत्तम स्वास्थ्य का आधार है तो पथ्य पूर्ण भोजन अस्वस्थ व रोग ग्रस्त व्यक्ति के लिए उपचार का एक साधन है। भोजन केवल पेट भरने अथवा स्वाद की इच्छा पूर्ति करने अलावा केवल न खा लेने का साधन नहीं है, यह हमारे स्वास्थ्य रक्षा और मनोवैज्ञानिक सन्तुष्टि का भी साधन है। इसीलिए कहा जाता है - जैसा खाए, वैसा ही बने मन। हमारा स्वास्थ्य और इसका स्वरूप हमारे भोजन पर आश्रित है। रोग की अवस्था में इसीलिए पथ्य (परहेज) के महत्व को सभी प्रचलित चिकित्सा पद्धतियों में महत्वपूर्ण माना जाता है। एक परम्परागत मान्यता भी है - ‘‘एक परहेज, हजार नियामत‘‘ अर्थात एक परहेज के माध्यम से स्वास्थ्य की रक्षा की जा सकती है क्योंकि व हजार औषधियों से भी बेहतर होता है। परम्परागत चिकित्सा पद्धतियों में तो पथ्य चिकित्सा का ही एक उत्तम और महत्वपूर्ण अंग माना जाता है। आधुनिक चिकित्सा पद्धति में भोजन व्यवस्था एक स्वतंत्र विज्ञान के रूप में विकसित हो गई है जिसे डायटिक्स या पोषण विज्ञान या आहारिक कहा जाता है। एक डायटीशियन/न्यूट्रीशनिस्ट के रोगी को भोजन के सम्बन्ध मे दिए सुझाव रोग और उसकी अवस्था के अनुरूप भिन्न-भिन्न होते है। इनके पालन से रोगी न केवल जल्द ही रोग मुक्त हो जाता है अपितु स्वास्थ्य में सुधार भी होता है। इस प्रकार के चिकित्सकीय सुझावों से रोग ग्रस्त अवस्था में व्यक्ति के मन पर भी अनुकुल प्रभाव पड़ता है जिससे स्वास्थ्य सुधार की गति में तेजी आती है। मन का तन पर गहरा प्रभाव होता है। इसीलिए इस तरह के सुझावों का मनोवैज्ञानिक प्रभाव व्यक्ति को स्वस्थ करने में सहायक होता है। - प्रेषक सुश्री दया प्रजापति
आर्य संस्कृति-सनातनधर्मेव जयते।
ब्रह्माण्डगुरु भगवान प्रजापति
अधिष्ठाता प्रकृति शक्ति पीठ
मो. 7737957772
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24 faravary- फरवरी 2014 पो. पजि. सं. बीकानेर/025/12-1124
दिनांक:24-2-14 वर्ष 26 अंक 13
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पर्यावरण, आध्यात्मिक एवं समसामयिक विचारों एवं स्वास्थ्य रक्षा विषयक धरती से जुड़ा विश्व का अग्रणी शास्त्र
पाक्षिक खेजड़ा एक्सप्रेस
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तुलसी पौध से स्वस्थ रहे-
- आर्य संस्कृति, माता-पिता- गुरु, प्रकृति
वनस्पति, तुलसी और पर्यावरण से जोड़ने का हमारा महायज्ञ सफलता की ओर अग्रसर है। आप आज ही शामिल होवे। -प्रजापति
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हमारा ध्येय ब्रह्माण्डिय पर्यावरण सुरक्षा व विश्व शान्ति
एवं प्राणियों की स्वास्थ्य रक्षा करनी ही है।
आप स्वस्थ रहेंगे तो धर्म-कर्म विद्यौपार्जन,धनोपार्जन
करेंगे। घर में तुलसी पौध लगाने से सुख-शान्ति मिलती है।
प्रकृति शक्ति पीठ, खेजड़ा एक्सप्रेस से तुलसी, पीपल
- पौध निःशुल्क ले जावें।
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मैं यू.आई.टी. बीकानेर का भी प्रदूषण हूँ
मैंने यू.आई.टी. के छोटे से बड़े तक को अपने शिकंजे में ले रखा है।
पूर्व अध्यक्ष तो मेरी गिरफ्त में ही था जो यह कहता था मैं अपने कर्मचारियों को नाराज नहीं कर सकता।
इसीलिए उस समय हर कर्मचारी ने विकास के कार्यों की गंगा में दिल खोलकर अपने हाथ धोये।
किसी का भी पट्टा नियमन किया उसे जमीन की कीमत से अधिक कीमत मैंने मेरे प्रदूषकों को दिलवाई। आज ये लोग मेरा गुणगान करते है और हर समय सोचते है कि भ्रष्ट सरकार आवे भ्रष्ट अध्यक्ष आवे। भ्रष्ट आफिसर आवे।
ये भ्रष्ट सोच ही मुझ प्रदूषण की शक्ति है जो उत्तरोत्तर बढ़ती जा रही है मेरे खिलाफ किसी को आवाज उठाने लायक मैंने छोड़ा ही नहीं है।
पत्रकारों को मैंने दिल खोलकर सुविधाएं दिलवाई। मेरी युआईटी से सस्ती दरों पर प्लाॅट दिला दिये।
चाहे पत्रकारों का अखबार की 10-20 ही काॅपी निकले पर मैंने उनके अखबार में काम करने वाले परिवारजनों तक को सुविधाएं दिलवा दी ओर भी सरकारी सुविधा दिलवा दी है अब पत्रकार मेरे शिकंजे में। नेता-छुटभैये नेताओं की भू-माफियों की मैने चांदी ही चांदी करवा दी है। जिन्हें सम्मान-पुरस्कार, सुविधाएं मिलनी चाहिये उसे मैंने लेने ही नहीं दिया।
जिसने मेरे गुणगान किये उसे तुरन्त प्रभाव से पट्टा दिलवा दिया - चाहे उसने अधिकृत सड़क पर ही कब्जा कर रखा है। -मैंने जांच करने वाली पुलिस भ्रष्टाचार निरोधक मेरे कब्जे में पहले से ही है। जब कब्जा करने वालों की निगरानी में जो कर्मचारी रखे है वे कब्जा करवाकर धन लेते है। फिर तोड़फोड़ पट्टा प्रक्रिया में भ्रष्टाचार का समावेश करते है। मेरी शक्ति बढ़ाते हैं। जब तक पुलिस व वकील मेरे शिकंजे में रहेगे मेरा कोई कुछ भी नहीं बिगाड़ सकता।
अरे खेजड़ा तू तो सचमुच का खेजड़ा ही निकला-तुमने मुझ प्रदूषण से लड़ते-लड़ते सारा जीवन बिता दिया पर तुम्हें आज भी सही आदमी नहीं मिला। मिलता तो तुम्हें न्याय मिल जाता। सही आदमी यदि एक भी तुम्हें मिल जाता तो तू मुझे उखाड़ फैंकता ये तुममे शक्ति है यह मैं जानता हूं। पर क्या करूं सही ओर सच्चा आदमी मैं तुम तक पहुंचने ही नहीं देता- जो लोग भ्रष्टाचार खत्म करने की यानि प्रदूषित शक्ति खत्म करने की बात करते है पर असल में वे लोग राजनीति प्रदूषण के शिकंजे में है।
अब चाहे तुमसे जो बने कर लो - क्योंकि अनादि काल से सुर-असुर, देव-राक्षस शक्तियों का टकराव चलता आ रहा है इस बार राक्षस शक्ति-असुर शक्ति का चारों ओर साम्राज्य है। इस साम्राज्य को समाप्त करने की शक्ति अब किसी में नहीं है। साधु-सन्त आदि बासी-उच्छिष्ट खा खाकर मेरे अधीन है क्योंकि मैं प्रदूषण हूं। मैं बीकानेर यू. आई.टी. का प्रदूषण हूं और एक मायने में मेरा अब चारो ओर साम्राज्य है। हा-हा-हा-हा......
खामोश-प्रदूषण- मैं कोई ऐसा वैसा नहीं हूं। मैं खेजड़ा हूं। मैं सर्दी-गर्मी-दुःख, सुख सहन करने की शक्ति रखता हूं। तुम्हें मैं मिटाकर रहूंगा। तुम्हारी यूआईटी की मान्यता खत्म करके इसके प्रदूषकों को जेल भेजवा दूंगा।
आज मैं उन सन्तों का आहवन कर रहा हूूं कि यदि कोई सन्त है जो देवी शक्ति के पराक्रम को बढ़ाने में हमारा साथ अपनी जाति-पद आदि के अहंकार से हटकर देना चाहे तो तुरन्त प्रकृति शक्ति पीठ, खेजड़ा एक्सप्रेस से सम्पर्क करे। हमें राक्षसी शक्ति को मूल से समाप्त करना है। लो प्रदूषण तेरा काम-तमाम हा. हा. हा हा ....
बोलो प्रदूषण चुप क्यों हो प्रदूषण अब तुम्हें शायद पता चल गया होगा कि पढ़े-लिखे सच्चे अधिकारी भी अब हमारे साथ आने वाले है- ओम शान्ति! ओम तत्सत!
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गंगा मैली
साधु-संत, फकीर और कर्मकाण्डी ब्राह्मण गंगा को मैला करने वालों व उनके परिवार जनों से दान लेना बन्द कर दे तो वे लोग स्वतः ही धराशाही हो जावेगे। गंगा में गन्दगी डालने वालों से दान लेने से ही गंगा असहाय हो रही है वरना गंगा के प्रकोप से स्वतः ही इनकी प्रदूषित सोच भस्म हो जाती।
संतो, फकीरो, कर्मकाण्डी ब्राह्मणों की प्रबल इच्छा शक्ति से गंगा नदी का जल पुनः पवित्रता प्राप्तकर सकता है। साधू-संतों को प्रदूषकों के चढावा, उपहार का त्याग करना होगा साथ ही गन्दगी डालने वालों प्रदूषकों को फैक्ट्री के आगे धूणा तापने का कार्यक्रम शुरू करना होगा।
प्रदूषकों का चढावा प्रदूषित होता है। प्रदूषित चढावा खाने से मन भी प्रदूषित हो जाता है। प्रदूषित मन से इच्छा शक्ति कमजोर हो जाती है। यानि जैसा ‘‘खाओगे अन्न वैसा ही होगा मन’’ ये सत्य ही नहीं परमसत्य है। इसी को मध्यनजर रखते हुए साधु-सन्त, पर्यावरण प्रेमी आदि दृढ़ इच्छा शक्ति से कार्य करेंगे तो निष्चय ही सफलता मिलेगी।
पाक्षिक खेजड़ा एक्सप्रेस प्रकृति शक्ति पीठ के प्रजापति ने उपरोक्त कथन का दृढ़ इच्छा शक्ति से आदर्ष माना और 22 वर्षों से त्याग ओर तपस्या से अनेकानेक प्राणी जगत के कार्यों का एक लम्बा इतिहास बनाया है जिसे साधु संत पर्यावरण, प्रेमी यदि आदर्ष मानेगे तो सभी क्षेत्रों में विकास होगा। सफलता मिलेगी और भारत वर्ष का नाम व अध्यात्मक गुरूओं का नाम विष्व में ध्रुव की तरह प्रकाष देने में अग्रणी रहेगा।
गंगा आदि की पवित्रता की आवष्यकता साधु-संतो व चन्द पर्यावरण प्रेमियों को ही है। सरकार-प्रषासन व आम जनता को नहीं? अतः गंगा की पवित्रता का दायित्व सभी पर है विषेष तौर से संप्रग सरकार पर क्योंकि स्व. राजीव गांधी के प्रधानमंत्री काल में गंगा की पवित्रता की ओर स्व. राजीव गांधी ने ही किया।
स्व. राजीव गाँधी के प्रधानमंत्री काल से गंगा आदि नदियों की पवित्रता की आवाज को सुनवाई हुई और इसमें स्व. राजीव गांधी की पहल से गंगा आदि नदियों को पवित्रता पर कार्य शुरू हुवा।
इस कार्याकाल को लम्बा समय हो गया, सरकारे आई, प्रधानमंत्री आये, गंगा की पवित्रता की बात चलती रही और अब पुनः कांग्रेस की सरकार आई है। सोनिया गांधी के हाथ में मजबूत पंतग की डोर है। फिर भी गंगा अपनी पवित्रता के लिए तरस रही है।
गंगा ही नहीं गंगा प्रेमी भी बेहद दुःखी है परन्तु इन लोगों में हमारे विचार से तो इच्छा शक्ति की कमी है वरना गंगा कभी की अपने वास्तविक अस्तित्व में आ जाती।
साधु-संतो को विशेष पर्वो पर ओर वह भी गंगा के स्नान के पर्वो पर गंगा की पवित्रता का ध्यान आता है और फिर प्रशासन, सरकार को उलाहना देने लगते है।
शाही स्नान नहीं करेंगे? जल समाधि लेगें आदि चतुर प्रशासन ने अतिरिक्त पानी छोड़ा गंगा कुछ हद तक शुद्ध हो गई सब धमकियां धराशायी। शाही स्नान हुवा, संत चले जायेगे, प्रदूषण तांडव करेगा, जबकि सन्तों को पुर-जोर से ये आन्दोलन जारी रखते हुवे यहीं जमकर बैठना चाहिये और गंगा को पूर्णतः शुद्ध कराना चाहिये। साथ ही साधु-सन्तों को धनाडयवर्ग ओर वह वर्ग जो नदी में अपना औद्योगिक गन्दा कचरा डालते है उनसे सभी प्रकार के दान-दक्षिणा न लेने का निर्णय लेवे ओर यह भी निर्णय लेवे कि जो लोग सरकार को टेक्स देकर व ईमानदारी का धन्धा करते है उनका ही दान-दक्षिणा लिया जायेगा। विशेष तौर से गंगा को अपवित्र कर रहे है उनका न दान-दक्षिणा व उपहार नहीं लिया जावे, क्योंकि प्रदूषित धन से मन प्रदुषित हो जाता है ओर मन के प्रदूषित हो जाने से इच्छा शक्ति कमजोर हो जाती है।
यदि साधु संत प्रबल इच्छा शक्ति से गंगा में गन्दगी डालने वाले तत्वों के आगे धूणा लगाकर बैठ जावे ओर तब तक बैठे रहे जब तक वे गंगा में गन्दगी डालना बन्दी नहीं कर देवे।
यदि इतनी दृढ़ संकल्प शक्ति से कार्य किया जावे तो क्या नहीं हो सकता इसके लिए पाक्षिक खेजड़ा एक्सप्रेस, प्रकृति शक्ति पीठ, प्रजापति के कार्यो को देखिये कि इनके पास कुछ भी न होते हुवे भी बहुत कुछ कार्य करने का 18 वर्षों का इतिहास बन गया है जिसमें स्थानीय सतर से लेकर राष्ट्रीय अन्तराष्ट्रीय स्तर के कार्यो पर पर्यावरण के कार्य किये ओर एक-एक कार्य का मील का पत्थर गाड़ते हुवे आगे बढ़ते गये।
कभी नाम की परवाह की, न कभी पुरस्कार की बस दृढ़ इच्छा से कार्य करते रहे प्रजापति नाम व पुरस्कार के क्षेत्र में जाते तो अन्तराष्ट्रीय स्तर के पुरस्कार व नाम कमा लेते परन्तु ऐसा इन्होंने नहीं किया।
हम इन्हीं को साधु-सन्तों को प्रेरणा के स्रोत बनाने का कहते हुवे पुनः ये ही कहेंगे कि गंगा नदी यदि साधु सन्त नाम उपहार का त्याग करके दृढ़ इच्छा शक्ति से कार्य करे तो गंगा नदी चन्द महिनों में ही पुनः पवित्र हो सकती है।
ओर भाषण, अखबारों में नाम, आन्दोलन आदि की मात्र चेतावनी से कुछ नहीं होगा। होगा तो बस अपने कर्तव्य को समझना होगा इसमें आम जनता, गंगाप्रेमी, प्रशासन, सरकार को भी उदासीन न कर कार्य करना चाहिये ओर अग्रणी साधु-संतो, गंगा प्रेमियों को ही बनना चाहिये।
-प्रजापति
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भोजन मनोविज्ञान और स्वस्थ पर्यावरण
भोजन मनुष्य के जीवन के सबसे महत्त्वपूर्ण पक्षों में से एक है परन्तु अब देखने में यह आ रहा है कि इस महत्त्वपूर्ण पक्ष की अनेक तरह से अनदेखी मनुष्य स्वयं ही कर रहा है यह नहीं इस ओर वह उदासीनता के साथ-साथ लापरवाही का व्यवहार न केवल करता ही रहा है अपितु इसमें निरन्तर वृद्धिभी हो रही है। भोजन जीवन का आधार है। इसीलिए परम्परागत रूप से कहा गया है जैसा खाए अन्न, वैसा ही बने मन। इससे भोजन, स्वास्थ्य और मन के अटूट सम्बन्ध का पता चलता है। यही तो स्वास्थ्य पर्यावरण का मूल है। बढ़ती व्यवस्ता के कारण भोजन की ओर ध्यान में कमी होती जा रही है। इसके साथ ही कुछ भी खा लेने की प्रवृति भी बढ़ती जा रही है। स्वाद तथा भोज्य पदार्थों का रंग-रूप भोजन की पौष्टिकता और निरोगता पर हावी होते जा रहे है जिसके दुष्परिणाम भी इसी गति से हमारे सामने आ रहे हैं। इसीलिए जीवन पद्धति रोगों सम्बन्धी में विश्व भर में वृद्धि हो रही है। यह नहीं, बहुसंख्यक ग्रामीण जनसंख्या वाला भारत भी इससे नहीं बचा है। स्वास्थ्य पर्यावरण हमारी भोजन प्रवृत्तियों से प्रत्यक्ष प्रभावित होता है। भारतीय परम्परा में जीवन का एकीकृत उद्देश्य धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष प्राप्त करना है। इनमें से प्रथम तीन का सम्बन्ध प्रत्यक्ष हमारे शरीर से है और चैथे बुद्धि और मन से। प्रथम तीनों की प्राप्ति के लिए उत्तम स्वास्थ्य का होना अनिवार्य है जो समुचित भोजन और स्वास्थ्य रक्षा से ही सम्भव है। अंगे्रजी में एक कहावत है कि एक स्वस्थ मस्तिष्क एक स्वस्थ शरीर में ही होता है और इसका सम्बन्ध मोक्ष से है। इस तरह स्वास्थ्य पर्यावरण अपने समग्र रूप से उत्तम भोजन और उत्तम वैचारिक मन पर आधारित है। इसके लिए भोजन मनोविज्ञान को सामान्य व्यक्ति की आवश्यकता के दृष्टिकोण से समझना जरूरी हो जाता है।
भोजन मनुष्य की मूल तथा प्राथमिक आवश्यकताओं में से एक है जिस पर उसका सम्पूर्ण जीवन, स्वास्थय, नीरोगता, कार्य क्षमता, जीवन प्रत्याशा तथा जीवनीय उत्साह टिका होता है। पर यह ऐसा क्षेत्र है जिसमें बहुसंख्यक लोग भोज्य रूचियों, परम्परागत भोज्य विधान और पारिवारिक परम्पराओं का ही अनुसरण करते है। यह भी देखा गया है कि भोज्य-अभोज्य, समय-असमय और आवश्यकता का ध्यान रखे बिना ही लोग खाते-पीते रहते है। यह तो शायद ही कोई देखता हो कि जो कुछ खाया जा रहा है उसकी खाद्य महत्ता कितनी है। स्वाद और शौक को संतुष्टि के लिए व्यर्थ भोजन और दुत भोजन आज के जीवन के अंग बन गए है। भोजन केवल पेट भरने के लिए नहीं अपितु आत्मिक सन्तुष्टि भी देने वाला होता है। भोजन के उपरान्त होने वाली तृप्ति भोजन-मनोविज्ञान का एक विशेष पक्ष है। परम्परागत कहावत है उत्तम सुख निरोगी काया इसे सार्थक करने के लिए सदैव प्रयासरत रहना होता है। उत्तम स्वास्थ्य के लिए प्रयास करना हमारे कत्र्तव्यों में से एक है। अनेक तरह की स्वास्थ्य समस्याएं हमारे रहन-सहन और भोज्य आदतों का परिणाम होती है। भोजन जितना कम संस्कारित और प्राकृतिक स्वरूप में लिया जाएगा स्वास्थ्य के लिए उतना ही हितकर होगा।
भोजन मनोविज्ञान के विषय में योगेश्वर श्री कृष्ण ने श्री मद्भगवत गीता में कहा है-‘‘आहारस्त्वपि सर्वस्य त्रिविधो भवति प्रियः।‘‘ (गीता, 17-7) अर्थात ‘‘जिस तरह तीन प्रकार की प्रवृत्तियों युक्त मनुष्य होते हैं, उसी प्रकार उन्हें अपनी-अपनी भावनात्मक प्रवृत्ति के अनुरूप ही तीन प्रकार का भोजन प्रिय (रूचिकर) होता है।‘‘ इसे इस प्रकार भी समझा जा सकता है कि भोजन की रूचि के अनुरूप ही व्यक्ति की प्रवृत्ति और उसका व्यक्तित्व का विकास होता है। श्री कृष्ण कहते हैं:-
‘‘आयुः सत्वबलारोग्यसुखप्रीति विवर्धनाः।
रस्या स्निग्धाः स्थिराहृद्या आहाराः सात्विक प्रिया।।‘‘
गीता, 17-8
अर्थात ‘‘सात्विक प्रवृत्ति वाले व्यक्ति आयु, बुद्धि, बल आरोग्य, सुख तथा पारस्परिक स्नेह और सौहार्द में वृद्धि करने वाले रस पूर्ण (सुस्वादु तथा प्राकृतिक स्वरूप वाले), चिकने (स्निग्ध) तथा स्थिर प्रकृति वाले (जिस खाद्य पदार्थों का प्रभाव और सार शरीर में दीर्घ काल तक बना रहता है) खाद्य रूचि पूर्वक उपयोग में लाते हैं।‘‘
‘‘कट्वम्ल लवणात्युष्ण तीक्ष्णरूक्ष विदाहिनः।
आहारा राजसस्येष्टाा दुःख शोकामयप्रदाः।।‘‘
गीता, 17-9
अर्थात ‘‘राजसिक वृत्ति वाले लोग कड़वे, खट्टे, अधिक लवण युक्त (नमकीन), अति गर्म, तीखे स्वाद वाले, रूखे, प्रदाह उत्पन्न करने वाले खाद्य पदार्थ पसन्द करते हैं।‘‘
क्रमश: शेष भाग अगले अंक में
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भ्रष्टाचार रूपी राक्षस भयानक बन गया है! आईये इसे समाप्त करे।
सम्मान-पुरस्कार-किसानों-मजदुरों को क्यों नहीं? जिनके बलबूते पर देश के विकास की धुरी चलती है।
- सेना और पुलिस तो अपने शौर्य के कारण सम्मान-पुरस्कार लेती है परन्तु -
- समाजसेवी को इधर-उधर के कार्यो को अखबारों में छपाकर आपने आंकड़े प्रस्तुत करने से
सम्मान-पुरस्कार मिल जाता है।
- इसी प्रकार अन्यों को भी इसी कार्य प्रणाली से - सम्मान-पुरस्कार मिल जाते है।
- राज्य कर्मचारियों को भी ऐसे ही आंकड़ों से सम्मान-पुरस्कार मिल जाता है। वास्तव में वह योग्यता रखता है या नहीं? कभी-कभी तो सुबह उसे सम्मान पुरस्कार मिलता है। शाम तक रिश्वताखोरी में पकड़ा भी जाता है।
- ये ही हाल देश में चल रहे है तो असली की पहचान कैसे होगी?
- समाचार पत्रों को काफी महत्व दिया जाता है। परन्तु कुछ संघ्र्षशील पत्रकारों को, मिशन के पत्रों को छोड़कर बाकी समाचार पत्रों की जांच की जावे तो शायद ये सबसे बड़ा घेटाला निकले क्योंकि अनेकानेक समाचारपत्र तो मात्र विज्ञापनों में सरकारी विज्ञापन हासिल करने की दौड़ में है। ये पत्र मात्र उसी विभागों में विज्ञापन छपे हुवे मिलेगे। आम जनता तो छोड़ो। उनके पड़ोसी को भी छोड़ो-घ्रवालों को भी शायद यह पता नहीं होता होगा कि उनका अखबार कब प्रकाशित होता है और अखबार का नाम क्या है और कितनी तादाद में छपता है। अखबार वाले जब सम्मान-पुरस्कार लेने वालों के आंकड़े-बढ़ा-चढ़ाकर लिख सकते है तो वह अपने आपके लिए किसान-मजदूर के खून पसीने, जनता की गाढ़ी कमाई के धन को सरकार-संस्था के माध्यम से हड़पने का हर सम्भव प्रयास करेगा ही। चाहे उस की 100-50 ही प्रतियां छपती हो?
पत्र-पत्रकार येन-केन-प्रकारेण धनपति बनते जा रहे है - कल तक जो पत्रकार सड़कों पर था आज वह करोड़ों में खेल रहा है, इतना धन कहां से आया क्योंकि उसने भी शायद भ्रष्ट नेताओं की तरह जनता का धन हड़फा होगा?
जब ये लोग जनता का धन हड़पकर रहे है तो इन्हें इतनी सुविधा क्यों दी जा रही है - यात्रा-आवास
में सुविधा, प्लाॅट सस्ती दरें आदि आदि क्या करते है ऐसा काम जो इन्हें इतनी सुविधा दी जा रही है। जबकि अखबार उद्योग में रुपये अखबार के लेते है। खबर के रुपये लेते है।
हाँ वास्तविक खोजी-शोधकर्ता है तो हक जरूर मिले।
- हमें तो नहीं मिला - हमारे खेजड़ा एक्सप्रेस को क्यों नहीं मिली ये सुविधाएं
क्यांे नहीं मिला हमें भुखण्ड-प्लाॅट? क्योंकि हम ऐसे आंकड़ों बनाना नहीं जानते।
जबकि इन लुभावने समाचार प्रसारण केन्द्र ने तो भारतीय संस्कृति-आर्य संस्कृति को हिन्दू-संस्कृति में परिवर्तन कर दिया और आर्यवर्त-भारतवर्ष को विदेशी आतंकियों के दिये हुवे नाम - हिन्दुस्तान-इण्डिया बना दिया और जितना हम आर्य संस्कृति-सनातन धर्म का प्रचार-प्रसार करके भारत वर्ष बनाना चाहते है ये लोग जोरदार-शक्ति से इण्डिया और हिन्दुस्तान का ही राग अलाप रहे है।
ये ही हाल साहित्यकारों , लेखकों और कवियों आदि का है जिन्हें सम्मान-पुरस्कार दिया जाता है इन्होंने भी भारतीय संस्कृति, आर्य संस्कृति को विदेशी आतंकियों की हिन्दू-हिन्दू संस्कृति, हिन्दुस्तान, इण्डिया को बढ़ावा देने में ही लगे हुवे है।
अतः महामहिम राष्ट्रपति महोदय, माननीय प्रधानमंत्री, सम्मानीय सुप्रीम कोर्ट जज व सीबीआई आदि जो सही जांच, सही न्याय करने में सक्षम है उन्हें करवध प्रार्थना है कि -किसानों-मजदूरों-जवानों को ही सम्मान पुरस्कार देवे और आंकड़ों के द्वारा अन्यों को न देवे और पत्र-पत्रकारों की जांच करावे क्योंकि ये लोग विज्ञापन आदि आंकड़ों के जरिये सरकार-संस्थाओं के माध्यम से जनता का धन हड़फ कर रहे है।
ये भी जरूर जांच करे कि पाक्षिक खेजड़ा एक्सप्रेस को अपने रचनात्मक पर्यावरण-अध्यात्म व शोध कार्यो के लिए आज तक प्लाॅट-भुखण्ड क्यों नहीं मिला और अन्य जो सुविधाएं मिलनी चाहिये थी वह क्यों नहीं मिली क्योंकि पर्यावरण में भ्रष्टाचार रूपी राक्षस भयानक हो गया है। आईये इन्हें समाप्त करें।

संसार की प्राचीन से प्राचीन आर्य संस्कृति है। सनातन धर्म है जो सतयुग से है -
बाकी के जैन, बौद्ध, ईसाई, ईस्लाम, आर्य समाज आदि कलियुग की उपलब्धि है।
आर्य संस्कृति-सनातनधर्मेव जयते।
ब्रह्माण्डगुरु भगवान प्रजापति
अधिष्ठाता प्रकृति शक्ति पीठ
मो. 7737957772
देखे . http://bhagwanprajapati.webs.com/
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